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Full text of "Prasad Ke Teen Etihasik Natak"

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प्रकाशक $ 
साहित्य भवन लिमिटेड, 
प्रयाग । 


द्वितीय संस्करण 
मूल्य २) 


सुद्रक ४ 
गिरिजाप्रसाद श्रीवास्तव, 
हिन्दी साहित्य प्रेस, प्रयाग । 





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पॉडत अमरनाथ का 


पूज्य गुरुदेव 
१० अम रनाथ स्तरों, एस्‌० ए०, डी० लिट्‌० 
वाइस चांसलर, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी 
| की 
सेवा सें 
सादर समर्पित । 


अपनी बात 


हिंदी नाटक-साहित्य के इतिहास मे प्रसाद? जी सर्वप्रथम मोलिक 
ओर प्रसिद्ध नाटककार हैं, यह बात सवत्र मान्य है। आधुनिक नाटक- 
कारो मे उनका स्थान सी सर्वोच्च है। उनके नाठकों से प्राचीन ओर 
आधुनिक नाव्यशेलियों का अत्यन्त सुन्दर सम्मिश्रण तो मिलता ही है, 
साथ ही उनका एक आदश है जिसने उनकी रचनाओं को एक. 
अपूर्व रूप दे दिया है। इस आदर्श के उपयुक्त उपकरणों का भी 
उनकी रचनाओं से असाव नही है। प्रस्तुत पुस्तक सें सुयोग्य लेखक 
ने अजातशत्र्‌ ?, स्कन्दगुतः और “चन्द्रगुत नामक तीन ऐतिहासिक 
नाटकों को लेकर “प्रसाद? जी की नास्य-कला ओर उनके नाठकों का 
कथा-संगठन चरित्र-चित्रण, अंतहन्द्र, आदश आदि ख़ुख्य-मुख्य बातों 
पर सरल ओर सुन्दर ढ'ग से विचार किया है| साहित्यिकों तथा विद्या- 
थियों के लिए. यह एक उचम और उपयोगी रचना है। अतः इसका 
नवीन संस्करण हिंदी पाठको के सामने रखते हुए हमे हर हो रहा है | 


पुरुषोत्तसदास टंडल, 
संन्नी, 
साहित्य सदन ल्लि०, प्रयाग ( 


दो शुदद 


यह पुस्तक कई वर्ष पूर्व ही प्रारम हो चुकी थी परन्तु अनेक कारणों 
में अब समाप्त हो सकी है | श्री प्रसाठ जी के ऊपर इधर कुछ वर्षों में 
ही अच्छा साहित्य प्रकाशित हो चुका है परन्तु उनके नाठकों का 
सम्यक विवेचन अभी तक देखने मे नहीं आया। सिलीसु वी की 
ध्यताद की नाख्यक्रत्ा? बहुत पहले प्रकाशित हो चुकी थी। उसके 
बाद भी प्रतादजी की नाटक रचना जारी रही | शिलोसु बजी ने मुख्यतः 
अजातशत्र तक्र प्रकाशित नाठकों के आधार पर ही प्रभाद की कला 
का विवेचन किया है | इसलिए बाद मे प्रकाशित दो महत्वयूण नाठकों 
की आलोचना उनकी पुस्तक में नहीं आ सकी है। प्रस्तुत युस्तक का 
उद्देश्य शिलीमुखती के का को आगे बढ़ाता ही है। 
दो शब्द पुस्तक के नामकरण पर निवेदन करना आवश्यक है । 
पुस्तक का नाम “प्रमाद के तीन ऐतिहासिक नाटक? रखा गया है 
यद्यपि इससे इन नाटकों की आलोचना की अपेज्ञा लेखक का उद्देश्य 
प्रसाद की नास्यकला का अध्ययन अधिक रहा है। स्थानाभाव के 
कारण प्रसाद के केबल तीन नाठकों और उनमे आये हुए मुख्य 
चरित्रों का ही विवेचन हों सका है, परन्तु इस सीमित क्षेत्र मे भी प्रसाद 
की नाव्यकला के सर्मी अंगो का पूर्ण अव्ययन प्रस्तुत करने का प्रयत्न 
किया गद्य है ) 
पुस्तक लिखने मे मुझे जिन लेखकों की पुस्तकों से सहायता प्राप्त 
हुई है उनका में सदेव आमारी रहूँगा । उन लेखकों के नाम उनकी 
पुस्तकों से लिए गये उद्वरणो के साथ ही दे दिये गये हैँ | अपने वाल- 
मित्र श्री हतुमानप्रसाद तिवारी जी का मुझे बडा सहयोग मिला है 
परन्तु आत्मीयता की दृष्टि से उन्हें धन्यवाद देना ठीक नही मालूम 


( ३२ ) 


होता यद्यपि कभी-कभी आधी रात तक ठंड में बैठकर इस पुस्तक की 
पाइलिपि सशोधन मे जब्र उन्हे अघक देर हो जाती थी तब मुझे उनके 
ऊपर दया भी झ्राती थी ओर श्री पूज्य भामीजी के क्रोध का स्मरण 
भी हो आता था | अपने दूसरे मित्र श्री राजेन्रसिंह गौड़ ओर श्री 
मानिकलाल जी को भी में इस समय नहीं मूल सकता जिन्होंने इस 
पुस्तक के लिखने के लिए पेरित किया था और जिनकी स्वाभाविक 
सुहृदयता से मुझे समय-समय पर बड़ा उत्साह मिलता रहा | 
अन्त से डाक्टर रामकुमार जी वर्मा का भी जिन्होंने अपना 

बहुमूल्य सभय देकर इस पुस्तक की भूमिका लिखने का कष्ट किया है, 
मे सब से अधिक ऋणी हूँ। 

_ इंख है कि पूर्ण सावधानी रखते हुए भरी पुस्तक में प्रेस की कई 
भूलें रह गई हैं। आशा है पाठकगगु साया की इस जुटियों की ओर 
ध्यान न दंगे | 


इस पुस्तक द्वारा यदि मै साहित्व की कुछ भी सेवा कर रुका तो 
अपने परिश्रम को सफल समझूँगा। 


दर 


ऋाइस्ट चर्च कालज, ) 


कानपुर, ( 


>. € 
राजश्त्रर प्रसाद अर्ग॑त्त 
२० अप्ेल,? ४४ हे ह 


सूमिका 

साहित्य किसी सी राष्ट्र की ऐसी साधना है जिसमें उसे आत्माभि- 
व्यक्ति के साथ ही साथ आत्मोन्नति की प्ररणाएं प्राप्त शोती हैँ।यह 
आत्मोन्नति न केवल उसकी अंतरंग भावनाश्रों म होती है प्रत्युत उसके 
चारों ओर जो राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ होती हैं, उनसे 
भी बह यथोचित स्फूति प्राप्त करता है | इस प्रकार साहित्य के विकास 
में परिस्थितियों का भी बहुत बड़ा हाथ रहा करता है। साहित्य और 
समाज एक-दूसरे को प्रभावित करते हुए अपने दृष्टि-बिन्दु निर्धारित 
करते चलते हैं। 

हिन्दी साहित्य अपने निर्माण और विकास मे परिस्थितियों से विशेष 
प्रभावित हुआ है | चारणकाल, भक्तिकाल, कलाकाल और आधुनिक 
काल में जो विशेष विचार-घाराश्ं की प्रगति चली है, वह साहित्य की 
विविध शैलियों की जननी है। यद्रत्रि इतिहास का विभाजन विशिष्ट 
कालों मे न होकर अपने विकास की परिस्थितियों म होना चाहिए । 
तथाप्रि किसी भी काल की प्रमुख विचार-धाराएँ उपेज्षा की दृष्टि से 
नही देखी जा सकतीं | सामाजिक ओर राजनीतिक परिस्थितियाँ साहित्य 
के विकास में ऐसी ही निर्माण सीमाएँ हैं जैधी किसी नाटक से सचियाँ 
हुआ करती हैं । 

हिन्दी साहित्य के विकास पर इष्टि डालते समय ये परिस्थितियाँ 
महत्त्वपूर्ण हैं! आधुनिककाल जो मारतेन्दु के युग से प्रारंभ होता है, 
विचार धाराश्रों के तीत्र घाव ओर प्रतिघात से अपने निर्माण में विशेष 
सजग हुआ है| पश्चिम का संपक उसे अपने नवीन रूप के निर्धारण 
में विशेष सहायक हुआ है। पश्चिम में साहित्य ने जीवन की जिस 
इहृष्टिकोण से आलोचना की है, वह दृष्यिकोश हिन्दी के सामने 
भी आया और उसके यथाथवाद ने हिन्दी साहित्य को विविध विचार- 


( ४ ) 


क्षेत्रों म अपना विकास करने के लिए प्रोत्साहित क्रिया। भारतीय 
विद्रोह, बग-भंग, महायुद्ध और असहयोग आन्दोलन आधुनिक साहित्य 
को अग्रमर करने से सहायक हुए हैं और उनसे उन्हे स्फूति भी प्राप्त 
हुई है | इसी समय हिन्दी साहित्य को पश्चिम के इृष्टकोण से अपना 
विकास करते हुए. भारतीयता के प्रति स्वाभिमान मी प्राप्त हुआ है । 
उसने नाटक, उपन्यास, कविता और कहानी में सास्कृतिक इतिहास की 
टष्ठभूसि पर अपने आधुनिक सवपों से भाग लिया है ओर अपने 
भविष्य-निर्माण का पथ प्रस्तुत किया है। साहित्य ने राष्ट्रीय भावनाओं 
के साथ ही साथ अन्त ट्टरीय सहानुभूति भी ऋपनायी और ऐसी 
दृष्टि प्राम की जो भौगोलिक और ऐतिहासिक सीमाओं से नहीं रोकी 
जा सकी | 

सास्कृतिक ओर अन्तर्राष्ट्रीय विचारों को साहित्य से प्रत्रिष्ठ कराने 
वाले साहित्य-निर्माताओ में श्री जयशंकर प्रसाद? की प्रतिमा से बंतोन्मुखी 
रहो है। नाटक, कविता, उपन्यास, कहानी और निबन्धों मे उन्होंने 
भारतीयता का अभिन्नान जिस कलात्मक ढ'ग॒ से प्रस्तुत किया है. वह 
हिन्दी साहित्य में अद्वितीय है। उनके नाटक तो इस दृष्टि से अ्रत्यन्त 
महत्वपूर्ण हे। ऐतिहासिक प्रृष्ठभूमि पर उन्होंने भारतीय मनोविज्ञान 
को जिस स्पष्ठता के साथ अक्रित किया है वह न केबल हिन्दी की 
अमर इझति है वरन््‌ वह भारतीय इतिहास 
नधिनी है। 
नाठक है जिन 


'ओर साहित्य की अमूल्य 
अजातशत्र , स्कन्दगुत और चन्द्रगुत्त उनके ऐसे तीन 
0302: किसी भी साहित्व को गर्व हो सकता है। उनके 
व्यापक दृष्ठिक्ोण के तीन उदाइरण लीजिए :-- 


ध्प्ज्प्र श्र वज्ध-करे हृठ्य रे रे हूँ 
े तीत *% वज्र-कठोर हृठय पर जो कुटिल रेखा-चित्र खिंच गये हैं, 
पी कसी मिठ्ये ? बढ़ि आप 


35 का की इच्छा है तो वर्तमान मे कुछ रमणीय 
577 वित्र छोजिये, जो भविष्य से उज्ज्यल होकर दशकों के हृदय को 
४ की सुखी बनाकर सुख पाने का अम्यास कीजिये [० 

[ अजातशत्रु पृष्ठ ११३ | 


(६ 


ध्युद्ध क्या गान नहीं है ! रुद्ध का ऋ गीनाद, मैरवी का ताएडब- 
नहत्य ओर शर्खों का वाद्र मिलकर भेरव संगीत की सृष्टि होती है । 
नीवन के अन्तिम दृश्य को जानते हुए, अपनी आँखों से देखना, जीवन- 
रेहस्थ के चरम सौंदर्य की नम और भयानक वास्तविकता का अनुभव 
केवल सच्छे बीर हृदय को होता है | ध्वंसमयी महासाया प्रकृति का यह 
निरंतर संगीत है। उसे सुनने के लिए हृदय मे साहस और बल एकत्र 
करो। अत्याचार के श्मशान से भी मंगल का--शिव का, सत्य सुंदर 
संगीत का समारंम दह्वोता है ।?? 
हे [ स्कन्दगुम, पृष्ठ ४५ ] 
“समभढारी आने पर यौवन चला जाता है--जब तक माला गूँथी 
जाती हे तब तक फूल क्ुम्हला जाते है । जिससे मिलने के सम्भार की 
इतनी धूमधाम, सजावट, वनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य 
दय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रह सकता मनुष्य की चंचल 
स्थिति तब तक उसे उस श्यामल कोमल हृदय को मर्भूमि बना देती 
है| यद्दी तो विपमता हैं ।2 
[ चन्द्रगुप्त, पृष्ठ १३०-१३१ ] 
प्रसाद के इस व्यापक दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से समझने की आव- 
श्यकता है। प्रसाद जैसे कलाकार का अध्ययन आ्रधुनिक आलोचना 
का विषय होना चाहिये | उससे साहित्य के विद्यार्थियों को अपने जीवन 
के आदर्श प्राम होगे | अभी तक प्रसाद के नाटकों की आलोचनाएँ और 
उनके दृष्यिकोण को पहिचानने के प्रयास कम हुए हैं | डा० जगन्नाथ 
प्रसाद तिवारी और शिलीमुख जी की कृतियाँ इस ज्षेत्र मे प्रशंसनीय 
| प्रस्तुत पुस्तक भी इस दिशा में एक सफल प्रयत्ष है। श्री अ्र्गल 
जी हिन्दी के सफन समालोचक हैं और उन्होने सास्कृतिक और ऐतवि- 
हातिक पृष्ठभूमि पर प्रसाद के नाटकों का विशेष अध्ययन क्रिया है । 
वे साहित्य में सासकृतिक ओर राजनीतिक परिस्थितियों का महत्त्व जानते 
है और इसी कारण वे प्रसाद की नाव्यकला ओर भाव-क्षेत्र की विवेचना- 


कर, 


बड़े सुन्दर ढंग से कर सके हैं। प्रसाद के नाटकों का यह अध्ययन 
सामाजिक ओर राजनीतिक पृष्ठभूमि पर पूर्णतया नवीन और मोलिक 
है। स्थानाभाव के कारण उन्होंने प्रसाद के तीन प्रमुख नायक ही 
चुने हैं । 

श्री अगल जी संगीतज्ञ, चित्रकार और काव्य-प्रेमी भी हैं| इन 
तीनों की समष्टि से वे प्रसाद जी की सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक पात्रों की सावा- 
त्मक सृष्टि पूण रूप से समझने में सफल हुए हैं। देवसेना के चरित्र 
की दिव्य अनुभूति मुझे अ्र्गल जी की समीक्षा में पूर्ण सन्तोषजनक 
मिली | देवसेना के जीवन की संगीत-प्रियता में क्रीड़ा करता हुआ प्रेम 
ओर आत्मोत्सर्ग अर्गंल जी की आलोचना से सष्ट हुआ है। इसी 
प्रकार स्कन्दगुप्त ओर चाणक्य की चरित्र-रेखा भी स्पष्ट हो गई है | 

यह पुस्तक हिन्दी के विद्वान्‌ ओर विद्यार्थियों का ध्यान अपनी ओर 
आकर्षित करेगी यह मेरा विश्वास और सन्तोष है। 

हिन्दी विभाग, 

अयाग विश्वविद्यालय? 
प्रयाग 
२०-४-४४ 


रामकुमार वर्मा 


विषय-सूची 


प्रसाद को नाव्य-्कला 
भारतीय नाठक 
प्रसाद से पूव ओर पश्चिम /“* ' 
प्रसाद की नास्य-कला के मूलतत्व 
कथोपकथन 
संगीत 
अजातशत्र_ 
दाशतिक प्रष्ठभूमि 
कथा-संगटठन 
चरित्र-चित्रण 
अजातशत्रु 
विम्बसार 
स्कन्द्गुप्त 
कथा-संगठन 
चरित्र-चित्रण 
स्कन्दगुप्त 
देवसेना 
भसटाक 
पन्द्रगुप् 
रचना-तिथि 
कथा-संगठन 
चरित्र-चित्रण 
चन्द्रगुप्त 
चाणक्य 
डप्संहार 


पृष्ठ १-६ २ 
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बा १३० 
न १३२४ 
मन श्श्द 
४ >डे पृ४ृ६ 


प्रसाद की नाव्य-कला 
भारतीय नांठक 


नाटकों का जन्म 
अनुकरण प्रशन॒त्ति ही नाख्य साहित्य की जननी है | अ्रतएव नाटक 


जिक्र 


के सभी उपकरण हमारी मानव वृत्तियों में ही अन्तर्निहित हैं। उनके 
लिए न तो हमें समाज की और न संस्कृति की आवश्यकता है । परन्तु 
साहित्य सुव्यवस्थित समाज में ही विकसित हो सकता है ; अ्रतएव 
नाख्य साहित्य का प्रादुर्भाव सभ्यता के विकास केसाथ ही साथ हश्रा। 
आदिम निवासियों की अनुकर प्रवृत्तियों ने धार्मिक उत्सवों पर देवता 
की पूजा को अविक प्रभावशाली शिक्षा-पूर्ण और मनोरजक बनाने 
के लिए उनकी स्तुतियों को एक प्रकार की रासलीला अथवा राम- 
लीला में परिवर्तित कर दिया, जिनमें उन देवी-देवताओं के जीवन की 
अटनाओं का अभिनय एक या दो पात्रों द्वारा किया जाता था। इन 
अमिनयों में संगीत की प्रचुर मात्रा थी ; क्योंकि वास्तव में ये देवी- 
देवताओं की प्राथनाएँ ही थीं | क्रमशः संगीत की सात्रा कम ह्ाती 
गई और बोल-चाज़ की भाषा का प्रयोग इन पूजाओं में होने लगा | 


रे] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


सस्कृति के विकास के साथ ही साथ इन अभिनयो में साहित्य की पुट 
भी दी जाने लगी । 

भारतवर्ष के नाव्य साहित्य दा उद्भव काल ऐतिहासिक हुष्ठ- 
भूमि के परे अंधकार से जिपा हुआ है | वह किस समय विकसित हुआ 
यह ठीक रूप से नहीं कहा जा सकता | प्रारंभ में इसको रूपरेखा क्या 
थी, यह केवल कल्पना से ही या अन्य देशों के नवजात नाट्य साहित्य 
के अव्ययन से ही जाना जा सकता है। यूनान और चीन के नाट्य 
साहित्य का जन्मकाल, उनकी शैशवावस्था तथा किशोरावस्था के विषय 
में हमारे पास प्रचुर सामग्री है । अतएव यूनान और चीन के साहित्यिक 
आधार पर ही हम मारत के प्रारंभिक नाख्य साहित्य की कल्पना कर 
सकते हैं। 

बहुत पहले यूदान देश मे डायोनिसस देवता की पूजा करने के 
लिए लोगो ने अजा-गीतों की रचना की थी । डायोनिसस हमारे यहाँ 
के गणेश जी के समान अद्ट मानव और अद्ध पशु थे | अन्तर केवल 
इतना ही था कि उनका मुँह मानवी था और देह अजा की | इसी 
कारण अजा-गीत गाते सम्य, गायक बकरी का चमड़ा अपने ऊपर 
ओढ लिया करते थे | अजा-गीत वास्तव मे प्राथना ही थी और गाने 
के रूप से एक-दो पात्रों द्वारा कही जाती थी । धीरे-धीरे ये गीत परि- 
वतित होकर ट्रेजडी या दुःखान्त नाठकों के नाम से प्रसिद्ध हो गये। 
सुखान्त नाटकों का भी प्रादुर्भाव इसी रूप मे हुआ था। होली जैसे 
अश्लाल उत्सवों पर लोग गाड़ियों में बैठकर अश्लील गीत गाते थे 
ओर रारते चलते तमाशबीनों पर व्यंग कसते जाते थे। यही अश्लील 
गीत धीरे-धीरे परिष्कृत होकर सुखान्त नाटकों के रूप मे आ गये । 


सत्कृत नाटको का इतिहास 


,._ नाटक्रीय उद्भव दे; इसी आघार पर हम कह सकते है कि हमारे 
चयहां वदिक-काल म ही नाटक रचना होने लगी थी ; परन्तु उसके 


श्र्ता दा 9०% द्उ ्ल्ल्ज 
धर्ताद की साव्य-कला ] [६ 


बास्तविक राप का हनस एता सही | महाभारत और रासायण॒-काज मे हमे 
दो एक साटकों के नाम मिलते ह: परन्तु उन नाटकों की प्रतियाँ श्री 
तक प्राप्त नहीं हुई । नाटकों का ऐतिहालिक जान हमे व्याकरणाचार्यो 
; से मिलता है | पाणिना के कथानुतार उनके बहुत पहले ही 
भारतवप मे नास्य साहित्य पर लक्षण ग्रन्थ आदि बन चुके थे | अतः 
-सिद्ध है कि व्याकरण-काल तक यहाँ पर नाटकों का इतना 

प्रचार हा गया था कि लोगों ने उनक विपय मे नियमादि बनाना प्रारभ 
कर दिया था | पाशिनी का समय लगसंग ३०० ई० 7१० माना जाता 
है, इसलिए भारतवप में ईसा के कई शवाब्दी पूव से ही नाठक रचना 
होने लगी थी। कालिदास का समय जो पहले नाटकों का बालकाल 
समझा जाता था, वारतव मे नाठको के विकास का सध्य युग था। यत्रपि 
यह सत्य है कि कालिदास ेे पृ के नाटकों का ज्ञान न होने से नास्य॑ 
साहित्य का अव्ययन कालिदास के ही समय से प्रारम होता है | 

कालिदास ने मालविकास्निमित्र, विक्रमोबंशी तथा शक्ुन्तला 
तीन बहुत ही उत्तम और विश्वविख्यात नावक लिखे | शकुन्तला तो 
कवि की अमरऊकृति है जो कई भापाशों से अनूदित भी हो चुकी हैं। 
कालिदास के उपरान्त श्री हप ने नागानद ओर रत्ावली नावक लिखे 
तथा श्री शद्धक ने मच्छुकटिक नामी एक सुन्दर और सर्वा गपूर्ण नाटक 
लिखा | इनके परचात्‌ ८बी शताब्दी मे महाराज वशोवर्धन के राज- 
कवि भवमभूति ने नावकशास्त्रों के नियमो मे विशद्ता और संशोधन-सा 
करते हुए अपने कई उत्तम नाटक लिखे जिनमें उत्तर रामचरित, महा- 
वीर-चरित ओर मालती-माधव विशेष प्रसिद्द हैं। इन्होंने अपने नाटकों 
मे नाठ्कीय सिद्धान्तो का उल्लघन भी यथेष्ट किया | परन्तु कवि की 
प्रतिभा ने कहीं भी इनकी कला को नीरस या शक्तिहीन नहीं बनाया | 

€वीं शताब्दी मे भट्ट ने ऑर विशाखदत्त ने सुद्राराक्षस नाठक 
लिखे । इनके उपरान्त राजेश्वर ने वालरामायण और कपू रमजरी की 
रचना की | 


$ ] [ असाद के तीन ऐतिहासिक नाक 


इस समय भारत पर यबनों के आक्रमण होने लगे थे और धीरे-धीरे 
हष का विस्तृत साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया | आपसी बैमनस्य ने भारतवप्र 
को छोटे-छोटे राज्यों मे विभक्त कर दिया | दवंप और प्रतिहिसा के कारण 
हिन्दू राजा एक दूसरे के शत्रु बन गये | हिन्दू साम्राज्य का यह अवसान- 
काल था जिसके साथ ही साथ भारतीय सस्क्ृति, भार्तीय कला ओर 
भारतीय साहित्य भी नष्ट हो रहा था | सस्कृत नाटकों का जो जाज्वल्य- 
सान मध्यात हमे कालिदास के समय में मिलता है, उसकी अस्त होती 
हुई रूप-रेखा हमे बालरामाथण और कपू रमंजरी मे समझना चाहिए | 
थवन आक्रमणो के कारण सस्‍्कृत साहित्य अधकार के गत में विलीन 
हो गया और यद्यपि यत्र-तत्र कुछ सस्कृत साहित्यिको ने अपने 
धंधले प्रकाश से नाख्य साहित्य को आलोकित करने का प्रयत्न किया 
था, परन्तु उनमे रवि का तेज न था | उनकी मलिन ज्योति भिल- 
मिलाते हुए ताराओशों और नक्तत्रों का ही प्रकाश था। मुसलमानी 
आक्रमणो के पश्चात्‌ सस्कृत साहित्य फिर से गौरबान्बित न हो सका । 


हिन्दी साहित्य मे नाटक 


११वी शताब्दी हिन्दी का विकास-काल था और उस काल के 
कवियों ने इसी नई भापा को अपनी क्ृतियों मे अपनाया | स्स्क्कत 
उनके लिए मत भाषा हो चुकी थी | श्रतएव इस काल मे संरकृृत नास्य 
साहित्य की रचना समाप्त हो गई | मुगलो के शासन काल मे साहित्य के 
इस भग की उन्नति न हो सकी, क्योकि एक तो समय और परिस्थितियाँ 
का प्रतिकूल थी और दूसरे मुगल सस्कृति और घर्म में नाट्य 
साहित्य के प्रति पेम न होने के कारण नाटकों को राजकीय प्रोत्साहन 
हि हल मिला | कभी-कभी हिन्दू महाराजाओं के यहाँ रामलीला या 
पतर्मीला-सडली अपने खेल-तमाशे किया करती थीं; लेकिन इनमे 
आमिक प्रदत्ति ही अधिक थी, साहित्यिक रुचि कम | अतः हिन्दी 


से जहाँ काः जा ५ 
हा कविता इतनी उन्नति कर गई, जहाँ उसका निजी साहित्य 


असाद की नाव्य-कला | [९ 


काफी हो गया वहाँ एक या दो साधारण नाटकों को छोड़ कर नास्य 
साहित्य की रचना श्ध्वी शताब्दी तक प्रारम्भ न हो सकी | 

हिन्दी में नाटक रचना भारतेन्दु-काल से ही प्रारभ होती है। कहा 
जाता है कि हिन्दी का सवध्रथम नाटक नहुप भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी 
के पिता श्री गोपालचन्द्र जी ने ब्रजभापा मे लिखा। इसके अनन्तर 
राजा लक्ष्नणसिंह जी ने वोलचाल की भाषा में कालिदास के शक्कुन्तला 
नाटक का अनुवाद उपस्थित किया | परन्तु नाटक खिखने की सच्ची 
प्रेरणा भारतेन्दु के ही हृदय में हुई ओर इन्होंने साहित्य के इस अंग 
की यथाशक्ति सेवा की | कुल छोटे-बड़े सव मिलाकर ३० नाटक 
इन्होने लिखे | जिनमे से कुछ तो न्यूनाधिक रूप मे सस्क्ृत नाठकों के 
अनुवाद हुए, कुछ छातानुवाद या उन पर सभारित हैं | इनके कुछ 
नाटक मौलिक भी हैं, लेकिन इनकी सब से बद्दी मोलिकता खडी-बोली' 
के प्रयोग मे थी । और (इस प्रकार हिन्दी नाटकों का जन्म हुआ |) 

हिन्दी भ नाटकों का जन्म अनुवाद ओर समानुवाद में होना कोई 
आश्वय तनक नही है | क्योंकि प्रायः ८०० वर्षों के पश्चात्‌ नाटकीय 
सिद्वान्‍्ती और उपकरणों को जनता और लेखकों के सामने विलकुल 
मौलिक रूप मे उपस्थित करना अभश्रृेंमव ही था। इस कारण नवीन 
उत्साह उत्तन्न करने के लिए अनुवादों ओर छावासुबादों की सब से 
बची आवश्यकता रहती है। भारतेन्द्र जी ने नास्यशासत्र के नियम- 
उपनियमों पर भी कुछ प्रकाश डालने का प्रयन्न किया था ओर साथ 
ही साथ इन्होने बेंगला ओर भअेंग्रजी नाव्यशासत्रा का उतबाग भी अपनी 
कृत्यों मं किया था; लेकिन इनका अधिक झुकाव ससस्‍्कृत नाट्यशासत्र 
की अं र ही रह | इसी काल मे देहली के श्रीनवासदास जी ने रण॒घीर- 
पग्रममोहनी नाटक लिखा जो विस्तार के कारण र/“मच के योग्य ने 
था। उसका शिष्ट हास्य ही नाटक का गाश है। प० बद्रानारायण 
कृत भारत-सौमारय में भी यही दोप आ गया है। नाटक काफी लम्बा 
है ओर ६० पात्रों का अमिनय में भाग लेना नाय्कीय दृष्टि से एक 


2 द्रीस पति गरऋू लाइक 
६] [ अलाद के तीन ऐसिहालिक चाट 


जि 


कठिन समस्या दे | इसी समय प० शालक्ृपर सह, लाला सीताराम जी 
ओर राधाकृष्णदास जी ने भी कुछ साठक लिखे लेकित इससे; राथा- 
कृष्णठास जी का महाराणा प्रवायः ही सर्वाध खुत्दर है आर देह 
सफलता से अभमिनीत सी हो चुका ढ । । 
अनुवाद की पद्रात ता पहल से चली आा सहा था ते कत ट्रिवरदा- 


पु 
े 


युग की अनूदित ऋृतियाँ बहुत ही सुन्दर ओर भावए्ण #| | लाहा 
सीताराम जी ने सस्क्ृत के नाठको का अनुवाद किया तिनम सागनद 
मसच्छुकटिक, महावीर-चरित, मालती-माथब ओर उन्तरनमचास्त 
बहुत ही सकल अनुवाद हुए हैं| सागा सरल ओर प्रदाहयुक्त है | 
मूल के भावों के फेर म पड़कर अनुवादक ने साण का क्लिष्ट आड़ 
अथरहीन नहीं बनाया है । श्री सन्‍्वनारायण जी ने मालती-माधव आऋरि 
उत्तर-यमचरित का अनुवाद किया | कविताओं का अनुशद पदित जी 
ने बड़ी भावपूर्ण अजभापा में किया है, लेकिन मूल के भावों कछो यथा- 
शक्ति अनुवादित करने में इनकी भापा कई जगह क्लिप्ट हो गई हे | 
श्री रामकृष्ण वर्मा, गोपालराम गहसरी और रूपनाराबण पाडे जी ने 
दिजेद्ल्‍रलाल राय ओर गिरीशचन्द्र घो० के नाठकों के अनुवाद हिन्दी 
में प्रस्तृत किये । इन अनुवादों से पांडे जी का दुर्शाढास बहुत ही 
सुख्दर है | अन्य भाषाओं से भी अनुराद होना प्रारंभ हुआ जिनमे 
महाराष्ट्र भाषा के छुत्रसाल नाटक का विशेष आदर हुआ | 
अश्ी तक साहित्यिक नाटक हिन्दी मे नहीं लिखे गये थे, लेकिन 
जनता की रुचि नाठकों की ओर काफी बढ चली थी | पारसी साठक 
कंपनियों के नाटक हिन्दी ओर उठ को खिचद्ा रहा करते थ जनम 
उदय झार गद्य का विचित्र सम्मेलन होता था। गद्य में बलते-बोलते 
पात्र का पद्म का आज्रय लेना स्वाभाविक समझा जाता था | ढेश, 
काल आर पात्रा का थी विचार न रखा जाता था | वास्तविकता और 
स्वाभाविकता की और ध्यान देना दर्शकों की करतत्नब्वनि के सामने 
अधिक प्रशसनीय न था | और यह करतलब्वनि, शेरबाज़ी में प्रत्यक् 


प्रसांद की नाव््य-कला | [ ७ 


2 है 


है 
० 


शर के बाद मिल लाया करती थी। ऐसे रंगमंच और जनता से न तो 
सचि ही परिप्कृत हो सकती थीं और न स्ाहठित्यिकों का 
प्रयत्न छी सफल हो सकता था | पारसी कंपनियों के लेखकों मे पं० 
ह्रीकृप्ण जाहर ही पहले लेखक थे जिन्होंने महाभारत नामक नाटक 
कलकत्ता की पारसी ऋम्पर्नी द्वारा खिलाकर भारतीय विष्यों की ओर 
इन कम्पनियों का ध्यान आकपित फिया। पं० राशेश्याम कथावाचक 
जी भी इर्न्दी श्री एयॉ के नाट्ककारों में से हैं इनके एक दो नाटक कुछ 
जत् अय्य क भी 

प्रसाद जी हिन्दी साहित्य के सवप्रथम मौलिक नाटककार हुए। 
इन्होने एक ओर तो प्राचीनता का ध्यान रखा, दसरी श्र अंग्रेजी 
आर वबेगला साहित्य से प्रभावित होकर नवीन माग ग्रहण किया | इस 
तरह इनकी नाव्यशैली प्राचीन और अर्वाचीन नाव्यशैनी की सम्मे- 
लनमृमि है | एक ओर न तो आप पूर्ण आधुनिक ही हैं श्रोर न 
दूसरी ओर नितांत प्राचीव | उन्नीसवीं शताब्दी के'अन्तिम चतुर्थांश 
मे जन्म लेने ओर बीसवीं शत्ताब्दी मे कला-विकास होने के कारण 
उनकी रचनाओं ओर चरित्र भे १६ वीं ओर २० वीं दोनों शताब्दियों 
के उपकरण दिखाई देते हे । 

“उन्नीरुवीं शताब्दी ने उन्हे रोमांस के प्रति कुकाव, मस्ती, 
बविलासितापूण सरसता और मंसदों से यवारूस्मव अलग रख कर 
सासान्य सुख के साथ जीवन बिताने के भाव प्रदान किये और 

ग्रीसवीं शताब्दी थे उन्हें योवन का अवाह, परिवत्तनोन्मुखी प्रवृत्ति, 

भारतीयता की आर झछुक्राव, विदृग्धता तथा अ्रस्थिर बेदना का 

दान दिया ?!* 

नाटकों के अन्तर प्रवाह भें इस वारतविकता और आदश का 
नूठा मिलन है | जिसने प्रसाद के नाटकों को एक मौलिक रूप दे 


से 


| 


रफे 
| 


गये 


थ, 


१सुमन जी--- कवि अछाद की काब्य-साथना 7? 


८] [ भ्साद के तीन ऐतिहासिक नांटक 


दिया है | इनकी नाव्यशैत्ी पूव और परिचिम से प्रभावित अवश्य है 
परन्तु उसमे मोलिकता भी है | 
के ध [इन 
प्रसाद में पूव और पश्चिम 

आधुनिक नाटकों से पश्चिमी प्रभाव 

आधुनिक हिन्दी नाव्य रचनाओं पर मुख्यतः बंगाची, अगरेज़ी 
ओर सस्क्षत नाव्यशासत्रों का ही प्रभाव पढ़ा है | इसके अभी तक कोई 
भी मौलिक सिद्धान्त नही। हिन्दी नाटक की यह शैशवावस्था ही है। 
अतृ्ब यह स्वाभाविक ही है कि वह दूसरों के सहारे चलने का प्रयत्न 


दिया 


कई । कही कही कुछ नाठककारों ने अपनी प्रतिमा के बल पर अपनी 
मोलिकता रखने का प्रयत्ञ किया है; परन्तु ऐसे उदाहरण कम ही हैं 
जहाँ पर उनकी मौलिकता अधिक सफल हो सकी हों। मुख्यतः 
अगरेज़ी नाठको का ही प्रभाव आधुनिक नाटककारों पर अधिक है 
क्योकि आधुनिक शिक्षा मे ओगरेज़ी का स्थान प्रमुख होने के कारण 
सभी लोग उसके साहित्य से भिन्न हैं | दूसरे, बगाली साहित्य जो बहुत 
अंशो में अगरेज़ी नाटकीय सिद्धान्तो से प्रभावित हैं, भारतेन्डु काल से 
ही हिन्दी लेखकों को अपनी ओर खींचने लगा था | इस प्रक्नर हिन्दी 
नाटकों पर बगाली साहित्य के द्वारा अंग्रेज़ी साहित्य का अप्रत्यक्ष 
प्रभाव बहुत दिनों से रहा है | यहाँ एक वात स्मरणीय है कि यूनानी 
तथा अर्वाचान श्रेगरेज़ी नास्थ-सिद्धान्त भारतीय्‌ नास्वशाला के अच्षु- 
ऊल नहीं हैं | इसलिए अगरेज़ी के एलिजावेथ कालीन नाटककारो का 
हो प्रभाव हिन्दी म अश्चक देखने को मिलता है शेक्सपियर और 
उसके समकालीन नाटककार अपने नाटकीयु आदशों और सिद्धान्तों 
सम सस्क्ृत नात्यशाब्र के अधिक समीप हे ह उनका वाटयावरण भारतीय 
सस्क्कत नाडकों के रोमान्टिक वातावरण के समान ही रहा है । यही 
कारण है कि इब्सन, शा और गेल्सवर्दी आदि का प्रभाव राय तथा 
अन्य बंगाली नाठककारों मे कम दी दिखाई देता है | हिन्दी में इब्सन 


जा 


प्रसाद की नाव्य-कला | [६ 


के नाटकों के अनुवादों को छोड़ कर अभी तक कोई भी ऐसी कृति 
नही जो अंग्रेऩी साहित्य के आधुनिक मनोवेगो से भरी हुई हो [.हाँ 
एकाकी नाटकों की बहुलता अवश्य ही आधुनिक पश्चिमीय एकाकी 
नाटकों के कारण है ओर सामाजिक समस्याओ्रो, कथासंगठन, भापा 
प्रभाव नही के बराबर है | यत्र-तत्र कुछ प्रयन् भी इस ओर किये गए. 
हैं, परन्तु वे अधिक सफच नहीं कहे जा सकते । 

असाद जी की नास्य-रचना बगाल के द्विजेन्रलाल राय के नाटको: 


से अधिक प्रभावित है और राय बाबू के नाटक स्वयं ही पश्चिमी 


प्रभावों से ओत-प्रोत हैं। अतएव प्रसाद जी की रचनाओं में पश्चिमी 
नाव्य-सिद्धान्तों के उपकरणों का होना स्वाभाविक ही है [साथ ही 
अपनी रुचि और संस्कृति के कारण प्रसाद जी सब से अधिक भारतीय 
भी हैं, इसलिए प्रसाद जी की नासख्य-कला एक रूप से पूव और 
पश्चिम नाव्यशासत्रों की सम्मेलन-मभूमि है. जिसको उन्होंने अपनी 


प्रतिमा के बल पर बहुत कुछ नया रूप दे डाला हे | 


संनकृत नाटको मे कारुणय 


संस्कृत नाटकों का निर्माण धामिक नीब पर ही हुआ है । धर्म 
के मिद्वान्त ही नाटक के उपकरणो म विखरे हुए थे। अ्रव्यात्मवाद में 


 ओोतप्रांत राष्ट्र के लिए यह स्वाभाविक ही था क्रि उसका साहित्य भी 


अध्यात्मवाद का ही एक रूप हो | अतएवं गीता में बतलाये हुए. 

अनाश्रितः क्सफतल' का। कम करोति यः । 

स सन्‍्यासी च योगी च न निरप्िनचाक्रियः ॥ 

न रा नि 

न जायते म्रिपते न कद्ाचन ..... न हन्यते हन्यमाने शरीरे । 
कर्स की प्रधानता और आत्मा की नित्यता मे विश्वास सस्कृत साहित्य 
के प्रत्येक अंग पर अपना अस्तित्व जमाये हुए है | हमारा जीवन हमारे 


३० | [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


पूवकर्मों का फल है यदि हम सुखी हैं तो यह सुख्व हमारे पुए्यकर्मो 
का पुरस्कार है आर दुःख हमारे नीच कमा का दश्ड | ईश्वर ही हमारे 
कर्मो की परख करता है | नित्य अच्छे कर्म करने पर आत्सा नित्यप्रति 
उर्नात करता हुई मांज्न पाकर आवागमन के बन्धनां से छट जाती है । 
जब तक आत्मा से पूर्ण शुद्बता नहीं तब तक लिवाण उसके लिए 
सम्भव नही | भिन्न-भिन्न रूप, भिन्न-भिन्न जीव उसी एक सचा के रूप 
हैं - सव से हमारा यही आत्मा विद्यमान है। पुण्यकर्स करने पर 
आत्मा एक शरीर छोड़ अच्छे शरीर को घारण करती है। आत्मा 
परमात्मा का ही अ्रश हे, वह नित्व है अमर है। करे की प्रधानता 
ओर आत्मा की नित्यता से विश्वास करने के कारण संस्कृत नाथ्का- 
चार्यो' के सिद्धान्त यूनानी नाटकाचायों से भिन्न हो गये | संस्कृत 
नाटकों से यूनानी नाटकों के समान दुखान्त नाथ्क नहीं है; क्योंकि 
यहां पर झत्यु इतनी आंधक दुखदायी नहीं जितनी पश्चिस मे | झुत्यु 
हाना केवल आत्मा का एक वस्त्र त्याग कर दसरा वस्र धारण करना 
ही तो है | जब्र तक चोरासी लाख योनियों का चक्र जीवात्मा पूरा न 
करती तब तक उसे मोक्ष कहाँ ? मृत्यु हमे हमारे अन्तिम उद्ृश्य का 
ओर ही तो ले जाती है--वह तो केवल नये जीवन का सन्देश ही है । 
फिर झृत्यु से दुख क्‍यों ? यही कारण है जिससे संस्कृत नाथ्कों से हमे 
यूनानी जैसे दारुण हुखान्त नाटक न हा मलते | 
आपात्तया का सामना करना प्रत्येक महान्‌ पुष्प का कत्तव्य है | 
वहीं तो सोने की परख बताती है, “कष्ट हृदय की करूोटी हे । तपस्या 
अप्लि हे?--देवसेना | इस कारण जो जितनी आपदाओं का सामना 
करेगा उसका आत्मा उतनी ही अधिक प्यसान होगी। आपत्तियाँ 
डव के नही, सुख के क्षण हैं| उनसे द.ख देखना अपनी आत्मा के 
सीति अपराध करता है। आपदाएँ मोक्ष का उुगम पथ हें, हमारी परीक्षा 
_। उत्तम साधन | दूसरे हमारे इस जीवन का दःख हमार पूर्वजन्स 
5 कसा का फल है जिसे हम भोगना ही पड़ेगा। वह हमारे दष्कसो 


१ 


प्रसाद की क्ताज्य-फकला ] [ 4५ 


का परिणाम है, आत्मा की सचिनता घोने के लिए हम कष्ट सहने 
है| होगे | शक्रुल्तला की आपत्तियाँ उसके आीिवि-सत्कार मे मूल होने 
के फलल्वरूप थीं। देदी सीता की कव्णावस्था उनके पूवजन्म की 
भूल का दगद् थी। इसी कारण ही इन देवियों की करण गाथा इस 
रा के हदव को अधिक से हिला सकी | 
फिर भी यूत्यु आर आपत्तियाँ ससार की कठोर समस्याएँ हैं | अतः 
संस्कृत नावकाचाज ने सृत्यु का रगशाला पर दिखाना वर्जित कर 
द्विवा है: क्योकि उनके आडर्शानुसार साहित्य का उद्देश्य सुख और 
शान्ति का संदेश देते हुए जीवन का आदश स्थापित करना है। इस 
कारण मी र२रक्षन में रुखात्त नाइकी की रचना नहीं हुई। करुण-रस 
नाटकों में अवश्य रहता था लेकिन उसमे वह तीत्रता न रहता थी जो 
शेक््सपिवर की ट्रेजडिया मे हम मिलती है। प्रसाद जी के तीनों 
.. एविद्ासिक नाटक करूणु रस से परिपूण है। और यद्यपि चन्द्रगुप्त का 
अन्तिम अक सुस्बान्त है, परन्तु रकनद और अजातशत्र से सुख और 
सफलता के सागर में करुणु रस की हिलोर ही उठती दिखाई ढेती हँ। 
स्कलदगुस के अन्तिम दृश्य से जो करुणता व्याप्त है, वह वराग्य का 
भाव हमारे हृठव में उत्पन्न कर ठेती है। वेव्ना ओर स्कनन्‍्द का 
त्थाग, उनके जीवन में आये हुए घोर नराश्य के फलस्वरूप ही तो है | 
हृदय की कामल कल्पना सो जा, जीवन सें जिसकी। 
सम्भावना नहीं। जिसे द्वार पर आये हुए लोटा दिया था। 
उसके छ्िए घुकार सचाता कया तेरे लिए कोई अच्छी बाद हे 4 ) 


जे 
; 


ग्राज़् जीवन के भावी सुख, आशा ओर आकांक्षा--सब से मे 

विद्या लेती हूँ ।"** 7 2 

परन्तु यह कारुणय शेक्रसपियर के अन्तिम दृश्यों मे फ्रितना भिन्न 
है-._ूसम शोक नहीं, दुस्ब नही, हृदय को हिला देने वाली करुण॒ कथा 
'नही--क्वल जीवन का महान आदेश रखते हुए शान्ति म॑ उसकी 
समाप्ति है। छदय इस लॉक 7 गौड़ अन्य लोक भ जा पहुँखता है | 


35, 


न लमक 


4० हे 


4 टअन+++ 


3३ ] [ प्रसाद के तीन एंतिहासिक नाटक - 
स्कन्दगुप्त की ये अन्तिम पक्तियाँ किसके हृदय में त्याग का भाव उत्पन्न 
न कर देगी । 


“क्रप्ट हुदय की कसौटी है। तपस्या अप्नि है। सम्राट यदि 
इतना भी न कर सके तो क्‍या ! सब च्ञणिक सु्खों का अन्त है। 
जिससे सुर्खो का अन्त न हो इसलिए सुख करना ही न चाहिए ।/ 
मेरे इस जीवन के देवता ! और डस जीवन के प्राप्य क्षमा 7? े 
इतिहास की दृष्टि से महाराज विंवसार की मृत्यु अन्तिम दृश्य में 
आवश्यक थी, परन्तु मरणान्त होते हुए भी अजा-शत्र सुखान्त नाठक 

रहा है | हृदय की उत्कट वासनाओं का अन्त शा/न्त्र में हता है। 
विरुद्धक, श्यामा, मागन्ची, छुलना और अज्ञात अपने अपने चित्त के 
विकारों को छोड़कर सत्पयथ पर आते हैं | यद्यपि जिंवसार का अन्तिम 
अंक से लड़खडा कर गिरना उसकी मृत्यु का द्योतक हे, परन्तु यह दृश्य 
सुख और शान्ति का ही दृश्य है। महाराज जिंबसार की मृत्यु “ओह 
, इतना खुख से एक साथ सहन न कर सकंगा”? कहते हुए ही होती है 
साथ ही भगवान्‌ गौनम का प्रवेश आर उनका अमर हाथ उठाना 
विंवसार के हृदय की तथा उस अवसर की पूण शान्ति का सूचक है। 
अजातशत्र्‌ का कथानक कुछ अंशों से शेक्सप्रियर के रिचई_ द्वितीय 
ओर किंग लियर से मिलता है। परन्तु प्रसाद जी का नाटक शेक्सपियर 


के लाटक से बिलकुल ही भिन्न है। अजातशत्र नाटक शेक्सपियर के 
हार्था मे फिग लिपर के समाव भयानक टे जडी हती ॥ 


जावन का महान आउश' उपात्थत करने के लिए तथा नाटकों 


हारा जनता म सुब शाति का सन्देश देने के लिए सस्कृत नाठकों ने 
बट नियम बना रखा था कि नाखकों के नायक सव॒लोक प्र द्ध हों तथा 


उनक्कथानक हमारे घामिक अथवा ऐतिहामिक 
रावात्रीं वा देवताओं के 


सनार 


ग्रथां से हा लिये जाव | 
जीवन साधारण-जनममूह के लिर वेसे ही 
गक रहा करते हैं। साथ हो ऐसे चरित्र दर्शकों के हृदय मे अपने 
आप हा उुस्य के प्रतत प्रीति और पाप के प्रति घृणा उत्पन्न करा सकते 


'असाद को नाव्य-कला | [ १३ 


हैं। पाप का पतन दिखाने के लिए या नायकों के चरित्रों के आ्रादशों 
को अधिक दीतमान करने के लिए. खल-नायकों (५॥]]०॥॥) के पूर्य 
विकसित चरित्र भी रखे जाते थे; लेकिन पश्चिमी दृष्टि से यहाँ पर 
कोई (00॥08 ४ ७५(0७ न होता था जहाँ कि पापी अपने दष्कर्मा का 
परिशान भागे आर पुण्यात्मा विजयी हों। पापी की सबसे बड़ी यंत्रणा 
उसकी मनोवेदना है--उसकी आत्मा की भत्सना है । अतएव भौतिक 
वा शारीरिक कष्ट न दिखला कर, साथ हो नायकों का महान आदर्श 
उपरिथत करने के लिए प्रत्येक पापी नायक द्वारा क्षमा कर दिया 
जाता था| इस प्रकार इस चरित्रो, के द्वारा तथा उनकी जीवन-घट- 
नाओ के द्वारा नाटक एक आदश वातावरण काही चित्र मालूम 
होता था। भठाक की भत्सता ओर स्कन्द, चाणक्य अथवा बिंवसार 
का ज्ञमा-दान इसी रूप मे ही 

कम का आदश सस्कृत नास्यकारों के सम्मुख सदा ही रहता था 
और इस दृष्टि से त्याग और सेवा नायक के सबसे बड़े गुण थे | 
चाणुक्थ सचमुच में कूटनीति का निर्माता था और उसका कौटिल्य नाम 
उसके चरित्र का ही ब्ोतक है | लेकिन उस ब्राह्मण ने जो कुछ किया दूसरों 
के लिए--स्वय के लिए नहीं | इसी कारण बह मुद्राराक्षस का नायक 
हो सका | चन्द्रगुम का चाणक्य भी कर्म के इसी आदर्श की सावना है | 

“सोयर्य तुम्द्वारा पुत्र आर्थ्यावर्स का सम्राट है। अब और 
कौन सा सुख छुम देखना चाहते हो ? कापायथ अहण कर लो 
जिसमे अपने अभिमान को मारने का तुम्हे श्रवसर मिलेणा ॥?? 
हक अं हज 
“कितना गौरवसय श्राज का अरुणोद्य है । भगवान्‌ सविता 
तम्हारा आलोक जगत्‌ का मंगल करे। में आज जेसे निष्काम्त हो 
हाह 07? 

चक्रवर्ती सम्नाट भी अपना काय करते हुए अन्त में तपोभूमि की 

नयर ही जाते है | इस उद्देश्य के कारण सस्क्ृत नाठको के अ्रन्तिम 


] 


१४ ] [ असाद के तीन एतिहासिक नाटक 


दृश्य चाह व करुण रस से ओंतप्रोत हो या उनसे सुख का समीर 
बहता हो, सदैव एक अनुपम शान्ति लिये हुए रहते हैँ | जो शान्ति 
इस ससार के वातावरण से भिन्न हमे दूसरे वातावरण की ओर ले 
'जाती है | प्रसाद जी के सभी नाटकों का अन्त इसी शान्ति में होता 
हैं। उनमे एक प्रकार का वैराग्य भाव मालूम होता हे | 
“यदि मे सन्नाट न होकर किसी विनन्न लता के कोमल 
किंसलय झुरसुट से एक अधघखित्ा फूल होता और ससार की दृष्टि 
सुझ पर न पडती, पवन की किसी लहर को सुरभित करके धीरे 
से डस थाले से चू एडता, तो इतना भीषण चीत्कार इस विश्व से 
न सचता ।?--अजातशज्न 
रा रा नर 
स्कन्दगुतत और चन्द्रगुत नाटक के अन्तिम दृश्यों के उदाहरण 
हम ऊपर उद्बृत कर ही चुके हैं। 
आदश वातावरण चित्रित करने की दृष्टि से संस्कृत नाथकों मे 
नित्यप्रति की बातों का प्रदर्शन वर्जित था । कठु सत्वता ओर भौतिक- 
वाद रणमंच पर दिखाना आचायों' के सिद्धान्त के प्रतिकूल था, क्योकि 
ऐसे दृश्य आदश लोक के निर्माण मे वाधक रहते हैं| इसी कारश 
भरतमुनि ने लम्बी यात्रा, हत्त्या, युद्ध, राजबिद्रोह, खाना-पीना, कपड़े 
व्य पि 3 2. दि का दिखलाना निषेध कर दिया था। प्रसाद जी ने 
“3 नियम के विरुद्ध जो दृश्य रखे है, वे केवल पश्चिमीय नागको के 
भाव के कारण ही । ४४७४७ 


हे 

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रह 
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2 
+ 


सस्कत नाटका मे प्रकृति वर्णन 


. डत नाटकों के धामिक सस्कारों के कारण ही उनका प्रकृति 
वणुन अतिरज्जित हो उठा है| आत्मा केवल मनुष्य से ही नही है| 
परमात्मा विश्वात्मा है। झतएव क्या फल-फूल, क्या पशु-पत्ञी सब से 
“हादर का संबंध, सभी एक दूसरे के दुःख से दुखी और एक दूसरे के 


प्रसाद की नाव्य-कला | [ १५ 


सख से सुखी होते है । सीता ओर हा ऊन्तला का वियोग उन्हीं तक 
सीमित ने था | उसमे प्रकृति की भी प्रण सहा नुभूति थी | पू् प्रकृति 
उस विप्दात्मा का प्रतिव्मि हा ता हे | रहस्थवादी_ कवि सी झात्मा 


शा +५ 


की नित्यता और जीब का एकता मे विश्वास करता है, ओर प्रथम 


रहस्ववादो कब्र होने के कारण भी प्रमाद जा इस प्रभाव से अछूते 
ही कच ने | वब्पि संसार के क्रिसी भी देश के नाटकों में रहरबवाद 
नहीं पाया जाता लेडिन प्रसाद जी के सहह्यबार का प्रभाव उनके 
नाटकों पर थोडा बहुत अवश्य है | डेवमेना प्रञ्मति देवि की ही संम्य 
मृर्ति है । उसका संगीत और फूलों से लद॒ हुए पारिजात का संगीत 
एक हो दे । 

“तम्ने एकानत टीले पर, लब से अलग, शरद के सुन्दर 
प्रभात में फूला हुआ, फूल से लबा हथ्ा पारिजात दक्ष देखा हे! 

“हीं ता । 

“उसका स्वर अन्य दुक्षों से नहीं मिलता । वह अकेले अपने 
सौरभ की तान से दक्षिण पवन से कटा डत्पन्न॒ करता है, कलियों 
को चटका कर, ताली वजाकर ऋम-कूस कर नाचता हैं। अपना 
नृत्य, अपना संगीत वह स्वय देखता है; सुनता है । डसके अन्तर 
मं जीवन शक्ति चीणा बजाती है । वह बडे कोमल स्वर मे 


4 


गाता दै-+ 
घने गेम तरु तले 2 


संस्कत नाटकों मे चरित्र चित्रण 


स्कृत नाय्का की तींसरी विशेषता उच्तक चरित्र-चित्रण की हैं १ 
यूनानी नाटकों के प्रतिकूल संस्दत नावकों भें चरित्रों की संख्या 
अधिक रहा करती थी ओर उनमे सभी वर्गों के चरित्रों का चित्रण 
भी होता था। रस्क्षत नाख्यशाख्रों ने चरित्रों को कई वर्गा से विभाजित 
किया है और साथ ही अत्यक दा की मुख्य-सुख्य बातों का समावेश 


4६ | [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


किया है| प्रसाद जी के नाथकों में यद्यपि नाटक्रीय पात्रों की भग्मार 
है परन्तु उसे सस्कृत का प्रभाव कहना भूल होंगा। नाटककार की 
चरित्र निर्माण-शक्ति स्वयं नाटककार की प्रतिभा और कल्पना पर 
अवलबित रहती हे--वाह्म प्रभावों पर नहीं । 


सस्कृत नावकों का वातावरण यूनान के नाटकों के वातावरण के 
समान प्रत्यक्षबादी नहीं रहता | संस्कृत नाठक देवी-देवताश्रों के चरित्रों 
द्वारा, पौराणिक और ऐतिहासिक कथा संघटन द्वारा ओर अपनी 
कल्पना शक्ति के सहारे एक देवीय, अलोकिक, आादर्शात्मक वातावरण 
को निर्मित करते हैँ | यूनानी नाठक भी यद्यपि अतिप्राकृत (30७ ३। 
0४/ए074)) शक्तियों को रंगमच पर लावे हैं; परन्तु वे अप्रत्यक्ष रूप से 
ही, इस संसार के लोगों को खिलोना सात्र समझ कर ही, काम करती 
हैं | यूनानी नाटक की केथारसिस और भाग्य का व्यंग हमारी वास्त- 
विक परिस्थिति को ओर भी अधिक विकट बनाने को रहा करती है। 
प्रताद जी के नाटक इस रूप से भी संस्कृत के नाटकों के अधिक समीप 
हैं| उनके कथानक, ओर पात्र आदशलोक का ही निर्माण करते हैं 
ओर यद्यपि उनके नाठको मे देवी-देवताश्रों तथा लोकोत्तर शक्तियों 
को स्थान नहीं दिया गया है, परन्तु उनके आदर्श चरित्र भगवान्‌ बुद्द, 
मल्लिका, वासवी, देवकी, देवसेना, आदि अपने दैवीय गुणों में 
किन देवताओं से कम हैं ! संल्कृत के इस आदर्शलोक मे वास्त- 
विकता लाने के लिए. नाट्क्राचार्यों ने विभिन्न प्रान्तों की बोलियों का 
उपयोग करने की आजा ठी है | उनके ब्राह्मण और राजकुमार आदि 
देववाणी संस्कृत मे बोलते हैं, त्लियाँ प्रात मापा से, और अन्य चरित्र 
अपने-अपने प्रान्तों की बोली का उपयोग करते हैं | प्रसाद जी ने 
आन्तीय बोलियों का उपयोग नहीं कराया है, लेकिन वास्तविकता 


रखने के लिए भिन्न-मिन्न पात्रों की सापा से चरित्रानुसार काफी अन्तर 
कर दिया है। 


असाद की नाव्य-कला | [१७ 


संस्कृत नाटकों में काव्य 

संस्कृत नावकों से काव्यानुरक्ति अधिक देखने से आती हे, ओर 
इस दृष्टि से वे एलिजावेथ कालीन नाव्ककारों से बहुत अधिक मिलते 
हैं | गद्य मे बात करते करते वे पद्म का अनुसरण करने लगते है । भिन्न- 
भिन्न छुम्दों मे सुन्दर कविताएँ नाठककारों ने सजा कर रखी हैं। ये 
कविताएँ कहीं तो गाने के लिए हैं और कहीं केवल पठन करने के 
लिए ही । प्रसाद जी ने अज्रातशत्रु म अधिकतर सस्क्ृत नाथकों का ही 
अनुसरण किया है। यद्रपि झ्राधुनिक वारतविकता कीओर ध्यान रखते 
हुए उन्होंने पद्य के इस उपयोग में बहुत परिवर्तन कर दिया है | स्कन्द- 
शुप्त ओर चन्द्रगुप्त में उन्होंने इस नियम को पाला नहीं। फिर भी 
भारतीय संस्कृति को वे छोड़ न सके | पद्म की शपेक्षा उन्होंने गद्य- 
काव्य का ही उपयोग अधिक किया है | सस्झृत नाठकों में पद्म का यह 
उपयोग आदश वातावरण उपस्थित करने के साथ ही साथ रस-सचार 
करने के लिए भी होता था | प्रसाद जी के ये स्थल भी नाटकों को इस 
आधुनिक वातावरण से दूर प्राचीन भारत में ले जाते है। वे हमारे 
सामने नित्यप्रति के जीवन से भिन्न एक नया जीवन उपस्थित कर देते 
हैँ जिसकी ओर हम सतृष्ण देखा करते है | 


पश्चियी ओर संस्कृत नाटक 


संसक्षत नावक पूर्ण रूप से (807797080) रोमाटिक नाटक थे | 
इस कारण वे अंग्रेजी के शेक्सपियर आदि ऐलिजावेथ कालीन नावकों 
से बहुत अधिक मिलते है। पश्चिमी नाटकों का जो प्रभाव बंगाली या 
भारतीय भाषाओं पर पड़ा उससे एलिजावेथीय नाठ्को का प्रभाव 
'मुख्य है; क्योकि वे सस्कृत नाठकों से कई बातों में पूर्ण रूप से मिल 
जाते हैं | दिजेन्द्रताल राय के नाटक शेक्सपियर से अधिक प्रभावित 
हैं, और प्रसाद जी के नावको पर भी यदि पश्चिमी प्रभाव कहीं दिखता 
है, तो बह भापा ओर वातावरण मे ही, ओर इस रूप में वे पश्चिमी 

र्‌ 


4८ | [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नादक 


आधुनिक नाटकों से दूर शेक्सपियर के नाठकों के समीप ही दिखते है । 
आधुनिक रुचि के फलस्वरूप भी प्रसाद जी ने नाठक रचना से संस्कृत 
नाव्यशास्त्रो की कई बाते छोड़ दी है ओर पश्चिमी नाटकों की कई 
बातें ग्रहण कर ली है। लेकिन स्थूल और ऊपरी छोटी-छोटी बातों को 
छोड़ कर यह दिखलाना कि प्रसाद जी पर कितना पूर्वी ओर कितना 
श्चिर्मी प्रभाव है--एक दृष्टि से असम्भव ही हे--क्योंकि कला के 
नियम सावभौमिक होते हैं: अतएव पश्चिमी ओर पूर्वा नाठकों का 
मुख्य अन्तर, जो हम ऊपर देख आये हैं, छोड़ अन्य वात एक हो 
सी मालूम होती है। कला के उद्देश्य से भी कई पश्चिमी नाय्काचार्य॑ 
संस्कृत नाटकों के समीप आते हैं| होरेस का, नाठक का पाँच अंको से 
विभाजन ओर रंगमंच पर अच्छी बाते ही दिखाना सस्क्ृत नास्थशास्त्र 
के सिद्दान्त के ही अनुकूल है । सिडने ओर रिन[सेस के नाव्य-आलोचक 
तो अपने सिद्धान्त के प्रतिपादन मे सस्कृत के नाटक के उद्देश्य को 
हो अपनाते हुए मालूम होते है, यथा सिडने का यह सिद्धान्त, कि 
“नाटककार को कला का उद्देश्य पूर्ण करने के लिए, (जनता का) मन्तो- 
रंजन करते हुए शिक्षा देना चाहिए”, संस्कृत के सिद्धान्त का ही रूपान्तर 
सात्र मालूम पड़ता है। भारतीय नाटकों का अलोकिक वातावरण 
ओर करुणापूर्ण सुखान्त ऐलिजावेथीय रोमान्टिक ट्रेजिक-कामेडी 
से इतना अधिक मिलता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी का राज्य जमने 
पर १६वीं शताब्दी से एलिजावेथ कालीन नाग्कों ने सारतवर्ष से 
अपनी दृढ नीव जमा ली। अन्य बातों में भी संस्कृत नाटक और 
पश्चिमी नाठक के सिद्धान्त एक से ही है। संस्कृत नाटकों के कथा- 
संगठन और चरित्र-निर्माण के सिद्धान्तों मे कोई विशेषता नथी 
कंवल नागककारो को देव-चरित्रो ओर लोक-विदित घटनाओं का ही 
ससाहार करना पड़ता था। प्रधाव ओर प्रासंगिक द्वोनों प्रकार की 
उटनाओ का निवाह साटकों से होता था। यूनानी काल ओर समय 
पकलतन के सिद्धान्त संस्क्ष। नावकों मे नहीं था; फिर भी कहीं-कही 


प्रसाद की नाव्य-कला | [१६ 


नाटककारों ने इन नियमों को रखा है | रत्नावली के सभी अ्को की 
घटना राजप्रासाद के उपयन के भिन्न-भिन्न भाणयो मे ही होती है, परन्तु 
इसे नियम का अपवाद ही समझना चाहिए। 
नाटक मे प्रायः पाँच से दस अक तक रहा करते हई और उनसे 
कथावस्तु को फल की और अग्रसर करने वाली पाँच प्रकृति रहती हैं--- 
जो बीज, पताका, बिन्दु, प्रकनगी और काय कहलाती हैं । पूरा कार्य 
प्रायः पाँच भागों में बाँठा जाता है आरम्भ, प्रयत्न, प्राप्याशा, निय- 
ताप्ति ओर फलागम | अवरथाएँ केबल कारय या व्यापार »/ खला की 
भिन्न-भिन्न स्थितियों की झचक है | अर्थ प्रकृतियाँ कथावस्तु के तत्त्वों की 
झोतक हैं। रचना की दृष्टि से नाटक के विभाग सधियों द्वारा बतलाये 
जाते थे | थे सन्नियां भी पाँच हैं--मुख्ब, प्रतिसुख, गर्भ, अवमश और 
निवहण संधि | कथानक की ये प्रकृति अवस्थाएँ और सथधियाँ संस्कृत 
नाटकों की अपनी निजी कोई वस्तु नहीं, प्रायः सभी नाटकों के कथा 
विकास में ये अवस्थाएँ रहती हैं । 
नाटक का प्रारम्भ पूर्व रग से किया जाता है जिसमें नादीपाठ 

ओर दशकों से नाटककार की ओर से प्राथना रहती है| उसके 
पश्चात्‌ सूत्रधार प्रस्तावना द्वारा विषय की भूमिका उपस्थित करता 
है | कभी कभी नठ-नटी से भी यह काम कराया जाता है। प्रस्तावना 
के बाद नाटक य्रारम्भ होता है। नाटक कई अंक ओर गशभाोकों मे 
विभाजित रहता है । आकाशवाणी और नेपथ्य का भी उपयोग किया 
जाता है। नाग्क के अन्त मे देवताओं के लिए प्राथना होती है। 


संस्कृत नाटक और प्रसाद 


प्रसाद जी के नायक दाशनिक ज्षेत्र तक ही संस्कृत नास्वशास्त्र के 
अनुकूल हैं | अन्य ऊपरी बातो मे उन्होंने आधुनिक रुचि के अनुसार 
परिवतन कर दिया है | प्रारम्भ से तो अवश्य ही उन्होंने कबिता पाठ 
आदि रखा था परन्तु ऐतिहासिक नाटकों मे उन्होने आधुनिक शैली को 
ही अपनाया है | इनका प्रथम नाटक सज्जन था जो चित्राघार नामक 


२० ] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


पुस्तक में संग्रहीत है । इस काल्ल में काव्य-च्षेत्र से चलकर नाटककार 
लायक की नवीन सूमि से आ रहा था अतएव प्रारम्मिक नसाठ्कोंस 
काव्य का सहारा लेना स्वाभाविक ही था | कस्णालय ओर उदबंशी 
के सभी पात्र कविता भे बातचीत करते हैं। धीरे-धीरे गद्य की मात्रा 
बढ़ती गई | अजातशत्र तकपद्चय का कुछ न कुछ सहारा ये लेते ही 
रहे | यद्यपि उनके इस प्रयोग मे रुचि, अम्यास और कथा-विकास 
कारण बहुत अन्तर पड़ गया। लेकिन ऐतिहासिक नाटकों ने इन्होने 
पुरानी रूढ़ियों को तोड़ना प्रारम्भ कर दिया । सज्जन से सवप्रथम 
सान्‍दी आता है ओर उसके उपरान्त सूतधार अपनी स्थत्री से नास्या- 
मसिनय का प्रस्ताव करता है और नाटक प्रारम्भ होता है। इसका प्रकृति 
वशत भी सस्कृत साटकों के सदश हुआ है ओर इस वर्णनों में नीति 
या व्यवहार के किसी तत््व-निरूपण करने की चेष्टा की गई है। नाटक 
का अन्त भरतवाक्य से होता है । सजन के वाद नाठको से प्रस्तावना 
का अभाव है। नाटक का प्रथम दृश्य ही विगत घटनाओ की सूचना 
देने का काय करता है। परन्तु भरतवाक्य के ढंग का एक पद्म प्रसाद 
के कई नावको में मिलता रहता है | अपने तीन महान्‌ ऐतिहासिक 
नाग्कःकाल मे ही वे सस्कृत के इस नियम की अवहेलना कर सके हैं | 
विशाख, जनसमेजय का नागयज्ञ, कामना, करुणालय और राज्यश्री का 
अन्त भरतवाक्य से ही होता है। एक घेंट में यद्यपि ना्ककार ने 
भरतवाक्य का रूप त्याग दिया है, परन्तु इसके अन्तिम पद्म से भरत- 
वाक्य का संकेत है। बाद के नाठकों के कथनोपकथन से पद्म की 
कमी होती गई है | विशाल और अजातरज्रु सेसी पद्मो का बाहुल्‍य 
है; परन्तु चन्द्रगुत और स्कन्दगुप्त से सारा वार्तालाप गद्य से होता है | 
सस्कृत नाट्वशास्त्र के नियमों के इन उल्लंघन के साथ ही साथ 
टम इनम कुछ पश्चिमीय प्रभाव सी देखने लगते हैं। यह प्रभाव 
सस्कृतशासतर के वाजत दृश्यों के उपयोग स अधिक दिखाई पड़ता है। 


जनमेजय के नागयज्ञ मे जरत्कारु की मृत्यु और बाद में हवनकु'ड 


प्रसाद की नाव्य-कला ] [ २१ 


नागो की आहति ऐसे प्रसंग हैं। प्रायश्चित्त म जबचन्द आत्म-हत्या 
करता हैं और अजातश॒त्र मे श्यामा की हत्या का प्रवत्न किया जाता 
है | स्कन्‍्दगुघ मे तो हत्याओ की संख्या अधिक वढ़ जाती है और 
चन्द्रगुप मे भी कई चरित्र आत्म-हत्या कर डालते है। अ्जातशत्र 
सस्‍्कन्दगुप्त ओर चन्द्रगुप्न नाटकों में कारुण्य की तीव्रता शेक्सपियर की 
की ट्रं जेडीक्ष के सद्श ही दिखाई पढ़ती ह। 


प्रसाद को नाव्य-कला के मूल तत्त्व 
देश-ग्रेम 


४ 


द जी छा अजातशत्र नाटक महाय॒द्ध के अन्तिम काल में 
लिखा गया था। चन्द्रमुपत उसके बाद की कृति है ओर रकन्दशु्त 
१६२८ में प्रकाशित हुआ | इस काल मे भारतवप से ही नहीं, सारे 
संसार से भयानक आँधियाँ उठती रही; जिनकी शाति के लिए नये- 
नये आदर्शा वी कल्पना की गई ; भारतेन्टू काल से ही सारतवप से 
देशभक्ति की एक नई मावना जाशत हो गई थी। परन्तु बीसवीं 
शताब्दी के प्रारम्भ होते न होते इस भावना ने एक दूसरा ही रूप धारण 
कर लिया | भारतेन्द काल मे अंग्रजी सत्ता सम विश्वास था, पश्चिमी 
सभ्यता के नये प्रकाश से आकपण श्ा। परन्तु बगाल-विभाजन के 
पश्चात्‌ देश म जा स्वदेशी ओर स्वराज्य की लहर देश के एक कोने से 
दूसरे काने तक फैली उसम पश्चिमी सम्बता की प्रतिक्रियात्मक रूप से 
भारत म अपनक््य की चतना जाग्त होने लगी। भारतीय संस्कृति, 
भारतीय आदश्श, मारतीय शिक्षा-प्रणाली की तुलना पश्चिमी आदर्शों 
से की जाने लगी श्रोर इस तुलना से भारतीयता अधिक गौोरवशाली 
ज़ान पढ़ने लगी । इसी प्रभाव के कारण ही अ्शिमानद जी ने राष्ट्रीय 
पाठशाला खोली जो वाद मे शातिनिकेतन के नाम से विख्यात हुई । 
इसी आदश को सामने रखते हुए १६१६ मे कववें महोदय ने स्त्रियों के 

लिए. भी एक भारतीय विश्वविद्यालय खोला | 


र्श ] [ अखाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


वीसवीं शताव्दी की इस राष्ट्रीय भावना से यहाँ का साहित्य 
अछूता न बचा | साहित्व के महारथिवयों ने एक ओर तो आधुनिक 
सारत की दवनीय दशा की ओर संकेत किया और दूसरी ओर प्राचीन 
भारत के गोरव चित्र अक्रित किये। प्रेमचद ने पहला कार्य लिया 
ओर प्रसाद जी ने दूसरा | प्रसाद जी के साथ देने वाले कविवर 
मैथिलीशरण गुप्त मी हैं | जिनका सारतसास्ती-- 

हम कौन हैं, क्या हो गये हैं ओर क्या होंग असी 

की सावना लेकर चला था, इससे भारत के अतीत और वतमान दोनों 
पर प्रकाश डाला गया था। लेकिन वाद मे साकेत, यशोधरा; द्वापर 
ओर जयद्रथवघ अतीत भारत के ही सुन्दर चित्र हैं | 

प्रसाद जी ने जो कार्य अपने हाथ में लिया, उसमें वे पूर्ण रूप ते 
सफल हुए है| भारत के इतने अधिक गोरवपूर्ण चित्र उन्होंने अपने 
नाटकों मे सर ठिये ह कि हमारे सामने काल अपना अंचल हटाकर 
हमारे अतीत की ऊ्ाँकी उपस्थित कर देता है। हम अपने भारतीय 
महान विभूतियों के आदशों से, उनकी वीरता से, उनकी कायक्षमता 
से विस्मित हो उठते है| देश-मेम की एक अलोकिक घारा हमारे 
हुदय भे बहने लगती है और हम कार्नीलिया के साथ ही गाने 
लगते है-.- 


रँ 


अरुण यह सघुसय देश हमारा 

जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा 
भारत का प्राचीन गौरव हमसे स्फूर्ति से भर ढेता है। हम सोचने लगते 
हैं| “हम्त भी तो चीर-पुत्र हैं, हम सी तो आज सन्‍्तान हैं फिर क्यों न 
स्वतंत्रता के पुण्य पथ पर आगे बढ चले ॥72 राष्ट्रीय भावना से मरा 
हुआ उत्साह ओर नवीन जीवन प्रदान करता हुआ प्रसाद जी का यह 
गीत कितनासुन्दर है-- 

हिमाद्वि तुन्न अग से अबुदछ शुद्ध सारती | 

स्वयं प्रभाससुज्ज्वला स्वतन्नता पुकारती ॥ 


ह8| 
हि, 
उ्कल्क 
कि] 
६3 
ध्या 
है । 
7 
४भ्प 
६ 
ध। 
न 
धर... 
श्र 
हद 
हा 


सपृत सावृश्त्ति के रको व दौर साहसी ॥ 
धराति सेनन्‍्य सिन्धु से सुबाइवाग्ति से जलो । 
भवीर दो, जथी बनो, बढ़े चलो बढ चलो ॥ 
प्रसाद जी का वेश-प्रम नाटक के केंब्ल गीतों तक ही सीमित 
नही है । उनकी नादबकला पर दस देश-प्रेम का बहत ही अधिक 
प्रभाव छट्ठा है | भारतीय आदश स्थापित करने मे वे जितने सफल हुए 
हूँ उतना हिन्दी संसार मे कोई अन्य चहीं। चरित्र-चित्रण पर इसकी 
गहरी छाप है । देवकी, देवसेना, अलका, व[सवी--ना रियो के नहीं--- 
भारतीय देवियों के चित्र हे: जहाँ पारिवारिक सुख के लिए, समाज की 
शांति के लिए और देश की उन्नति के लिए कठोर से कठोर बलिदान 
भी फूल से कोमल रहते दे | गौतम, चन्द्रगुप्त, चाणक्य, सिंहरण 
स्कन्द, वन्धुवर्मा भारतीय महान्‌ विभूतियों के चित्र हैं जिन्होंने भारत 
है संघपकाल में, जब भारतीय सता को विनाश काल ही दिख रहा 
था, भारत की बागडोर अपने हाथ में ले भारतीय ससस्‍्क्षति, भारतीय 
आदर्शो का घुनस्त्थान किया | श्राधुनिक अवनत भारत में उनका ही 
उदाहरण सहायक हो सकता है| रकन्द और चन्द्रगुप्त को जिन 
भीपण्‌ परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था क्या वे आधुनिक भारत 
की परिस्थितियों से भिन्न हैं ? देश मे अन्तर्विद्रोह्द हें, विदेशियों से 
बह आपदग्रह है | तब प्रसाद की कृतियाँ क्‍या आधुनिक श्रादोलनों का 
चित्र नहीं है ? क्‍या उनमे बही देश-पेंस की पुकार नहीं है ? नाटक- 
कार ने विशाख की भूमिका लिखते हुए इस बात को रवीकार भी 
किया है। “मेरी इच्छा भारतीय इतिहास के अग्रकाशित अंश मे से 
उन प्रकाड घटनाओं का दिग्दर्शन कराने की है जिन्होंने कि हमारी 
वर्तमान स्थिति को बनाने का बहुत कुछ प्रयत्न किया है |? 


२४ ] [ असाद के तीन एतिधासिक नादक 
इसी कारण ही प्रसाद जी का देश-प्र म ही उनके कथानछ का 
मुख्य अंग है| भारत का जो छुछ अपना था वह मुसलमानी आकर 
सणों के बहुत पहले ही लोप हो चुका था। ठठ्नाद हप की मुत्यु के 
ब्राद भारत का अवनति काल प्रारम्भ हाता ६। अतएव भारत -गर 
शुणभान के लिए. सम्राद हप के पूव का ही भारत उपयुक्त था | 
“इसके लिए उसने महाभारत-युद्ध के बाद से लेकर हपंनधन के राज्य- 
काल तक के भारतीय इतिहास को अपना लक्ष्य बनाया है । क्योंकि 
यही मारतीय संस्कृति की उन्नति और प्रसार का स्वण॒युग कहा जाता 
जनमेजय पराज्नित से आरभ होकर यह स्वणशुयुग हप्वंघन दक 
आया हैं। बीच से बौद्काल, सोय्य और शुप्तकाल ऐसे है डिनमे 
आय सस्कृति अपने उच्चतम उत्कर्ष पर पहँँची है | ऋतएव तत्कालीन 
उत्कर्पापफष के यथा. विभाग के अभिप्राव से लेखक ने कुछ विशिष्ट 
प्रतिनिधियों को चुनकर उनके कुलशील ओर जीवन-द्बत् के द्वारा उस 
रसोह्रोधन की चेष्टा की है जो वतामन को जीवित रखने मे सहायता 
कर सके ।* इसी से प्रसाद जी ने अपने नाठको के कथानक पूव युगो 
से लिए है | करुणालय में वेदिककाल की घटना है | जनमेजय का 
नागयज पुराणों की वस्तु है अजातशत्र वोहकाल के आरंभ की 
चन्द्रशुतत मोयकाल के आरंभ की ओर स्कन्दरुप्त शुप्तकाल के अन्तिम 
समय की वस्तु है। राज्यश्री का कथानक हफषकाल का है। आधुनिक 
सुर का ससस्थाओं की हल करने के उच्श्य से प्रसाद जी ने उपयन्त 
काल का केवल उस सामग्री को बयोरा हैं, जो हलचल पूण थी | जहाँ 
भारत का गौरव विलीन होने की समस्या आ रही थी | स्कन्दरुप्त ने 
डगमगाते गुप्त-साम्राज्य के पोत को पार लगाने का भार अपने ऊपर 
लिया था; चन्द्रशुप्त ले विलासी नंद से मगध को वचाकर भारत का 
) ढ[्‌० जगन्नाथ प्ख्ाद 


शर्मा--असाद के नाठकों का शाखीय 
अध्ययन एछ रश८% | 


प्रसाद की नाव्य-कला | [ १४ 


मस्तक ऊपर उठावा था ओर जिसकी स्वयं सिकंदर महान को प्रशंसा 
करनी पढ़ी थी | 
नाख्य-रचना से इस देश-प्रेम की सावता का अधिक प्रभाव पड़ा 
है| भारतीय-गीरव चित्रण करने के लिए प्रसाद जी ने दृश्य के दृश्य 
रच डाले हूँ । विदेशियों द्वारा भारत वर्णन तो इनके प्रायः सभी नाटकों 
मे मिलता है। राज्यश्री मे चीनी सुशनच्बाग भारतीय दान देखकर 
अवाक रह जाता ह | 
दप--(रूबव सशिरत् दान करता छुआ अपना सर्दस्व डतार 
देता है। राज्यश्नी से) दो वहिन एक वस्र (राज्यश्नी देती है ।) 
क्यों सेरी इसी विभूति ओर अ्सिपत्ति के लिए हत्या की जा 
रही थी न ? से आज सब से अलग दो रहा है । थंदि कोई शत्र 
मेरा याण दान चाहे, तो वह भी द सकता हैं । 
जय सहाराजाबिराज हपवधन की जय?? 
सुपुन ०--यह भारत का दे व-हुर्लस दृश्य दे खकर सन्नाट ! सुर 
विश्वास हो राथा कि यही अभितास की असव-भूमि हो रूकती है । 
स्कन्ठ में धातुसेन ओर चन्द्रयुतत॒ मं सिकंदर महान्‌ ओर कार्नी- 
लिया भी इस देश को एक कब्पना-लोक ही समझते है | 
प्रसाद जी की इस प्रद्ृत्ति के कारण नाटक मे कुछ दोप भी आए 
गये है| उनके ऐतिहासिक चरित्र कुछ अस्वभाविक से मालूम होते है | 
विशेषकर सिकदर ओर कार्नीलिया | यूनानी जाति बड़ी देश-भक्त थी 
इस कारण भारत गुणगान मे अपने ठेश का गौरव मूल जाना उनके 
स्वभाव के प्रतिकूल मालूम होता है | चन्धशुप्त की कार्नीलिया तो 
भारतीयता मे इतनी अ्रतिरजित ही गई कि वह अपने पिता की भी 
उपेक्ना करने लगती है। राय भदह्योदव की हेलेन भी अपने पिता की 
उपेक्षा करती है, परन्दु उसकी उपेक्षा का मूल भारतीयता न थी मान- 
बता थी ओर इस रूप में हेलेन का चरित्र कार्नीलिया के चरित्र से 
अधिक ऐतिहासिक और अधिक आ्रावशंमान है| 


(४१४) 


& ५५ 


२६ | ( प्रसाद के त्तीन एटिदासिक नाइक 


देश-प्रेम के कारण प्रसाद जी के नाटकों में शिथिचता भी आ गई 


छः जज कस गा ०4 कक 0 अ लक व्कक 
है। जहाँ जहाँ भी भारत के गरिव चित्रण करत का साका नाटककार 
गे रि यदहश्यठछ पह्िः थद सिने व जय 22 
का। वहा-वहां उसने लम्ब दृश्य उपास्थत कर [द्वद्य हू जज द्थ 


रे रे 
नायक के कथा-प्रवाह मे भी सहायक नहीं हैं वे भी नावकों मे ेंस् 
दिये गये हैँ | चन्द्रशुत नाटक में यह भूल अधिक है | सिकदर महान 
का दाशनिक दासख्डायन से मिलना नाटक की कथा-वस्तु से बहुत 
अधिक संबंध नहीं रखना | लेकिन इस मिलन ने भारत की प्रतिष्ठा 
रे ससार मे स्थापित कर दी थी | छय॑ सिकंदर जिस दाशनिक्त के पास 
नंगे पैर गया था वह दाशनिक कितना बड़ा न होगा १ भारत के इतिहास 
मे यह मिलन स्वर्णाक्षरों से लिखा जाने वाला पृष्ठ है। इसीलिए प्रसाद 
जी ने पूरा एक इश्य अपने नावक से रख दिया | दविजेन्द्रलाल राय 
अपने नाटक में अन्तर्राष्ट्रीय भावनाओ से प्रेरित थे, उनके लिए देश- 
प्रेम संकृचित पेम न था | वह देश-प्रेम ससार-प्रेस से एक सीछी सात 
था इसी कारण उन्होंने अपने नाटक में इस महान्‌ घटना का उल्लेख 
सात्र किया है | 
प्रसाद जी का देश-प्रेम संकुचित भावनापू् है। वे अपने देश के 
सामने दूसरे देश की प्रशसा नही सुन सकते | इसी कारण राय बाबू के 
ओर प्रसाद जी के चन्द्रगुत्त नायक मे बहुत अन्तर हो गया है । जो हस 
आगे चन्द्रगुप्त की समीक्षा करत हुए देखेगे | लेकिन यहाँ संक्षेप से वह 
कहना अनुचित न होगा कि इस संकुचित राष्ट्रीय प्रेम के कारण चन्द्र 
शुत्त का कथानक शिथिल हो गया है। साथ ही कुछ ऐतिहासिक चरित्र 
पर कुठाराधात हुआ है। चन्द्रयुप के सामने प्रसाद जी का इतिहास- 
प्रसिद्ध सिकदर-महान्‌ एक लुटेरे की तरह मालूम पड़ता है। स्कन्दगुत 
आर अजातशत्र इस दोप से बच गये हैं परन्तु उनके पात्रों से जो 
अलोदिक क्ुमता है, सहनशौीलता है, शत्रओं को क्षमा करने की अझुत 
शाक्त है, वह भारतीय आदशं के सले ही अनुकूल हो परन्तु इन गुणों 
का अत्यधिक प्रदर्शन कुछ अस्वासाविक अवश्य मालूस होता है। 


| 


असाद की नाव्य कला | [ २७ 


इतिहास-प मे 
प्रसाद जी की नाइयशैली का दूसरा तत्त्व उनकी ऐतिहासिकता 
है | साहित्य के सब अंगो की सेवा करते हुए भी प्रसाद जी का अध्ययन 
कितना गंभीर था यह उनके ऐतिहासिक अनन्‍्वेपणो से मालूम होता हे, 
लेकिन उनका ऐतिहासिक जान नाटकों की लम्बी चौडी शुष्क भूमिका 
तक ही सीमित न था। अपनी खोजों का अपने नाठको मे उन्होंने पूर्ण 
समाहार किया है | अतीत की द्वूटी लड़ियों को एकत्रित करने का जो 
काय प्रसाद जी ने किया है वह सराहनींव है | योवन की मस्ती में मस्त 
इस नाटककार ने अपनी कल्पना ओर भावगरिमा से इतिहास के रूखे 
पृष्ठो म जीवन डाल दिया है। वे अतीत के चित्र हमारे सामने नाचने 
लगते हैं। “इतिहास के खण्डहरों में भी इसी मस्ती से रसने वाला यह 
कवि इस दृष्टि से भावना और विज्ञान के समन्वय की अतिसा बनकर 
“साहित्य ज़गत से डपस्थित है ॥? 
कामना? ओर एक घूट को छोड़कर प्रसाद के सभी नाठक ऐति- 
हासिक आधार पर निर्मित हँ। उनके उद्देश्य सें--“इतिहास का 
अनुशीलन किसी भी जाति को अपना आदश॑ संगठित करने के लिये 
अत्यत लाभदायक होता है...क्योकि हमारी गिरी दशा को उठाने के 
लिये हमारे जलवायु के अनुकूल जो हमारी अतीत सम्यता है उससे 
बढ़कर उपयुक्त और कोई भी आदश हमारे अनुकूल होगा कि नही 
इसमें मुझे पूर्ण सनन्‍्देह है ।* अजातशत्रु, स्कन्दगुत्त और चन्द्रशुम मे 
प्रसाठ जी हमारे सामने ऐतिहासिक नाटककार के रूप में ही आते हैं 
परन्तु उनका यह इतिहास प्रेम साहित्य की दृष्टि से कही कहीं अ्रद्वितकर 
हुआ है | यदि वे इतिहासकार के रूप मे न आकर हमारे सामने कला 
“कार के रूप में आये होते तो समव था कि नाटकों का रूप वहुत कुछ 


,+--3. “>> उनत+-मन>++र पंननम«+न- कप रकमक लक न>-ममनन-म9 3.» 
कजअनजत++++त ते ४ 


१सम्नन जी-- कवि ग्रसाद की काव्य साधना?, पृष्ठ १६ 
+पविशाख की भूमिका 


र८ ] । [ असाद के तीन एंतिहासिक नाटक 
बदला हुआ होता | तथा नाटकों की शिथिल्रता भी कम हो जाती | 
उन्हें इतिहास का इतना अधिक ज्ञान था कि वे अपनी कब्पना को 
स्वतंत्र गति से नही उड़ा सके | सम-कालीन वातावरण उपस्थित करने 
के लिए तथा नवीन खोजो को नाटक में सम्मिलित करने के लिए उन्हें 
सूमिक्रा के साथ ही साथ नाठकों मे कुछु निरथक दृश्य सी बढ़ाना 
पड़े हैं | 
वस्तु संकलन में सी इसका प्रभाव पडा है। उदाहरणाथ अजात- 

श॒त्र ही लीजिये बोदों के प्राचीन ग्रन्थों सम १६ र ! उल्लेख हैं 
जिनका वर्णन “भसोगोलिक क्रम के अनुसार न होकर जातीयता के 
अनुसार है| उनके नाम हैं, अद्भ, मगध, काशी दृजि आदि अपनी- 
अपनी स्वतंत्र कलीनता और आचार रखनेवाले इन राष्ट्रो म, कितनों 
ही मे गण-तंत्र-्शासन प्रणाली सी प्रचलित थी--निसर्ग नियमानुसार 
एकता. राजनीति के कारण नही किन्तु एक घामिक क्रान्ति से होने 
वाली थी... ओर इसी धासिक क्रान्ति ने सारत के भिन्न-भिन्न राष्ट्रों: 
को परस्पर सपि-विग्रह करने के लिए वाच्य किया |?" इस प्रकार एक 
राज्य की घटना दूसरे से सबद्द हो गई। इसी कारण ही प्रसाद जी को 
बोद्कलीन अ्रजातशनत्र के कथानक में तीन राज्यों की घटनाओ का 
सगठन करना पड़ा है। साहित्य की इष्टि से कोशल, कौशाम्बी और 
सरगध के कथानक मूल कथानक से सम्बन्ध रखते हुए भी स्वतत्र से 
सालूम होते हैं | प्रसाद जी के इतिहास प्र सम के कारण नाटक के सुख्य 
तिद्दन्त कार्यसकलन (एंग्र0ए ए 8०807) पर आघात पहुँचता 
हैं । कितना सुन्दर होता यदि प्रसाद जी इतिहास को एक किनारे रख 
चाहत्य क संद्वान्त को अपना कर मल कथानक को लेकर ही चलते | 


इससे कथानक का प्रवाह ठीक रूप से चलता और पात्रों की सख्या 
हे जान से उनका चित्रण भी ठीक हो जाता। 


अज>>+ +ौ+++++क- 


)अजातशत्र| की भूमिका 


| 





-असाद की नाव्य-कला ] [ २६ 


बीड्ध-काल के उत्तराद्ध में मास्डलिक शासनों का अन्त हो रहा 
- था और उनका स्थान गुप्त साम्राज्य भ्हण कर रहा था | चाणक्य के 
अथशाशख्र मे यद्यपि हम सात माण्डलिक राज्यों का वर्णन पाते हैं, 
' प्ररन्‍्तु इस ससडलो के सभापति राजा की पदवी से सम्मानित थे । परि- 
स्थितियाँ भिन्न हो रही थीं। छोटे छोटे राज्य सि द्वारा कुचल 
द्विए गए थे | श्रतएव बढ़ि-बड़े राज्यों की प्रतिष्ठा होना प्रारभ हो 
गया था| कीटिव का अथशात्र इसी कारण से साम्राज्यवाद पर 
अधिक जोर देता है। छो2-छोटे राज्यो को हस्तगत करने ओर उन्हें 
एक ही यत्र से पिरो देने का काय चद्धशुप्त मौब्य का था। चन्द्रगुम 
नाटक में दस काल की घटनाओं को एकसूत्र से बाँधने का प्रवत्ञ किया 
गया है | इस कारण नाटककार हमे मगध से लेकर तत्षशिल्ञा और 
मालव तक ले जाता है | इतिहास को इस महान्‌ पए्रष्ठिसमि को चन्द्र 
गुप्त नाटक में बन्द करने के प्रयत्न मे नौट्ककार काय-संकलन के 
सिद्धान्त को ठुकरा देंता है। भिन्न-भिन्न राज्यों की घटनाओं ओर 
चरित्रों की संख्या बढ़ जाने से नाटक पर आघात पहुँचने लगता है । 
यदि नाटक के प्रथम तीन अक अलग कर दिये जाये और उनका नाम 
“सिकंदर का भारतीय आक्रमण?” रख दिया जाय तो कोई अनीचित्य 
न होगा। अजातशत्र के समान इस इतिहास सेस का प्रभाव नाटक के 
चरित्रो पर भी पड़ा है | नाटक की इतनी बडी प्ृष्ठ-समि के चित्रण 
करने भे नाव्ककार को इतिहास-प्रसिद्ध पोरास ओर सिकन्दर के समान 
दो विभृतियों का चित्रण करना पड़ा हैं | लेकिन इतिहास हम जो इन 
दो वीरो की निर्मीकृता ओर सोजन्यता का चित्र देता है, वह हमे चन्द्र- 
शुप्त नाटक मे नहीं मिल पाता । क्योकि पोरस का ग्ह इतिहास प्रधिद्ध 
प्रशंसनीय उत्तर चन्द्रगुप्त के गुणों को नीचे दवा देता | सिकन्दर की 
सह्ृदवता ओर उसकी वीरता की ठला पर चन्द्रयुप्त का शौय हलका 
मालूम होता । अतएव साहित्य ने इतिहास पर भी कुठाराधात किया । 
पोरस का वार्तालाप संज्षित कर दिया ग्रया ओर उसका रूप बहुत 


हुलछ बदल [८ 22॥ 
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लश्या ॥। लरशा] 4ा। सदा बंटा आस हे सं बच + बेला जे. +»ा ६ 
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ओर चरम खिदंग भे भा कमा 5 ४. | 
किक पलक व्यक लय सकत्ककन... “कहकर / उसका जहा ईः जले है हक कमल, ४ २६ 
स्पन्द्ग 5 0५ & 20-9० “तो कु ४ च्क कप्क 
स्पन्दगुन साटक रन दाठ। से बस सखा | | केंपधश सापडज़ दुसाम 
जो क धो डा कं कु गय हि मिल 
'जज० न बनिकाण हे शा रा यं ी के 37 चअकक +ढ 0०५० ऋष्न शिी-+- 4० ऑं#प्यए पी 
दा राज्या की घटनाओं था इल्यस . ह।यग आय मालय कभी प्रटमाएा, 
्ी.. अ5 


मगध की घटनाओं ऊे अन्तगत ही 7॥ नलालेब मंगद के स्पद्राम्य हा 


एक भाग था। अतएब सम्राद स्कल्सुम के सानसने सन्‍्धुवस का झादश 


7 

हि देसी पफाधाओा उप उन्‍हें >> 
नहीं थिकिता । साय हा मगध आर सालव की एकमम भे नॉनिनेक 
काय स्कन्दुम का हो ६ ) जिसके कारग स्कन्द के नायक सर झा प्रश्न 
सही उठने पाता | इस लावझ में ऐसा कोई भी दृश्य नहीं जो सेवन 


हा 


इतिहास-प्रेम की ही दाष्ट से लिखा गया हो | 
इस प्रकार प्रसाढ जी की नाव्यक्रता का रूप सव्यरने से दनित्नस 


का मुख्य हाथ है | परन्ठु इसका यह तात्वव नहीं कि प्रसाद जी नाटकों 


३ श्र जा 


मे इतिहास लेखक ही रहे हैँ कलाकार नहीं। उन्होने रपनी कल्यना 


से कई घटनाओ वा पात्रो म अपनी आवश्यकतानुसार परिवर्तन किय 
है जो हम आगे चल कर देखेंगे। 


कर 


| 


कान्य 


काव्यशली हे । 
नाते यदि उनके पात्र 
अधिकतर कल्पना का सहारा लेकर वातचीत करे तो कुछ सन्देह् नहीं । 
परल्ठु उसके नावकों की सापा पूर्ण रूप से भावना-प्रधान समझना भूल 
होगी । कई ऐसे स्थल हैं जहाँ प्रसाद जी के चरित्र साधारण वातचीत 


ही करते हूँ। प्रसाद जी के कथनोपकथन की समीक्षा करते हुए हम 


प्रसाद जी की सास्यशेली का तीसरा अंग उनकी 
पहले कवि ओर वाद मे नाठ्ककार होने के 


प्रसाद की नाव्य-कला | [ ३१ 


देखेंगे कि उतकी भाषा एक सी नहीं हे। चरित्रों के अनुकूल उसमे 
विभिन्नता है | यह अवश्य है कि प्रसाद जी के चरित्र अन्य नाट्ककारों 
के चरित्रों की अपेक्षा साधारण वोलचाल की भापा से भिन्न कुछ 
परिष्कृत मापा, कव्मना तथा अलकारों का अधिक आश्रय लेते हँ, 
लेकिन प्रसाद जी की रुचि एक तो उनके विपयानुसार हैं , दूसरे 
इस भाषा पर राय वावू का अधिक प्रभाव है। भावावेश से ही उनकी 
भापा कल्पना ओर अलंकारों का उपयोग अधिक करती है | यौवन मे 
पदापंण करते हुए सौदय का पुजारी मातृगुपतत अपने प्रेम की प्रथम 
असफलता की भावाभिव्यक्ति में कवि ही बन जाता है | 
“अस्त के सरावर में स्वणं-कमल खिल रहा था। अमर 
वंशी बजा रहा था सोरभ ओर पराग की चहल-पहल थी । सबेरे 
सूर्य की किरणे डसे चूसने को छोटती थीं, संध्या मे शीतल 
चॉदनी, उसे अपनी चादर से ढक देती थी । उस सधुर सोदय, 
डस अतीन्द्रिय जगत की साकार कल्पना की ओर मैने हाथ बढाया 
था, वही--बहीं स्वप्न टूट गया ।... 
“उस हिसालय के ऊपर प्रभात सू को सुनहरी अभा से 
आलोकित बफे का पीले पोखराज का-सा एक सहल था | डसीसे 
- मवनीत की पुतली कॉककर विश्व को देखती थी। चह हिम्र की 
शीवलता से सुसंगठित थी ।,सुनहरी किरणों को जलन हुईं । तप्त 
होकर सहल को गला दिया | पुतली डसका संगल हो, हमारे अश्रु 
की शीतलता डसे सुरक्षित रक्‍खे । कल्पना की भाषा के पह्ु गिर 
जाते हैं, मौन नीड़ मे निवास करने दो । छेड़ो मत मिन्न ॥?? 
परन्तु ऐसी भाषा का उपयोग सभी स्थलों पर नही हुआ । हाँ, यह 
अवश्य है कि कसी साधारण स्थलो पर जहाँ मनोवेगो के चित्रण करने 
का स्थान भी न था वहाँ भी प्रसाद जी अलंकृत सापा का उपयोग 
करते है । ह 
“श्गवान की शांठ वाणी की घारा प्रत्नण की नरकारिन को 


2२ ] [ प्रसादु के तीन ऐतिहासिक नाटक 


सी बुरा देगी ।?? 

“हुद्य नीरव अभिज्ञापाओं का नीड हो रहा है | जीवन के 
प्रभात का वह सनोहर स्वप्न, विश्व भर की सदिरा बनकर सरे 
उन्सादु की सहकारिणी कोमल कल्पताओं का भडार हो शया | 
सल्लिका ! तुम्हे सेने अपने योवन के पहले झीष्म की अऋद्ध्रात्रि मे 
आल्लोकपूर्ण नक्षत्रल्ञोक से कोसल हीरक-कुछुस के रूप से आते 
देखा । विश्व के अर्चख्य कोमल कंठ की रसीली ताने घुकार बनकर 
तुन्हारा अभिनन्द॒न करने, तुम्हे सम्हालकर उतारने के ल्लिए नक्तन्न- 
लोक को गई थीं... ...?” (अजातशत्र्‌ अंक १, दृश्य ८) 

“मुझे असी प्रतिशोध लेना है, दुववाि-ला बढ़कर फेलना 
है, उसमे चाहे सुकुमार तृण कुसुस हों अथवा विशाल शाल चुक्ष ! 
दावापि या अंधड़ छोटे-छोटे फूलों को ब्चाकर नही चलेशा ॥? 

(अजातशतन्न्‌ अंक २, दृश्य ८) 

“आर्याचत्ते का सविष्य लिखने के लिए कुचक्र ओर अतार्णा 
की लेखनी ओर ससी प्रस्तुत हो रही | उत्तरापध के खश्बराज द्वोष 
से जजर है । शीघ्र सयानक विस्फोट होशा १? हे 

(चन्द्रगुप्त अंक १, दृश्य १) 

“बुक अभिमसय गरंधक का खोत श्रार्य्यावर्त के लौह अखायार 
में घुसकर विस्फोट करेगा । चंचला रणलक्ष्ती इन्द्रधलुप-ली विजय- 
भाला हाथ से लिए उस सुन्दर नील लोहित प्रलथ जलूद से विच- 

रण करंगी और दीर हृदय सयूर से नाचेगे १ 
(चन्द्रसुघ्त अंक १, दृश्य १) 
“सावव कब दानव से सी दुर्दान्त, पशु से भी बबेर, और 
पस्थर से भी कठोर, करुणा के लिए निरवकाश हृदयवाल्या हो 
जावेगा, नही जाना जा सकता | अतीत खुखों के लिए सोच क्‍यों, 
अक्तात भविष्य के लिए भय क्यों, और वर्तसाव को से अपसे 
अजुकूल बना ही लगा; फिर चिन्ता किस बात की २? 


असाद की नाव्य-कला! | | 3३ 


लेकिन ऐसी भाषा की प्रसाद जी को कारय-निर्वाह के लिए अत्यंत 
आवश्यकता थी | हमारे वतंमान भारत से भिन्न वे एक स्वर्ण युग का 
चित्रण कर रहे थे | इस कारण उसे चित्रित करने के लिए कब्पना के 
रंग से रंगी हुई भाषा का प्रयोग करता आवश्यक था। हमें एक 
आदश भूमि का भान कराने के लिए, हमारी आधुनिक दीन परि- 
स्थितियों से हटाने के लिए, नित्यप्रति की भात्रा कीं उठी हुई भाषा 
का प्रयोग प्रसाद जी के लिए आवश्यक था। अनेक शताब्दियों के 
आवरण को हटाकर, हमारे पूष युगो का दर्शन कराने का, हमे उस 
युग मे पहुँचाने का श्रेय प्रसाद जी के ऐतिहासिक ज्ञान को नहीं, 
उनकी भाषा को है, जिसकी रसात्मकता हमे हमारे साधारण जीवन 
से दूर एक आदश्श जगत की ओर ले जाती है और जहाँ के पात्र 
हमारी साधारण वोलचाल की भाषा से भिन्न सापा मे वार्तालाप करते 
हुए हम मिलते हैँ। प्रधाद जी की नाव्यशैली मे उनकी भाषा का 
विशेष महत्व है | 


दाशेनिकता 


प्रसाद जी के नाटकों की चौथी विशेषता उनकी गभीरता है जो 
'नाठककार के उद्देश्य, प्रकृति ओर विषय से जनित है । इसी गंभीरता 
के कारण प्रसाद जी के नाथ्कों में हास्य का अभाव है। स्कन्दगुप्त के 
मुद्गल और मातृगुप्त के वार्तालाप मे वे अवश्य कुछ सफल्न हुए हैं। 
अन्य नाठकों मे भी उन्होंने संस्कृत नाठकों के समान विदूषक रखे हैं पर 
ब्राह्मणों का पेद्पत आधुनिक रुचि के अनुकूल नहीं | नाठको की गंभीरता 
कर्ण रस के प्राधान्य के कारण है। ये नाग्क सुखान्त नहीं कहें जा 
सकते | ये वास्तव में “ट्रेजी कामेडी?--करुण-सुखान्त नाटक हैं ओर 
इस रूप में वे संस्कृत नाठकों के अधिक अनुरूप हैं| अजातशत्र , 
व्िम्बसार और वासवी की करुण कथा हैं; जहाँ समाज में विश्ट खलता 
आ रही है; रिया अपनी स्थिति छोड़ स्वावलम्बी होना चाहती हें, 


रे 


क्र 


भव 


३४ | [ प्रसाद के लीन ऐलिहारिक नाद 


पुत्र पिता के विदद्ध खड़ा होता चारता ड़ | ऐसे अवसर पर याद 
विस्बसार सभीर हो “दाकाश के नौलेपन पर उज्ज्वल प्न्नरों से लिसे 
हुए अच्ट के लेख” पढ़ने लगें तो ल्‍्वाभाविक दी यच 
की आपत्तियों का चिद्रा है । उसका अन्तिम इृश्य तो करुस रस पूर्ण हा 
हे स्कन्द की सफलता क्या नुखान्त है ? अस्तिम इश्य में सफलता के 
सोद्य मे भी वह अपने को अकेला पाता दे । 
८देवसना ! देदसेता ' तुम जाओ। हतभाग्य स्वन्‍दगुप्त, 
अकेला स्कन्द, श्रोह !?? 
देवसेना का वैराग्य उसकी असफलता के ही कारण है| स्व॒न्द- 
गुप्त नावक यदि ट्रजडी नही कही जा सकती तो वह कामेडी सी नहीं 
है | चन्द्रगुम नाव्क में भी करुण रस की मात्रा अधिक है | संस्कृत 
नायकों के आदर्शाचुसार, नावक को सुखान्त करने के लिए नावककार 
ने इस असफलता में भी एक नैसगिक सफलता अपने पात्रों को दिखाई 
है। मैतिक सुखो के अभाव को वेराग्य की शान्ति पूरी करती है जिसके 
कारण नाटक की सारी कथावस्तु म गभीरता आ गई है। पात्र दाश- 
निक हो उठते है, अन्तिस दृश्य तक उन्हें ससार के खेल-कूढ, भौतिक 
सुख साधन, हास-उपहास से कोई सरोकार नहीं रहता | परन्ठु यह 
दाशनिकता पात्रों के चरित्र-विकास के कारण है | पात्र प्रारम्भ से ही 
दार्शनिक नहीं रहते, और न नाटक ही दाशनिक कहा जासकता है। 
बहुधा प्रसाद जी के चरित्रों पर एक बाह्य दाशनिकता का आरोप 
किया जाता है| अपने आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास से प्रसाद जी 
की आलोचना करते हुए पंडित कृष्णशंकर शुक्ल जी लिख्ते हैं, 

“इनके पात्रों मे दोहरा व्यक्तित्व रहता है।वे अपना 
भी व्यक्तित्व रखते हैं ओर अपने रचयिता के आदेशानुसार 
एक कृत्रिम व्यक्तित्व भी ढोते रहते हैं | पर सौभाग्य से इन दोनों 
व्यक्तित्वों का पृथक्करण सरलता से किया जा सकता है। यदि 
हम पात्रों के कृत्रिम व्यक्तित्व को हटा दे तो उनका निजी सजीब 


ञँ 
डा ककानवकन्क जन्‍्ककव कम भरकर कक सायक दा 
न सलनत से सा 45 





प्रसाद की ताव्य-कला ] [१५ 


व्यक्तित्व स्पष्ट देख सकते है। कृत्रिस आ्रारोपित व्यक्तित्व तीन बातो 

से जाना जा सकता है | प्रसाद जी नियतिवादी हैं | इसका प्रभाव 
इनके अनक पात्रों पर पड़ा है| कोई ऐसा नाटक नही है जिसमें 
इसकी दोहाई न दी गई हो । नागयज्ञ मे जरतकारु ऋषि तथा 
वेदव्यास इत्यादि अद्ृष्ट की लिपि की घोपणा करते हैं। जनभेजय 

भी मनुष्य क्या है ? प्रकृति का अनुचर ओर नियति का दास--- 

या उसकी क्रीड़ा का उपकरण? कहता है। स्कन्दरुस्त सम उसका 
नायक भी कुछ ऐसे ही विचार रखता है। चेतना कहती है कि 

तू राजा है ओर उत्तर मे जैसे कोई कहता कि तू खिलौना है |? 
चन्द्रशुम मे सी अनेक पात्र नियति का झंडा फहराते हुए आते 

है | चाणक्य ऐसा कमेवीर भी उसके प्रभाव से नहीं बचा है। 
उसे भी हम ऐसा कहते हुए सुनते हैं | (नियति सुन्दरी के भवो में 
बल पड़ने लगा हें? परन्तु हम इस बात को अच्छी तरह समझ 
सकते है कि यह नियतिवाद पात्रों की अपनी विशेषता नहीं है | 
नियति-नियति चिल्लाते हुए भी वे हाथ पर हाथ रखे नहीं बैठे 
रहते, जीवन के घमासान युद्ध मे उतरते हैं और ऐसे-ऐसे काड 
रचते हैं कि हमे चकित रह जाना पड़ता है| ऐसी अवस्था में 
हमे यही प्रतीत होता है कि वे किसी के सिखाने से नियति का 
मन्त्र जप रहे ये | वास्तव में उन्हे कर्म की सामथ्य पर अचल 

विश्वात था ।? 

प्रसाद जी अद्ष्टयादी अवश्य थे। जीवन की परिस्थितियों ने 
उनका विश्वास नियति में करा दिया था | जब हमारी परिस्थितियाँ 
हमारी शक्ति के बाहर रहती हं ओर हम उन्हें अपने अनुकूल नहीं 
बना पाते तभी हस अरदृष्ट पर विश्वास करने लगते हैं | प्रसाद जी को 
भयानक जीवन-संग्राम करना पड़ा था और इस कारण अपनी ही 
अनुभति को लेकर यदि प्रसाद जी के चरित्र जीवन-संघर्प सें असफल 
हो अद्ृष्ट में विश्वास करे तो यह कृत्रिम व्यक्तित्व नहीं| यह तो एक 


डे ] [ असाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


मनोवैज्ञानिक परिस्थिति ही समझी जावेगी । साधारण मनुष्य जब 
अपनी सासारिक कठिनाइयों मे असफल हो अदृष्ट और नियति की 
पुकार मचाने लगते हैं, तब हम उन पर दाशंनिकता का आरोप नहीं 
करते | प्रसाद जी के नाअकों को इस रूप में दाशनिक नाठक समझना 
भूल है | यह अवश्य है कि उनके कुछ निज के विचार हें परन्ठ प्रत्येक 
कलाकार का कुछ न कुछ उद्देश्य रहा करता है--उसके कुछु न कुछ 
जीवन के सिद्धान्त रहा करते हैं---जिन्हे हम कलाकार के दाशनिक 
सिद्धान्त कह सकते हैं | परन्तु उनके नाटकों ओर पात्रों को दार्शनिक 
कहना भूल है । 
कृष्णशंकर जी से मिलते हुए कुछ कुछ विचार प्रोफेसर सत्वेन्द्र 
जी के भी हैं | प्रसाद जी के नाठक? नामक लेख भे वे लिखते हैं--- 
“प्रसाद जी के इन सभी नाटकों से एक विशेषता मिलती है, वह 
विदग्ध व्यग्रता है। सभी पात्रों मे एक उत्तेजना व्याप्त है, एक हलचल 
है ओर व्याकुलता है--ठीक भीड़ से भरे वाजार मे उनके पात्र बिना 
इधर-उधर देखे हड़बड़ी मे धक्का-सुक्की से अपना साग बनाते चलते 
से ओर उस सबके लिए अपना कारण ओर अपनी व्याख्या रखते से 
चलते हैं | इसलिए उनमे दाशनिकता भी है। कवि ने कूठ या सच 
इसी 'विदग्ध व्यग्रता? से अन्तद्वंद् सानकर ससवत; सन्तोष किया है |??* 
सचमुच यदि प्रसाद जी के पात्र “बिना इधर-उधर देखे हड़बड़ी 
से धक्का-मुक्की से? अपना माग बनाते चलते हो तो उनके नाटक पागलो 
का अजायबघर ही समझा जासा चाहिए, ओर पात्रों की दाशनिकता 
उनकी व्यक्तिगत सनक । प्रसाद जी के बारे से यह आलोचना बड़ी कड़ी 
है। वास्तव से पातच्नो की उत्तेजना घटना के घात-प्रतिघात के कारण 
ह] है। पात्र घटनाओं को अपने अनुकूल बनाने का प्रयत्ष करते 
हैं, परन्तु अदृष्ठ सभी कुछ पात्रों की इच्छानुसार नहीं होने देता, इस 








१ अखादजी की कला?, घुछ ३२-३३ 


प्रसाद की नाव्य-कला | [३७ 


कारण घटनाओं का विकास ओर पात्रों की कार्यपटुता कहीं-कही मेल 
नही खाती | परन्तु यह घटना ओर पात्रों का संघय आवश्यक है, उसी 
पर दर्शकों का मनोरंजन और उत्सुकता निर्मर रहती है| लेकिन इस 
संघप का अन्त भी होना चाहिए, नहीं तो नाटक की समाप्ति ही न 
होगी | प्रसाद जी के पात्र इसी कारण नियति के साथ ही साथ अपने 
करे में भी विश्वास रखते हैं | उनकी विदग्ध व्यग्रता उनकी क्रिया- 
त्मकता के फलस्वरूप है | यह पात्रों की अपनी निजी विशेषता नहीं | 
इस विदस्घ व्यग्रता को ही पात्रों मे अन्तद्वंद् का कारण समभना भी 
मल है। पात्रों का अ्रन्तद्व 6 जैसा हम नाठकों की आलोचना करते 
समय देखेंगे उनके चरित्र की दुवलताओं के कारण है। 


चरित्र-चित्रण 


भारतीय नादयकला के अनुरूप इनके नाटकों के नायक सभी 
उच्चकुलीन राजवश के हैं। द्विजेद्दलाल राय ने चन्द्रगुप्त को नीच 
जाति का जन्मा हुआ भेनकर भी नाटक का नायक त्रनाया है, लेकिन 
प्रसाद जी ने चन्द्रगुप्त को क्षत्रिय मानकर ही उसे नायक के पद पर 
आसीन किया है| नायक नाठक में अन्तह॑न्द ओर बहिद॑द्व दोनों का 
सामना करता है ओर अन्त मे दोनों मे सफल भी हो जाता है'। अ्रजात- 
श॒त्र मे अन्तद्वद्व नहीं है, परन्तु नायक के चरित्र की प्रारम्भिक दुबलता 
( ऋरता ) बाह्य घटनाओं से प्रभावित हो विलीन हो जाती है। बाह्य- 
द्वंद् म भी नायक सफल होकर मगध का राजा बनता है ओर प्रसेनजित 
की कन्या से विवाह कर कोशल से मैत्री स्थापित करता है| स्कन्दगुप्त 
ओर चाणाक्य भी अपने अन्तद्ंद् ओर बहिहद्वंद्व पर विजयी होते 
हैं। नायक की यह दोनो प्रकार की विजय नाटककार के अनुसार 
आवश्यक है | 

इन नायको के प्रतिद्वंद्वी भी रहा करते हैं, परन्तु ये प्रतिद्वंद्वी प्रायः 
राजनैतिक चित्र के ही हैं प्रेम वा ड्भार के नहीं | प्रतिहंद्दीं की मान- 


हि | 


श्प् ] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 
सिक वेदना ही उसका कठोर दण्ड ह | क्योंकि ये प्र केबल खल 
ही नहीं चारित्रयुक्त सी हैं ओर इस कारण अपनी भूल समझने पर 
उनका पछतावा स्वामाविक ही हे नाटक के अन्त में वे नायक द्वारा 
क्षुमा कर दिये जाते हैं| कहीं-कहीं प्रतिद्वंद्वियो की संख्या अधिक बढ़ 
जाती है जैसे अजातशत्रु म । 

जी पात्रों के निर्माण भे प्रसाद जी विशेष कुशल है। इन चरित्रों 
के गठन मे वे पुरुष चरित्रों की अपेज्ञा अधिक सफल सी हुए है 
प्रारम्भ ही से रुचि नारी के सोढये ओर प्रेस की ओर रही है, इ 
कारण वे देवसेना के समान सुन्दर चित्र अद्धित करने मे सफल हुए 


-- च् ९ 


देवसेना तो नारी की कोमल भावनाओं की मूति हैं। उसके रूप से सोंदय॑, 
संगीत, काव्य, प्रकृति और त्याग वा वलिदान साकार होकर ही बोलने 
लगा है | हृदय की कोमल कल्पना की यह प्रतिमा हिन्दी साहित्य की 
ही नही, संसार के साहित्य की अनोखी भेंट है | वासवी ओर देवकी 
नारियों के नहीं ढेवियों के चित्र हैं। उनके आदश के सामने उनका 
कोई भी पुरुष पात्र नहीं ठहर पाता | नारियो'के चरित्र मं विविधता 
भी है| योवन की मदिरा से प्रमत्त सुवासिनी, महत्वाकांक्षी की घुजा- 
रिन विजया, त्याग की मूर्ति देवसेना ओर मल्लिका कुशल नाटककार 
के चित्रित पात्र हैं। क्ररता, स्वावलम्बी और स्वाथ नारियों के 
चित्र में अनन्तठेवी, सागन्धी झोर छुलना भी है, जिनकी पाशविक 
वृकत्तियों से हमारे छृदय पर आघात लगने लगता है, लेकिन उनका 
आकस्मिक किन्तु स्थासाविक परिवतन हमे नारी जाति की कोसलता 
ओर स्तनिग्घता की ओर ही ले जाती है| प्रसाद जी सारी जाति को 
सम्मान का दष्ट से ही देखते रहे है । अतएव वे शेक्सपियर की लेडी 
सकवथ के समान चरित्रों के निर्माण में सदेव ही असमथ रहते। 
आदर्शाचुसार नारी जाति समाज की सुद्ृढ नींव है | वह 
अपन सम द्वारा स्वर्ग का सूजन कर सकती है | उसके “राज्य की सीसा 
विस्तृत है, और घुरुष की संकीर्ण । कठोरता का उदाहरण हें पुरुष और 


/ग| ४ 
! 5, 


असाद की साव्य-कछा ) [३६ 


कोसहूता का विश्लेषण है स्री जाति। छुरुण करता दे तो ख्री करुणा दे 
जो अमन्दर्सगन्‌ का ड्यूतस विकास है, जिसके घल पर उमे सदाचार 
उहरे हुए हैं। इसलिए प्रकृति ने उसे इतना सुन्दर क्रीर सबसोहन 
आवरण दिया दै--स्सणी का रूप |?! 
(अजातशत्र , इप्ड ३४६ ४) 

हृठय की र म्पूर्ण कोमल भावनाओं का सर्दिर नारी का छदय है 
ऋरता स्ली जाति का गुण नहीं | “डसे नारी जाति जिस द्विन स्वीकृत 
कर लेगी, उस द्विंन समस्ठ सदाचारों मे विप्लव होगा ।/ 
अनंतदेवी, छुलना और मागन्धी ने अपनी नारी-सुलस कोमलता 
ओऔर स्तिग्घता को छोड़ ऋर बनने की चेष्टा की थी; फल गृह-विद्रोह, 
समाज-विद्रोह और देश-विद्वोह ही हुए । 

पुरुष पात्रों में त्याग की जो भावना प्रसाद जी ने रखी है; वही 
भावना हमें स्त्री पात्रों में मिलती है| परन्ठ यह त्याग एक लवीन 
रूप लेता ४ | पद्मावती, वासवी, देवसेना, मालविका का त्याग विरक्ति 
के फलस्वरूप नहीं है यह प्रायः ख्री-सलभ सौदर्य और समवेंदना की 
प्रसृति है; “यथार्थ में, खिर्यों से त्याग की अपेक्षा सेवाबसि और अलुकम्पा 
पर अधिक जोर दिया हें | उनका त्याग अधिकतर इन्हीं गुर्णों से डत्पन्न 
होता है, पुरुष की भॉति विरक्ति से कम । जहां विरक्ति दिखाई गई हे 
बहों स्री या तो महत्वासिलापिणी है था पतिता, जिसे अपने जीवन भर 
निराशाओं और असफबता से सुठ्भेड़ करवे-दरते अन्त में विराग होने 
लगता हैं ।??* 

धार्मिक जनों और मिन्नुओं के चरित्र भी ऐतिहासिक होते हुए 
सुन्दर बन पढ़े हैं। गौतम जैसे धर्म्मावलाम्बियों के साथ ही साथ प्रचंड 
बुद्धि, देवब्रत आदि जैसे ढकोसले फैलाने वाले मिछ्ुओ के परित्रों को 
देख, प्रसाढ जी की प्रयूत्ती कल्पना ओर चरित्र-निर्माण शक्ति पर 


4 लिन नतिनि तट एप कि 


१(शलीमसुख-- असाद की नाव्य-कृला?, छठ ९७ 


४० | [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नादक 


आश्चय मालूम होता है। चरित्र-चित्रण के बारे से हम ऊपर भी बहुत 
कुछ कह आये ई ओर नाटकों की आलोचना करते समय भी कुछ 
चरित्रों को देखेगे, अतएवं यहाँ पर केवल इतना ही कह देना उचित 
होगा कि चरित्रों ओर घटनाओ का बाहुल्य होने के कारण नावको के 
प्रसुख चरित्रों में न तो परिरिथतियों के अनुसार विकास ही हुआ है 
ओर न उनमे अन्तद्व द ही है । अधिकतर चरित्र एकांगी ही है । 


कथोपकथन 


(४ 


बहुरूपता 

कथोपकथन का व्यवहारानुकूल, भावव्यंजक, संघप्मव ओर चुस्त 
होना आवश्यक है | इस विषय से प्रसाद जी बहुत कुशल हैं| उनके 
पात्रों का वार्तालाप बहुत ही सुन्दर, स्वाभाविक और मनोवैज्ञानिक हुआ 
है ।वाणी ही मनुष्य चरित्र की द्योतक है। क्रूरता ओर शीलता मनुष्य 
के मुख से ही मालूम होती है। 

“छुलना---यह सब जिन्हे खाने को नही सिलता उन्हे 
चाहिए । जो भ्रञ्ञु है, जिन्हे पर्याप्त है उन्हें किसी की क्‍या चिन्ता 
जो व्यर्थ अपनी आत्मा दबावें । 

चासवी--क्या तुस मेरा भी अपमान किया चाहती हो ? 
पद्मा तो जैसी मेरी, वेसी ही तुम्हारी, डले कहने का तुम्हे अधिकार 
है ; किन्तु तुम तो मुससे छोटी हो, शील और विनय का यह दुष्ट 
डदाहरण सिखा कर बर्च्चों की क्यों हानि कर रही हो ? 

छलना--(स्वगत)--मैं छोटी हुँ यह अभिम्तान तुम्हारा 
अभी गया नहीं है ! (प्रकट)--मैं छोटी हूँ या बडी, किस्तुराजमात्ा 
हैँ । अजात को शिक्षा देने का मुम्के अधिकार है। उसे राजा होना 
है! वह भिखसंगों का जो श्रकस॑ण्य होकर राज्य छोड़ कर दरिद्र 
हो गये है उपदेश नहीं अहण करने पावेशा ॥?? 


(अजातशनत्रु, पृष्ठ ३३-३४ ) 


प्रसाद की ताव्य-कला | [४१ 


मनोवेश्ञानिक होते हुए भी कथोपकथन कितना संघर्षमय है । 
संघप्मय बार्तालाय ही नाटक के प्राण हैं वही कार्य व्यापार को प्रसारित 
करता है | काय-संचालन कराने का नाटककार के पास यही एक साधन 
है | वार्तालाप पर चरित्र-चित्रण भी निर्भर रहता हे, परन्तु सदैव ही 
वार्ताज्ञाप सघप्रमय होना आवश्यक नही है। ब्राह्मणो और साधुओं के 
वार्तालाप कितने सरल उपदेशात्मक और लम्बे हो गये हैं ; क्योंकि 
स्वभावानुकूल उन्‍हें नीति ओर कतंव्य ज्ञान कराने के लिए. विषय की 
विस्तृत्त व्याख्या करनी पड़ती है | सघपंमय न होने के कारण ऐसे 
वार्ताज्ञाप कथानक नहीं बढ़ा पाते इस कारण ये कभी-कभी अ्ररुच्िकर 
होने लगते है | अच्छा हो कि ऐसे वर्तालाप छोटे ही हो । करुणा के 
ऊपर गौतम की व्याख्या कुछ अरुचिकर अवश्य मालूम होती है परन्तु 
है वह स्वाभाविक | प्रसाद जी ने पात्रों के अनुसार ही उनका वार्तालाप 
रखा है | दाशनिक का वार्ताल्ञाप उसकी प्रवृत्ति के अनुसार ही है-- 
जो अपने विचारों मे अधिक लब॒लीन रहता है उसे ससार की प्रत्यन्ष 
घटनाओं का ध्यान ही कया । 

“दायडायन--पवन एक क्षण विश्राम नहीं लेता, सिंधु की 
जलधारा बही जा रही है, बादलों के नीचे पक्षियों का कुड डडा 
जा रहा है, पत्येक परमाणु न जाने किस आकर्षण में खीचे चले 
जा रहे हैं । जेसे काल अनेक रूप में चल रहा है। यही तो ... ... 

एनि०--महाक्ान ! 

दाण्डायन--चुप रहो, सब चलें जा रहे है, तुम भी चले 
जाओ । अवकाश नहीं अवसर नहीं । 

एनि०---आपसे छुछ . ... 

दाण्डा ०--सुमसे कुछ मत कहो । कहो तो अपने आप ही 
कहो, जिसे आवश्यकता होगी सुन लेगा । देखते हो, कोई किसी 
की सुनता है। में कहता हँ--सिंछु के एक बिन्दु ! धारा में न 
बहकर मेरी बात सुनने के लिए ठहर जा, वह सुनता है ? ददरता 


४२ ] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नादक 

है ? कदाएि लहाँ ।?ः 

कथनोंपकथन की भापा रस-संचार में भी सहायक होती हे | 
चरित्रों के मनोवेगों द्वारा उसका रूप आप से आप बदलता रहता है | 
योवन के पदापण काल से ग्रेम का प्रथम कट अनुभव मातठ्मुत्त को 
कवि बना देता है,“अज्छत के सरोचर से स्वण कम्तल खिल रहा था, अमर 
चंशी बजा रहा था, सौरभ ओर परार की चहल-पहल थी । सवेरे सूच्य 
की किरण उसे चूसने को लोटती थी, सन्ध्या में शीतल चॉढद्नी डसे 
अपनी चादर से टेंक देती थी । डस सघुर सौदर्य, उस अतीन्द्रिय जगत 
की साकार कल्पना की ओर मैंने हाथ बढाया था वही-बहीं स्वत टृट 
शया ।? परन्तु कतंव्य के कठोर पथ से उसके शब्द सरल कल्पनाहीन 
ओर वाक्य छोटे हो जाते हैं । 

क्रोध का कितना सुन्दर चित्रण वार्तालाप द्वारा हुआ है-- 

“रक्त के पिपासु : क्ररकर्म्मा सनुष्य ! कृतश्वता की कीच 
का कीड़ा । नक की दुर्गेल्छ ! तेरी इच्छा कदापि पूर्ण न होने 
दूँ गी ।?? 

पागलपन का भी चित्र देख लीजिए--- 

“रामा-छुटेरा है तू सी | क्या लेगा, मेरी सूखी हड्डियाँ ? 
तेरे दातों से टूटेगी ! दुख तो--(हाथ बढती हैं) । 

स्कन्दु०--कीन ? राप्ता ! 

रासा--(आश्चय्र से) मे रासा हूँ । हों, जिरकी सन्तान को 
हणी ने पीस डाला...... 72 

दुभ्ख से पागल हुए शकटार को भी सुन लीजिए--- 

“दुख + ढुःख का नाम लुवा होगा, था कल्पित आशका से 
उसका नाम लंकर चिन्नला उठते होंगे। देगा है करी , सात-लात 
गोद के लालों को भूख से तड़प कर मरते ? अन्घकार की घनी 
चादर स बरसों स्गस को जीवित सम्राधि में एक द्फरे को अपना 
आहार दुकर स्वेेच्छा से सरते देखा हे । प्रतिहिसा की स्खति को; 


असाद की नाव्य कल्ला | [ ४३ 


ढोकरे' मारकर जगाते-गगाते, और माण विसजेन करते ? देखा है 
कभी यह कष्ट |! उन सब्रों ने अपना आहार सुर्के दिया और पिता 
होकर भी मे पत्थर-सा जीवित रहा ! उनका शाहार खा ढाला, 
उन्हे सरने द्विया... ... )१ 
मनोवेगानुसार पात्रों की भाषा में यह परिवर्तत होना अधिक 
के है। अतएव प्रसाद जी की भाषा के विपय मे यह धारणा 
सर्भ अनेकरूपता नहीं बडी भूल है। हाँ, यह अवश्य है कि 
हाने संस्कृत की तत्सम पदावली को छोड़ अन्य भाषा का उपयोग 
ही किया | पर लेखक की यह अरसमर्थता उसकी कल्ना के अनुरूप ही 
तिकूल नहीं | प्रसाद जी के नाटक सव्य सारत केचित्र है जो हमारे 
आज के ठीन-हीन, परतंत्र, असहाय भारत से भिन्न हमारे उत्कपं के 
सुन्दर चित्र हैं| जो हमारे लिए एक आहठशा, एक कब्पना, एक 
स्वर्गीय आनंद का लोक बन गया हे | इस लोक को दीप्मान रणों 
द्वारा ही अंझित किया जा सकता है | सासान्य बोलचाल की सापा 
उसे हमारे नित्यप्रति के जीवन से ऊपर न उठा सकेगी अतएव उस 
नैसगिक जगत का निर्माण बहुत कुछ प्रसाद जी के भाषा-सोष्ठव और 
मलकान्त पदावली द्वारा हुआ हैँ। इन पूव युगों के श्रकन करने 
का सफलता बहुत कुछ उनको भापा पर हैं । 
जैसा हम ऊपर देख आये हैं प्रसाद जी ने अपने इस संकुचितत्षेत्र 
से भी भापरा की अनेकरूपता रखी है । जिसके कारण वार्तालाप बहुत 
ही स्वाभाविक हुआ है| प्रोफेसर सत्येन्द्र जी ने अपने लेख मे प्रसाद 
जी की भाषा पर नोट लिखते हुए कहा है कि इनके “सभी पात्र एक- 
सी भाषा बीलतें हे, ग्रीक, चीनी शक, हूण, उत्तरी, पश्चिमी, दक्षिणी, 
सब उनके रगमच पर आकर एकभापी हो जाते हैं।” नाटककार 
हिन्दी मे नाटक लिख रहा है। उसके लिए असारतीय भाषा का 
प्रयोग करता आवश्यक नही, कोई भी पाठक घ दर्शक इन भाषाओं 
को केसे समझ सकता है ? यह तो नाव्यकला के मृल सिद्धान्तों मे से 


् 


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5 | ८६ 


४४ ] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


एक है। यदि नाटककार को पूर्ण स्वाभाविकता वा ऐतिहासिकता 
रखनी होती तो अच्छा होता वह तत्कालीन संस्कृत, पालि, अपश्र श 
आदि का उपयोग करता, परन्तु उसका यह काय कला के प्रारम्भिक 
सिद्धान्तों के विपरीत हो जाता | नाटककार हिन्दी से नाटक लिख रहा 
है | वह भाषा-विज्ञान का प्रद्शन नहीं कर रहा है | हाँ, यह अवश्य 
कहा जा सकता है कि प्रसाद जी ने प्रान्तीय वोलियों का उपयोग नहीं 
किया । परन्तु इसका कारण हम ऊपर ही लिख आये हैं। 


पद्य का ग्रयोग 


प्रसाद जी के कथनोपकथन में खटकने वाला एक दोप है ओर 
वह है पात्रों का गद्य में बात करते-करते पद्म में बोलने लगना। पूर्व 
नाठकों में यह प्रव्नत्ति अधिक है। परन्तु पारसीक नाठक कम्पनियों की 
भाँति तुकड़बाजी ओर शेरबाजी इनके उत्तर नागकों से नहीं मिलती | 
प्रारम्भिक नाठको में प्रसाद जी संल्क्ृत नाठकों से प्रभावित थे साथ ही 
उस समय के नाटककारों में भी यह प्रद्धत्ति अधिक थी | बंगाली नाटकों 
के अनुवादों ने इस गद्य-पद्य के मिश्रण में सुधार कर दिया। भारतेन्दु 
जी के नाठकों मे स्फुट कविताएँ अधिक हैं | राधेश्यास जी कथावाचक, 
माखनलाल चतुबंदी ओर वालक्ृष्ण भट्ट के नाथकों में भी गद्य-पत्म 
का मेल अधिक है | प्रसाद जी की प्रतिभा इस गद्य-पद्म के कम प्रयोग 
में ही है। उनके परवर्ती वा समकालीन नाटकों के देखने से तो उनकी 
शेरबाजी प्रायः नहीं के बरावर ही मालूम होती है। प्रसाद जी ने अपने 
पतद्मों के उपयोग मे थोड़ा परिष्कार सी कर दिया है। पद्म का प्रयोग 
पात्रों ने साधारण बातचीत या घटना वर्शन के लिए नहीं किया है। 
उनका उपयोग प्रायः सूक्तियों के ही रूप से है। अजातशत्र से वासवी 
कहती हे-- का 
“यह सैक्‍्या देख रही हूँ । छुलना यह गृह-विद्रोह की आगतू 
क्यों जलाना चाहती है ? राजपरिवार मे क्या सुख भ्रपेक्षित नहीं है ? 


अपादु की नाव्य-कला | [ ४६ 


बच्चे बच्चों से खेले, हो स्नेह बढ़ा उनके मन में 
कुत्न लचंपी हों सदित, अरु हो संगल डनके जीवन से | 
बन्धु चस हां सम्मानित, हो सेवक सुखी प्रणत अनुचर, 
शांतिपुण हो स्वामी का सन, तो स्पृहणीय न हो क्यों घर !? 
समुद्रगुम को भेजती हुई श्यामा कहती है--- 
“यामा--जाशों बलि के बकरे जाओ, फिर कभी न 
थ्राना । मेरा शलन्द्र, सेरा शेलेन्द्र--- 
तुम्हारी मोहनी छुवि हर निछाचर प्राण हैं मेरे, 
अखिल भूलाक बलिहारी मधुर झदुहास पर तेरे |? 
अथबचा 'तो इससे कया ! हस अपना कतेब्य पालन करते 
हैं, दुःख से विचलित तो होते नहीं । 
लोभ सुख का नहीं, न तो दर हे, 
प्राण कतंव्य पर निछावर है।?? 
ये पद्म की पक्तियाँ एक प्रकार से लोक-प्रसिद्न उक्तियाँ ही मालूम होती 
हैं| ऐसे अवसर हमारे जीवन में भी श्राते हैं। जब हम कभी-कभी किसी 
दोहे आदि का प्रयोग अपनी बातचीत मे कर देते हैं । पद्य का सम्बन्ध 
पात्रों के वार्तालाप से है अवश्य, लेकिन परोक्ष रूप मे | अन्य स्थलों 
पर सी जहाँ नाटककार ने ऐसे पद्मों का उपयोग किया है वहाँ इस बात 
का पूरा ध्यान रखा है कि पद्च की पंक्तियाँ पात्रों की स्वयं की रचना 
न मालम हो जो वह गद्य की बात को पूरा करने के लिए उसी अवसर 
पर रचता जा रहा हो। गोतम का यह कथन साघुश्रों के कितने स्वभा 
वानुकूल हुआ है | परन्ठ ये गौतम की आशु-कवियों के समान तत्का- 
लीन रचना नहीं मालूम होती | 


“राजन ! कोई किसी को अनुसुहीत नहीं करता । विश्व सर 
में यदि कुछ कर सकती है तो वह करुणा है जो आशिमात्र सें 
समदप्टि रखती हे 


४६ | [ प्रसाद के तीव ऐतिहासिक नादक 


सोधूली की राग पटल से स्नेहांचल फहराती है । 
स्तिग्ध डपा के शुअ गगन सेहास विलास दिखाती हे॥ 
सुग्ध मधुर बालक के सन पर चन्द्रकानिति वरसाती हे । 
निर्निसेष ताराओं से यह ओस बूंद भर लाती है ॥? 
ये पक्तियाँ या तो पूब-रचित मालूम होती है | या अन्य कवि की रचना 
जिनका उपयोग वे अपने विचारों को स्पष्ट करने के लिए करते हैं | 
उदयन ओर सागन्धी के वार्तालाप से यह बात और अधिक 
स्पष्ट हो जावेगी | 
“उदयन - ह॒दये श्वरी | कौन सुर को तुम से अलग कर सकता है 
हमारे वक्त सें वलकर हृदय जब छवि समावेगी, 
स्वयं निज साधुरी छुबि का रसखीला गान गावेणी । 
अलरा तब चेतना ही विश्व से कुछ रह न जावेगी, 
अकेले विश्व-मंदिर से तुम्हीं को पूज पावेगी ॥?? 
ये पद्म माग उदयन के हृदय के भावों का उतना अच्छा चित्रण नहीं 
करता जितना किसी छायावादी कवि केह्ृदय को। उदयन का मामगन्धी 
के लिए--- 
“अलग तब चेतना ही विश्व से कुछ रह न जावेगी, 
अकेले विश्व-पंद्रि से तुम्ही को पूज पावेरी ॥?? 
कहना कुछ हास्यप्रद मालूम होता है | यह तो किसी भक्त की वाणी 
मालूम होती है जो अपने अस्तित्य को परमात्मा मे मिल्लाकर इस विश्व 
मंदिर से उसी एक परमात्मा की छवि की आराघना में लगना चाहती 
है | उदयन का यह कथन उसी समय ही स्वासाविक हो सकता है जब 
हम इन पक्तियो को किसी अन्य कवि की रचनाएँ समझे जिनका 
उपयोग उसने अपने भावों की समानता समभाने के लिए ही किया 
हो | ठीक यही मत श्यामा के इस कथन के वारे मे भी है-- 
'श्याम्ना--ओह ! विप ! सिर घूम रहा है। मे बहुत पी 
खुकी हूँ अब" "जल" '“*भयानक स्वप्त । क्या तुस सुझे जचते 


प्रसाद की नाव्य-कला ] [ ४७ 


हुए हलाहल की मात्रा पिला दोगे । 
अखत हो जायगा विप भी पिला दो हाथ से अपने, 
पृल्चनक ये छुक चुके हैं चेतना उसमें लगी कँपने । 
विकल हैं इन्द्रियाँ--हों देखते इस रूप के सपने; 
जगत्‌ विस्द्धत हृदय पुलकित, लगा वह नाम है जपने 
इस प्रकार यह गद्य-पद्म का प्रयोग कही भी अस्वाभाविक वा हास्यप्रद 
नही होने पाया है। उन्होने कही भी अन्य नाटककारों की भाँति पद्म 
का प्रयोग साधारण बातचीत को व्यक्त करने के लिए नहीं किया | 
ऊपर के उदाहरण्‌ों से कितने भिन्न हैं । 
(१) चन्द्र ०--रणधीर, यह क्‍या है--ठुम आय हो फिर भी 
तुम्हारी इसकी ऐसी मित्रता ! 
रणधीर ०--महाराज, क्या कहेँ मित्रता, है दैवी वरदान 
है अपूर्य आल्हाठदायिनी यथा स्वर्ग का गान ) 
न न ण् 
(२) अलक ०--महाराज, शोक है कि कोई उत्तर देने वाला न था 
और (क्रोध से) 
कभी मिला तो उसके तन का खड-खंड कर उत्तर दूँगा । 
ओर क्या कहूँ?! शठ यवनो से रण प्रचंड कर उत्तर देगा | 
(३) सिपाही--श्रीमान की जय ! कप्तान रणधीर सिंह 
विक्रम --रण दुर्मेद रणधीर ! वीर तुम धन्य हो 
शत्र्‌ हृदय के तीर ! वीर तुम धन्य हो | 
( देखता हुआ ) क्या ? बुरी तरह घायल हुआ है ! 
एक सिपाही--मसान्यवर ! 
छाती में नो घाव, खड़ के.खाने वाले 
सब शरीर विंध गया न पीठ दिखाने वाले 
की जाँघ, वेकास हो गया वाँया कर भी 
लड़ गये, लेकिन इतने घायल होकर भी | 


ध्म ] [ प्रसाद के तीच ऐतिहासिक नाटक 


हाँ, रिपु की हँसी करता हुआ, जब रक्त बहुत निकल गया 
तब्र हो अचेत गिरे--अहो सु ह वीरता का फुठ गया । 


स्वगत 


नाटककार के लिए हृदय के सावो को प्रगठ करने के लिए स्वगत 

का उपयोग बहुत ही आवश्यक हो जाता है | परन्तु स्वगत का उपयोग 
कुछ अस्वाभाविक-सा मालूम होता है | दूर बैठे हुए दर्शक तो पात्रों 
का स्वगत सुन लेते हैं, परन्तु रंगमंच पर खड़ा हुआ दूसरा पात्र नहीं 
सुनने पाता | अतएवं सफल नाटककार ऐसे अवसरों को अपने नाटकों 
मे कम ही लाते हैं। राय महोदय ने अपने नूरजहाँ नाटक में स्वगत 
का प्रयोग बिलकुल ही नहीं किया है| चू कि उनके लिए नूरजहाँ मे 
एक ओर स्वामिसक्ति और दूसरी ओर सम्राज्ी होने की लालसा के 
सघर्ष का चित्रण करने के लिए स्वगत का उपयोग अनिवाये था। 
परन्तु अस्वाभाविकता के डर से उन्होंने अपने कोशल द्वारा यह इंद्र 
दूसरे रूप में प्रगट कर दिया है | स्वगत का उपयोग प्राचीन नाटको मे 
भी किया जाता था। पूव ओर पश्चिम नास्यशाख्र इसे 20७४० 
]06786 भानते हैं, परन्तु नाटककार का कोशल इसी से है कि वह 

इसका बहुत ही कम उपयोग करे। प्रसाद जी के प्रारम्मिक नाटकों में 
स्वगत का उचित उपयोग नही हुआ है। कुछ स्थानों पर तो नाटक- 


कार थोड़े ही कोशल से स्वगत हटा सकता था। 
यथा-- 


'छुलना--(स्वगत)--मे छोटी हूँ । यह अभिम्तान तुम्हारा 
अभी गया नहीं है । (प्रकट) मे छोटी हूँ या बढ़ी किन्तु राजसाता हूँ । 
स्वगत का वात छुलना स्पष्ट भी कह सकती थी | क्योंकि यह बात 
प्रकट कथन से किसी प्रकार कम कठु नही है । दूसरे स्थान पर भी--- 


जीवक--(स्वगृत) यह विदूषक इस ससय कहाँ से आ गया । 
भरावान्‌ , किसी तरह हटे । 


असादु की नाव्य-कला |] [ ४६ 


यदि लेखक चाहता तो इस कथन को वार्तालाप से ही रख सकता था। 
इसी प्रकार--- 

“प्रसेन--(स्वगत) अभी से इसका गये तोड़ देवा चाहिए?? 
की आवश्यकता न थी प्रसेन के प्रक८ कथन से कि “आज से यह 
निर्भीक किन्तु अशिष्ट बालक अपने युवराज पद से उचित किया 
गया “'““'»स्वगत का कास चल सकता है। लेखक यदि चाहता 
तो इन स्वगत कथनों को या तो विल्कुल ही हटा सकता था था उनसम 
कुछ परिवरततन कर उन्हें अधिक स्वासाविक बना सकता था। परन्तु 
मालूम होता है कि नाटककार ने उन्हे कवि की स्वच्छुन्दता समककर 
इनकी अस्वाभाविकता की ओर ध्यान नहीं दिया । 

कभी-कभी वाटकों में, अपने भावों को व्यक्त करने के लिए या 
पिछली वा आगे आनेवाली घटना के सूचनाथ एक-दूसरे प्रकार के 
स्वगत का उपयोग किया जाता है। इसमे पात्र स्वगत मे ही बोलता हे, 
परन्तु दूसरे पात्रों के सम्मुख नहीं | स्वाभाविकता की दृष्टि से यह भी 
एक दोप है। क्योंकि यह पात्रो का चिन्तन न होकर बड़बड़ाना हो 
जाता है | संघर्पात्मक न होने के कारण ऐसे कथन जितने ही छोटे हों 
उतने ही अच्छे | विंबसार का अकेले बैठे-बैठे बड़बडाना दशकों को 
बहुत ही खराब सालूम होगा। अच्छा होता यदि ब्रिंबसार का यह 
कथन--“गआ्राह जीवन की क्षणमंगुरता..... » आदि संक्तित कर 
दिया गया होता | स्कन्द का स्वगत “अधिकार सुख कितना मादक और 
सारहीन है... ...” संज्षिस होने के कारण उतना नही खयकता । बाजरा 
का भी स्वगत बहुत लम्बा है | यदि इस स्वगत को नाटककार ने 
देवसेना ओर विजया की बातचीत के समान दो सख्ियों के वार्तालाप 
में करा दिया होता तों दशकों और पाठकों दोनों की दृष्टि से दृश्य 
अधिक मनोरंजक हो जाता ओर अस्वाभाविक्ता भी न रहती। 
अजातशन्रु का नाटककार अभी अपनी कला से परिपक्व नही हुआ है । 
बाद के नाथ्कों में ये दोप कम मिलते हैं। 

४ 


कैद कि रही हुँ..८>कर फक : हो: सका 
#० | [ प्रम्गद् के छीन एसिहालिक सादक 


संगीत 

नाथक की रचना कथीपकवन संगीत आर दल पर ही निभर ६ | 
गीत रंगसच पर मनारंजक के सबसे सुन्दर साधन ४ । उन स्थानी 
उपयुक्तता ओर भावप्रदर्शन नावक ऊे दृश्यों को ओर भी ऋषिफ नीछ 
बना देते हूँ । प्रसादनी के नासकों में बहुत ही सुख्र सीत भरे पट | 
कल्पना भावुकता ओर रसात्मकता मे ये गीत शेक्सपरियर ले गीों हे 
किसी प्रकार कम नहीं है| अन्तर फेवल इतना हीं है झ्लि शेक्सपि 
इसी पार्थिव संसार के दृश्यो। को लेकर डी गीत-रचना करता हे 
भावावेश में वह कल्पना जगत में विचरण करते हुए भी इस संसार को 


नही छोड़ता । उनम एक प्रकार की ग्रमीणुता है | परन्तु प्रसाद जी के 
गीत भौतिक जगत से प्रारंभ होकर “ज्षितिम के उस पार? अनजान 
जगत से पहुँचते है। हमारी आत्मा प्रकृति ओर मासव के वोधगम्य 
भाव ओर सोदर्यानुभूति से धीरे-धीरे उठकर अनन्त शून्य में मिलती 
है | उदयन के तिरस्कार से दुखी पद्मा जब वीणा बजाने बैठती है और 
प्रयास करने पर भी जब उत्तम से स्वर नही निकलते तो उसकी भावना 
करुण रूप लेकर एक मधुर गीत के रूप से निकल पड़ती दे | 

सीड़ मत खिंचे बीन के तार । 

निदुंय अंगुली ! अरी ठहर जा, 

पल भर अज्ुकस्पा से भर जॉ, 

यह मूछित सूछेना आह सी, 

निकलेगी मिस्सार । 
गाते-गाते भावविभोर होकर पद्मावती की करुणता परदे के उस पार 
ही पहुँच जाती हे-..- 

“नृत्य करेगी नम्म विकलता 

परदे के उस पार? 
इस रहस्यवाद ने उनके गीतो को सावभौमिक रंगो से रंग दिया है--वे 
केवल मानवी जगत के करुण गीत नहीं हैं उनमें केवल प्रेमी से बिछुड़ने 


प्रसाद की नाव्य-कला | [ ४१ 


का दुख नहीं है, उनमे है असीम के प्रति ससीम की पुकार-- 
परमात्मा के लिए आत्मा की लालसा | परव्ठु प्रसाद जी के सभी गीत 
रहस्यवादी नहीं हैं; उनके बहुत से गीत स्थल जगत के प्रेम और 
साँंद्य से सबंध रखते ह | 
प्रसाद जी के गीत विपय के अनुसार मुख्यत: दो भागों में बाँटे 
जा सकते हैं---(१) रहस्यवादी तथा रहस्यवाद की भलक लिए हुए, 
(२) अन्य--- 
(१) पूर्ण रहस्यवादी गीत 
(अ) आओ हिये से अहो ! आण प्यारे । 
( अजातशत्रु ) 
(आ) भरा नेनों में मत में रूप 
किस्ती छुलिया का श्रमल अनूप । 
( स्कन्दगुप्त ) 
(इ) बहुत छिपाया उफन पडा अब सम्हालने का सम नहीं है ॥ 
जली दीप-सालिका प्राण की हृदय कुटी स्वच्छु हो गईं है ॥ 
पलक पॉँवडे बिछा चुकी हूँन दूसरा और भय नहीं है | 
चपतल निकल कर कहाँ चले अब इसे कुचल दो खदुल चरण से ॥ 
कि आह निकले दबे हृदय से सला कहो यह विजय नहीं है ॥ 
(३) रहस्यवाद की कलक मात्र लिये हुए 
(अ) सखी यह गम्मसयी रजनी । 
(आ) सुधा खीकर से नहल्वा दो । 
(इ) ओ मेरे जीवन की स्छति, ओ अन्तर के आतुर अनुराग 
(३) अन्य 
(अर) <ंगार वा प्रेस-- 
इन गीतों मे प्रसाद जी संगीत, सौंदर्य-बासना और रूप-चित्रण में 
कवि कीट्स से भी आगे वढ़ गये हैं | 


(१) अली ने क्यों अवर्ेला दी । 
(२) प्शरे निर्मोष्टो होकर... ... 
(३) हमारे जीवन का उल्लास । 
(४) न छेंडता उस अतीत स्छति के 
खिंच हुए बीन चार कोकिल ! 
(४) घने मेंस तरू तले । 
(६) संसति के व सुन्दरतम्त क्षण यों ही भूल नरटीं जाना 
वह डच्छु'खकता थी अपनी कहकर सन सत घहलाना 
(७) शुन्य गगन से हू ता जसे चन्द्र मिराश 
राका में रसणीय यह किसल्‍्का सधुर प्रवा 
(८) भावनिधि से लहरियों उठती कभी 
भूल कर सी स्मरण हा जाता कभी | 
(६) अगयारु धूस् की श्याप्त लहरियाँ डरूक्की हो इन अलर्को से 
मादकता लाली के डोरे इधर फेसे हो. पलकों से । 
(१०) डसड कर चली सियोने आज 


8 | 


तुम्हारा निश्चल धअ्रचल छोर | 
(११) आह वेदना सिली विदाई | 
(१२) तुम्त कनक किरण के अन्तराल में 
लुक छिपकर चलते हो क्यों | 

(१३) प्रथम बोवन सदिरा के मच, मेस करने की थी परवाह 

ओर किसको देना है हृदय चीन्हने की न तनिक थी चाह 
(१४) आज इस योवन के साधवी कुज से 

कोकिल बोल रहा है । 

(१४) केसी कड़ी रूप की ज्वाला । 
(१६) बज रही दंशी आडो यास की 


(३१७) बिखरी किरन अलक व्याकुल हो, निरस बदन पर 
चिता लेख | 


प्रसाद की नाव्य-कला ] [ ४३ 


(आ) प्रकृति 
(१) चज्ना हे सन्‍्थर गति से पवन रसीला ननन्‍्दन कानन का। 
(९) अलका की किस विकल विरहिणी के पत्रकों का ले 
अचलसद ॥ 
(३) चल बरंत बाला अचल से किस घातक लोरभ से मस्त 
(६) प्रार्थना 
(१) दाता सुमति दीजिये । 
(२) स्वजन दीखता न विश्व सें अब । 
(३) डतारोगे अब कब भू भार । 
(६) नीति और व्यवहार 
(१) न धरो कह कर इसको अपना 
यह दो दिन का है सपना । 
(२) स्व है नहीं दूसरा और । 
(३) सब जीवन दीता जाता हे के खेल सचश्य । 
(४) पालना बने प्रत्लयय की लह 
(उ) देशभक्ति 
(१) अरुण यह सधुमय दंश हमारा 
जहा पहुँच अनजान लशितिज को, मिलता एक सहारा 
(२) हिंसालय के ऑगन में; उसे अथम्र किरणों का दू डपहार 
डपा ले हँस अभिनंदन किया ओर पहनाया हीरक हार । 
प्रसाठ जी के गीतो की नाठकीय उपयोगिता भें क्रमशः विकास 
होता गया है [प्रारम्भ की रचनाशओ्रों म गीत अपनी स्वतंत्र सत्ता रखते है। 
वे स्थान, पाच ओर समयानुकूल नहीं “हं। अधिकतर वे कवि की 
खतंत्र रचनाएँ ही मालूम होती हैं जो उसने बाद भें नाटक में रख दी 
हैँ | यह दोप एक ओर तो गीतो मे रहस्यवाद की झलक के कारण 
मालूम होता है, दूसरी ओर पात्रों के वार्तालाप को बलात्‌ ही गीतों से 
स्वंधित करने के प्रयत्न म। दूसरे प्रकार के दोप का एक उदाहरण 


४४ ] [ प्रसाद के तीच ऐतिहासिक नाइक 


अजातशत्र के आठवे दृश्य से है जहाँ श्यामा अपना परिचय देती है । 
यह परिचय गीत एक स्वतंत्र रचना-सी मालूम होती है जिसे रखने के 
लिए ही मालूम होता है शेलेन्द्र श्याम्ग से पूछता है, “तुम क्या हां 
सुन्दरी १» और श्यामा गीत गाकर परिचय देती है| एक ओर दूसरा 
गीत विर्द्रक का जलद के प्रति है। इसम सन्देह्द नहीं कि विरुद्धक 
का मिमल विश्वास कि मल्लिका उससे प्रेम करती हैं उसकी प्रारंसिक 
सावाब्यक्ति के अनुकूल है। 

“आदे हृदय सें करुण कल्पना के सम्मान आकाश से कादम्बिती 
घिरी आ रही है । पवन से उन्सत्त आलिद्गन से तसराजि सिहर उठती 
है । छुलसी हुईं कासनाएँ सन में अंकुरित हो रही हैं । क्यों ? जलदा- 
गसन से ? आह ! 

अलका की किस चिकल घिरहिणी की पलकों का वे अवलम्बःः आदि 
केवल नील नीरद की ओर ही सकेत करती है । 

अजातशत्र के कुछ गीत वहुत सुन्दर है, वे परिस्थिति, पात्र और 
समय का ध्यान रखकर लिखे गये हैं। मारन्धी का “'स्वजन दीखता 
न विश्व से अब तन बात सन में समाय कोई” वाला गीत ख्तंत्र हं 
हुए भी मारन्धी की आआन्तरिक परिस्यिति के अनुकूल ही है। सचउुच 
मे सागन्धी का कोई स्वजन न रह गया था। वास्तविक परिस्थिति 


। हित, ने 
ध््ट 


के | 





के ससग॑ से उसे पथस बार ही करुणा का जाव हुआ और उसी समय 
से वह अनन्त की ओर निहारने लगी थी | 
क्षरिक देदुना अनंत सुख बस सम्तक लिया शूस्य से बसेरा 
पवन पकड़ कर पता बताने न लौट जाया न जाय कोई | 


परन्तु अजातश॒त्र स सबसे सुन्दर गीत राली पद्मावती का है। 


सानासक वेदना से निकली हुई उच्छवास धीरे-घीरे इस संसार को 


अपना वंदना से तरणित कर “परदे के उस पार” पहुच जाता हैं| 
उदयन के तिरस्कार से दुखी होकर जब वह वीणा भी नहीं वजा पाती 


असाद की नाव्य-कला | [ ६६ 


तो मानों उसकी असमथता ही व्यक्त होकर गीत के रूप में निकल पड़ती 
है “म्ीड़ सत खिचे बीन के तार? । असमथता का दुःख ओर भी तीजत्र 
हो जाता है। पीड़ा की कसक ओर भी विकट हो पड़ती है । 
निर्दंग अंगुली अरी ठहर जा, 
पल भर अल्ुकस्पा से भर जा । 
यह मूदछित सूछेना आह सी 
निकलेगी निस्‍्सार | 
पद्मा के भावों, उसकी मानसिक वेदना और असमर्थता को गीत 
हारा जितने सुन्दर रूप में व्यक्त किया गया है वह अद्वितीय है । 
चन्द्रगुतत ओर स्कन्दगुस्त मे गीतों की रचना अपनी पराकाष्ठा पर 
पहुँच गई है। भावों की कॉमलता ओर शब्दों की मधुरता जब 
ध्वनि की सुकुमारता, कल्पना की नवीनता ओर छुन्दों की बहुरूपता 
से मिलती है तो गीत सबॉंग सुन्दर हो उठते हैं। चित्र, काव्य और 
संगीत मानों अपनी सत्ता भूलकर एक हो जाते हैं । उनकी नाटकीय 
उपयोगिता भी अधिक हो जाती है | नाटक की कथावस्तु, चरित्र-चित्रण, 
वातावरण ओर साथ ही पात्रो की भावनाओं से वे ऐसे सम्बद्द हो गये 
हैं कि वे प्रारम्भिक नाटकों के गीतों को भाँति स्वतत्र गीत नहीं कहे जा 
सकते, वे पूर्ण रूप से नाटक के रूप में ही मिल गये हैं। कथावस्वु से 
सम्बन्ध रखनेवाला गीत हमे चद्रन्गुत नाव्क में मिलता है | सुवासिनी, 
रूप, सोदय और संगीत की रानी ने, जब गाना प्रारम्भ किया--- 
आज इस यौवन के साथधवी कुज से कोकिल बोल रहा । 
सु पीकर पागल हुआ करता प्रेस-प्रलाप, 
शिथिल हुआ जाता हृदय जेसे अपने आप 
लाज़ के बंधन खोल रहा ! 
बिछुल रही हे चाँदनी छुबि मतवाली रात, 
कहती करिपत अधर से बहकाने की बात 
कौन सघु सदिरा घोल रहा ? 


६ ] [ प्रसाद के तीच ऐतिहासिक नाठक 


यौवन के इस उन्‍्साद से, इस असंयत रस-प्रवाह से कौन न वह 
जाता १ योवन की कामनाएऐँ अकुरित होकर खिलना चाहती हँ,मतवाली 
चाँदनी रात अपने कम्पित अघरो से वहकाने की बाते कर रही है। 
लाज के बंधन आपसे आप खुलते जा रहे हैं | वासना के इस उठते 
हुए स्पष्ट स्वर को सुन कर भला नंद का हृदव केसे स्थिर रह सकता 
था। उसने सुवासिनी का हाथ पक्रड़ लिया। राक्षस के आगमन से 
ननन्‍्द लज्जित हो जाता है, परन्तु यह घटना राक्षस के हृदय मे नन्‍्द के 
प्रति सन्देह पैदा कर देती है। यदि सुवासिनी इतना मात्क गान न गाती 
तो सम्भव था यह घटना न होती | कथा-प्रवाह बढ़ाने से गीतों का 
यह प्रयोग सुन्दर हुआ है । 
चरित्र-चित्रण के लिए भी प्रसाद जी ने गीतों का प्रयोग किया है [ 
कार्नीलिया का “अरुण यह मधुसय देश हमारा? उसके सारत-प्रेस 
का द्योतक है| परन्तु इससे भी सुन्दर उदाहरण अलका ओर सिंहरण 
के पेम का है| वास्तव से इन दोनों का प्रेम “प्रथम्त यौचन सदिरा से 
सस्त, भेस करने की थी परवाह, और किसको देना हे हृदय, चीन्हने की 
न तनिक थी चाह” के रूप से ही हुआ है। देवसेता के सारे गीत 
उसके चरित्र के एक अंग हैं | उसकी पल्ल-पल परिवर्तित मनोभावों के 
चित्रो को व्यक्त करने से वे अधिक सफल हुए हैं। लड़कपन के खेल 
से मस्त देवसेना का यह गीत उसके यौवन-पदापंण काल, उसके भाव 
और उसके स्वभाव के कितने अनुकूल हुआ है-- 
भरा नेनों से सन से रूप 
किसी छुलिया का असल अनूप । 
छंद की ढुतता मे योवन की स्फूर्ति और उल्लास भरा हुआ है दूसरे 
अवसर पर विजया का चक्रपालित की ओर आकर्षित होते देख कर प्रेम से 
पागल देवसेना अपनी कल्पना के सुखे को समीप जानकर गा उठती है--- 
रस घने प्रेम तरु तले 
पर देवसेना को कल्पना विल्लीन हो गई | जीवन की प्रथम असफलता 


प्रसाद की नाव्य-कला | [ ६७ 


से जनित, छृदय की ह्लुब्घता को व्यक्त करती हुईं देवसेना कहती है-- 
“संगीत सभा की अन्तिस लहरदार ओर आश्रयहीन तान, धृप- 
दान की एक क्षीण गध पूम-रेखा, कुचले हुए फूलों का सलान सोरस 
आर उत्सव के पीछे का अवसाद, इन सबों के प्रतिकृति मेरा छुद्र नारी 
जीवन ! मेरे प्रिय गान । अब क्यों गाऊँ और क्या सुनाऊँ ? इस बार- 
बार के गाये हुए गीतों से क्या अ्राक्पण है; क्या बल हे जो खींचता 
है ? केवल सुनने की ही नहीं, प्रव्युत जिसके साथ अनंत काल तक कंढ 
मिला रखने की इच्छा जग जाती है ।?? 
परन्तु हृदय की भावना जब पूण व्यक्त न हुई तो मानो देवसेना 
गाकर अपनी व्यथा बाहर निकाल देना चाहती है--- 
शून्य गगन सें ढ्ढता जैसे चन्द्र मिराश, 
राका में रसणीय यह किसका मझथुर प्रकाश | 
हृदय ! तू खोजता किसको छिपा है कोन-सा तुरू मे, 
मचलता है बता क्या दूँ छिपा तुमसे न कुछ सुझमें । 
रस-निध्रि में जीवन रहा, सिटी न फिर भी प्यास, 
मुंह खोले सुक्तामयी लीपी स्वाती आस | 
हृदय तू है बना जलनिधि लहरियों खेलती तुरूमे, 
मिला अब कोन सा नवरत्न जो पहले न था तुमसे। 
जीवन भर की असफलता उसकी चिरवेंदना हो जाती है, उसका 
सम्पूण जीवन ही करुण हो जाता है। अन्तिम दृश्य का गीत अन्य 
गीतो से क्रितना भिन्न है, भाषा का कारुएण्य ओर धीमी-धीमी स्वर लह्री 
मानो वेदना का प्रतीक ही हों उठती है। जीवन की निराशा से जनित 
अभाव में भविष्य की आशा से विदा लेती हुईं देवसेना कहती है--- 
“हुदूय की कोसल कल्पना ? सोजा, जीवन से जिसकी संभावना 
नहीं, जिसे द्वार पर आये हुए लोटा दिश्व था डसके लिए घुकार सचाना 
क्या तेरे लिए कोई श्रच्छी बात है ” आज जीवन के भावी सुख, आशा 
ओर आकांक्षा सब से से बिंदा लेती हैँ-- 


ध्प ] [ असाद के तीन ऐतिहासिक नाक 


आह बेदना सिली विदाई 
सैने अ्रमवश जीवन संचित, 
सधुकरियों की भीख लुटाई । 
छल छल थे संध्या के श्रम॒कण, 
आँसू से गिरते थे अतिक्षण. 
सरी यात्रा पर लेती थी-- 
नीरवता अनंत अंगड़ाई। 
श्रम्ित स्व॒स्त की भछुसाया से, 
गहन विप्िन की तरु छाया से, 
पथिक डनीदी श्रुति से किसने 
यह बिहाग की ठदान उठाई । 
लगी सठृष्ण दीड थी सबकी, 
रही बचाये फिरती कबकी 
मेरी आशा शआह ? बावली, 
तूने खो ढी सकल कपम्ताई। 
चढ कर मेरे जीवन रथ पर, 
प्रलय चल रहा अपने पथ पर, 
भैने निज दुबेल पढ-बल पर, 
उससे हारी होड़ ? लगाई । 
लोटा लो यह अपनी थाती, 
सेरी करुणा हा-हा खाती, 
विश्व ? न संभलेगी यहसुझूसे, 
इससे स्तन की लाज रावाई १? 
एक निराश हृदय के जीवन पथ पर यह कैसी करुणा से भरी हुई 
यात्रा है। 
प्रथम यौवन के मद से मस्त, कल्पना के पुजारी, कवि मातृगुप्त का 
यह गीत कितना स्वभावानुकूल हुआ है | योवन की कामुकता गीत से 


असाद की नाव्य-कला ) [ ९६ 


पविकल पड़ी है--- 
संसति केचे सुन्दरतम च्ण यों ही भूल नहीं जाना 
वह डच्छ छुलता थी अपनी कह कर सन सत बहलाना । 
>०१० ० आदि आदि 


परिस्थितियों के घात-प्रतिघात ने ऐन्द्रिय-प्रेम को देश-प्रेम में मोड़ दिया 
यौवन की उच्छुड्लता देश के कतव्य में परिवर्तित हो गई। प्रथम 
अंक का कासुक कवि अपने वीर गीतो से लोगों के रक्त को खोला 
देता है-- 
चही है रक्त चही हे देश, वही साहस है वेसा ज्ञान, 
वही है शांति, वही है शक्ति, वही हम दिव्य आये संतान 
जिय तो सदा इसी के लिए, यही अभिम्नान रहे यह हप, 
मिछुावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवप । 
छुंद की द्रुतता ओर उसी की पुनरुक्ति हृदय मे एक हलचल मचा देती 
हैं। योबन की मादकता से निकला हुआ वासना का सुकुमार गीत 
कतंव्य-पथ पर इढ़ वीर का युदव-गान बन गया | 
गीत की दृष्टि से चन्द्रगुप्त ओर रकन्दगुप्त एक अमूल्य कोप 
है। लजा के भरे हुए यौवन का कितना सजीव चित्र चन्द्रगुप्त मे 
पमेलता है--- 
तुम कनक किरन के अ्रन्तराल मे 
लुक छिप कर चढते हो क्यों, 
लत सस्तक शर्त चहन करते, 
योवन के घन रख कन दरते, 
हे लाज-भरे सोदय ! 
बता दो सोन बने रहते हो क्यों, 
अधरों के सघुर कगारों से, 
कल्न कल की शुंजारों मे, 


न 


६० [ प्रसाद के दीन ऐतिदालिक नाटक 


मधु सरिता सी यह हंसी 
तरल अपनी पीते रहते हो क्यों ! 
उद्देलित थोवन के आग्रहपू्ण चित्रों मे “आज इस बोवन के साधदी 
'ज्ञ मे कोकिल बोल रहा?” वाला गीत सब से सुन्दर है| परन्तु यहा 
पर हम इन गीतो की केवल नाटकीय पाश्वमृमि से ही देखना चाहते 
हैं, स्वतन्त्र गीत के रूप में नहीं । अस्त । 
भावना और चरित्र-चित्रण से बिजया का “अरारु धूम की श्याम 
लहरियां?? गीत भी सुन्दर वना है। यौवन विलास की आकाज्षा ओर 
उसके अपरिमित काव्पतिक सुख की ओर संकेत करती हुईं विजया 
कहती है-- 

“प्रियतस, यह भरा हुआ थोवन और ग्रेंसी हृदय विज्ञास के उप- 
करणों के साथ प्रस्तुत है| उन्युक्त आकाश के नील नीरद संडल में दो 
बिजलियों के समान क्रीड़ा करते-करते हस लोग तिरोहित हो जावे ओर 
उस क्रीडा में तीव्र आलोक हो, जो हस्त लोगों के दिल्लीन हो ज्ञाने पर सी 
जगत की आँखों को थोड़े काल के लिए बंद कर रकक्‍खे । स्वर्ग की कल्पित 
अप्सराएं ओर इस लोक के अन्त पुण्य के भागी जीव भी जिस सुख को 
देखकर आश्चर्य चकित हों; वही सादक सुख, घोर आनंद, विराट विनोद, 
हम लोगों का आलिंगत करके घन्य हो जाय ।?? 

योवन के उस सादक सुख का चित्रण विजया गीत से करने 
लगती है--.. 
अगरु धृम्र की श्याज्ष लहरियों उलसी हों इन अलकों से, 


मादकता-लाली डोरे इधर फंसे हों पलकों से, 


च्याकुल बिजली-सी ठुम सचलो आदर हृदय घनमाला से, 


ओंसू वरुती से उलके हों, अधर मेस के प्याला से। 


कक कल 


४2% कक कक 


संसि उल्तक रही हों घड़कन से कुछ परिमित हो, 


असाद की नाठ्य-कला | [६१ 


घनुनय उलस रहा हो तीग्च तिरस्कार से लांद्धित हो 
यह गीनता रहे, डलमकी फिर चाहे ठुकराओं, 
निदुयता के इन चरणों से, जिसमे चुम भी सुख पाओ | 
नेपथ्य मे गाने हुए गीतों का उपयोग काय की भूमिका बनाने 
में हुआ ६ ! 
अजातशद्र के अन्तिम इश्य मे सावकाल का दृश्य और ठंडी 
ठंडी हवा का चलना नेपथ्य में गाये हुए गीत, 
चल बसन्त वाला श्रंचल से किस घातक सोरभ से मस्त, 
धानी सलयानिल की लहर; जब दिनकर होता है अस्त । 
द्वारा किया गया हे | उसी गीत के द्वारा निमित प्रष्ठ-भूमि पर बिम्ब- 
सार कहते ई---सन्ध्या का समीर ऐसा चल रहा है जैसे दिन भर का 
तपा हथा उद्विग्त ससार एक शीतल निश्वास छोड़ कर अपना प्राय 
धारण कर रहा दृ*** *' (2? 
रामा को आश्वासन देती हुई देवकी कहती है--- 
ने घत्रड़ा रास्ता | एक पिशाच नहीं नरक के असंख्य दर्दान्त 
अत और क्र पिशाचों का आस और उनकी ज्वाला दयाप्नय की कृपा- 
दृप्टि के पुक बिन्दु से शान्त होती है ।?? इसके बाद नेपथ्य मे यह गीत 
गाया जाता है | 
पालना बने प्रलय की लहरें '"* 


सर 
कि. 


कक कक कक 9 4१७9७ ++क#+ + 4७ कक ३०७ +३कनभक 


भ्र्नु का हो विश्वास सत्य तो 
सुख का केतन फहरे। 
गीत के पश्चात्‌ की घटनाओं को इसी गीत से सहारा मिला हुआ 
मालूम होता है | 
“सब जीवन बीता जाता हे धूप छाँह के खेल सदश |? गीत भी 
देवसेना के कथन से समानता रखता हुआ जीवन की ऋ्षण-मंगुरता 
का ही चित्रण करता है। चन्द्रगुत्त में “ऐेसी कड़ी रूप की ज्वाला? 


६२ ] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


नेपथ्य से गाया हुआ गीत भी राक्षस के भावानुरूप वातावरण उपस्थित 
करने के लिए. रखा गया है । 

नेपथ्य में गाये हुए गीतों के अलावा रंगसंच के गीत भी वातावरण 
प्रयुक्त करने मे सहायक हुए हैं। रात्रि का वातावरण सुवासिनी ने 
अपने “सखे, यह मससयी रजनी?” वाले गीत से उपस्थित किया है। 

र॒स-प्रसार की दृष्टि से वा दृश्य के अन्त को तीत्र बनाने के लिए 
जो गीत गाये हैं उनका नाटकीय महत्व अधिक है, उनके द्वारा दृश्य 
की घटनाओं का हृदय पर पड़ा हुआ प्रभाव तीत्रतर हो, चिरस्थायी 
हो जाता है। ऐसे गीतों से देवसेना का “आह वेदना सिल्दी विदाई”? 
गीत बहुत ही उुन्दर है | चन्द्रगुतत नावक में “ओ मेरे जीवन कीस्म्ृति, 
ओ अन्तर के आतुर अनुराग !? मालविका के जीवन-बलिदान का महत्व 
बढ़ा देता है। 


अजातशत्रु 


दार्शनिक पृष्ठमृमि 


४: ४ है साटक प्रथम बार १६२२ में प्रकाशित हुआ; 

इसलिए बहुत सम्भव हे कि प्रसाद जी ने नाठक का 
प्रारम्भ महायुद्ध के पश्चात्‌ ही किया हो । १६१४ से १६१८ तक 
जो महायुद्ध यूरोप के लिए. बवंडर होकर आया था, उसका प्रभाव 
भारतवर्ष पर भी पड़ा | १६०६ के वद्धाल-विभाजन के बाद भारतवप 
मे स्व॒राज्य और स्वदेशी का आन्दोलन चल छुका था ओर देश में 
राष्ट्रीय भावना जाश्त हो गई थी । १६१३ के लखनऊ अधिवेशन में 
मुस्लिम लीग ने भी पूर्ण स्वराज्य अपना ध्येय घोषित किया जिसके लिए: 
उसी वर्ण के कराँची अधिवेशन में काँग्रेस के सभापति ने मुस्लिम 
लीग को वधाई दी थी । महायुद्ध भारत की आपन्‍्तरिक व्यवस्था के लिए 
भी एक संघर्षप-काल था। आशा ओर निराशा के हृद्व का प्रारम्भ 
था, परन्तु महायुद्ध के वाद ही इंगलेंड से प्रधान मन्त्री, एस्क्विथ 
साहब, ने भारत के राज्यशासन को एक नवीन दृष्टि से देखने की घोषणा 


् +५०- 
६० ] [ कमाई में सीन ऐसियालिक सांद्रक 


कर दो था। इतर 2६१० मर 
भारत ऊ शासन 33 परिवतेस पर 
भारतवंध एश रूप थे मिश्जाद्रा को और हों गर्म झआार यूबन भाएद 
मे बधार्शाक्त सहयोग देने लगा। सविध्य ऊा पाशाहओं से साद्टाट 
आन्दोलन को शिशिल कर दिया। े 
महायुद्र मे सयुक्त राष्ट्र के आगमन ने अल्रष्ट्रीय दाजनेतिंद 
विचारों भ एक आन्दोलन उपस्वित कर दिया | नविध्य थी राहत 
समस्याओं को हल करने के; लिए प्रसीडट बिलसन के १७ मिमाम्त ही 
उपयुक्त समझे जाने लगे | और थे १४ सिदान्ध अन्दर्रष््रीय भावना 
को लेकर ही रखे गये थे। सकुचित राष्ट्रीय साबना का श्सर्भ कोः 
स्थान न था। प्रेसीडि: विलसन का आत्मनिणव दा निगनन्‍्त केबल 
अन्तर्राषट्रीय भावना जाश्त करने का प्रथम सोपान ही था। वह भावना 
पारस्परिक द्वेप श्रोर प्रतिहन्द्रिता के फलस्वरूप न थी। दर राष्ट्रीय 
अधिकार मानव-प्रेम ओर आपस की सद्याहुभृति पर निर्भर भा । 
इसी भावना से प्रेरित होकर ही अन्तर्राष्ट्रीय रूगड्टों को पारस्परिछझ 
समभौते, सहानुभूति ओर कत्तव्य द्वारा सुलभाने के लिए राष्ट्र-संघ 
की योजना की राई थी। इस प्रकार संसार का पूरा राजनतिक क्षेत्र 
उस काल की इस अनन्‍्तराष्ट्रीय भावना से प्रभावित था। भारतवर्ष की 
राजनीति पर भी इसका प्रभाव पड़ा और साथ ही साथ इसके साहित्य 
पर भी । 
अजातशनत्रु का कथानक इसी अन्तर्राष््रीय भावना का रुपान्तर 
मात्र है। गौतम के विश्वमैत्री के उपदेश इस काल की समस्या सुलझाने 
के उपयुक्त थे | इसलिए प्रसाद जी ने एक ओर तो इस काल की राज- 
नेतिक धाराओ से प्रभावित होकर यह विषय चुना, दूसरी ओर पथ- 
पग्रदशक की भाँति उस अनन्‍्तर्राष्रीय धारा को सफल बनाने मे स्वयं 
अपने विचार भी रखे । 


अजातशत्रू, के कथानक की कुजी गोतम की करुणा है और 


हक स्पा हैंड अल के 2.86 ही 
थेगा इलशप किया मां, हाय ७ 


अजातशत्र | [ ६५ 


इसी करुणा द्वारा ही विश्वमैत्री की स्थापना संभव हो सकती है। 
करुणा, हमारे सेवा-प्रेम और कर्तव्य की भावना व्यक्त करती है गौतम 
के ये शब्द उत्त काल की झ्रन्तर्रट्रीय भावना के कितने सुन्दर चित्र 
छ- 

“पवेश्व के कल्याण में अञ्ससर हो । असंख्य दुखी जीवों को हमारी 
सेवा की आवश्यकता दे | इस ढुःख सझुठ् से कूद पड़ो । यदि एक भी 


रख 


रोते हुए हृदय को तुमने हसा दिया, तो सहसरों स्वर्ग तुम्हारे अन्तर 
से विकसित होंगे। फिर छुसको पर-दुःख-कातरता में ही आवन्द 
सिल्लेसा | विश्वमैत्री हो जायगी- विश्व भर अपना छुट्ठम्ब दिखाई 
पड़ेगा । डठों, असंख्य आह तुम्हारे उद्योग से अद्दहास से परिणित हो 
सकती हैं ४? 

बासवी भी उस समय की अन्तर्राष्ट्रीय प्रेम-मावना का काब्पनिक 
सुख देखती है-- 

“कुटुरव के प्राश्यों से स्वेह की अचार करके मानव इतना सुखी 
होता है, यह आज ही सालूम हुआ होगा । भगवान्‌ | क्ब्रा कभी वह 
भी दिन आवेशा, जब विश्व भर मे एक झुटुम्ब स्थापित हो जावेशा ओर 
सानव सात्र स्नेह से अपनी ग्रहस्थी सस्हालेंगे :?? 
यह विश्वमैत्री मनुष्य को मलुष्य के रूप मे ही देखने से हो सकती 
है | अपने को बड़ा समककर छीटों का निरादर करने से नहीं। शक्ति- 
शाली द्वारा निर्बलों के त्राध से नही | यैतो जंगली लोगो के ऋूर विचार 
हैँ । सब जीवो को समदृष्टि से देखने में ही, सब में एक सा स्नेह रखने 
से ही यह विश्वमैत्री स्थापित हो सकती द। अजातशत, इस उच्चादश 
से नीचे गिरा था, इसीलिए. उसने ऋषर कमे किये थे---यह बर्वंडर पैदा 
कर दिया था | इसे वह स्वयं ही मानता है 

“हहीं पिता सुझे खस ही गया था। मुझे अच्छी शिक्षा नहीं मिल्ली 
थी। मिंदा था केवल जंगलीपन की स्वतंत्रता का अभिमाच । अपने क्को 
विश्वमर से स्वतंत्र जीव सम्सने का झूठा आत्म-सस्माव ॥2? 


प्र 


६६ | [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नादक 


विश्वमे 


<: 55 
ले विश्वमेत्री स्थापन क 





मल्लिका ने जो पथ अपनाया था वह केवल 
लिए ही । “मनुष्य की दया, उसका कर्त्तव्य नीच ऊँच की जाँच नहीं 
करता, राजकुमार ! तुम्हारा कलंकी जीवन भी बचाना सने अपना घस 
ससमभा और यह सेरी विश्वमेन्नी की प्रीक्षाथी 7? 

अजात जब पूछता है--“तब भी आपने इसअघमस जीवन की रक्षा 
की । ऐसी क्षमा । आश्चय ! यह देव कर्तव्य... ... 

मल्लिका--वही राजकुमार यह देंवता का नहीं--सलुप्य का कत्तेव्य 
है | उपकार, करुणा, ससवेद॒वा, ओर प्विन्नता प्तानव-हृद्य वे लिए ही 
बने 


का 


श्र 


अझजात--क्षम्ा हो देवि से जाता हूँ, अब कोशल पर आक्रमण 

नहीं करूँगा। इच्छा थी कि इसी सस्य इस दुबल राष्ट्र को हस्तगत 
कर लूँ । किन्तु नही अब कोट जाता हूँ ।?7 

विश्वमैत्री स्थापन करने के गुण देवीय गुण हैं, लेकिन वे देवताओं 


करते हैं | 
श्यासा-- जिसे काल्एसिक देवच्च कहते हें--वही तो सस्पूरों 
सनुष्यता हे । सागन्धी घिक्‍्कार हे तुस्के ! 
स्वर है नहीं दूसरा ओर । 
रूज्जन हृदय परस करठुणास्तय यही एक है छोर ॥ 
सुधा सलिल से सानस जिसका पूरित प्रेम विसोर । 
नित्य छुसुमसय कल्पद्र न्॒ की छाया हे इस ओर ॥7 
पूरा सानवी सृष्टि करुणा के लिए है। परन्तु यह  सलुष्य 
के हंदय मे अभ्यास द्वारा धीरे-धीरे विकसित की जा सकती है। कुट्म 
के छुल पर राष्ट्र का सुख निभर है, ओर राष्ट्र के सुख पर पूरे संसार 
का कुठम्ब के शान्त वातावरण से पला हुआ प्रेम राष्ट्र-येम से 


परिवातित हा सानवी प्रंस हो जाता है और यही अन्तर्राष्ट्रीय भावना 
है। वासवी इसी भावना को अजात के हृदय में जाणत करने के लि 


अजातश्त्र | [ ६७ 


खे शान्ति चाहती है | अपने शुरुतनों की ओर कर्तव्य 
मारा स्थान समस्त मानव जाति की ओर जा सकता 
स्थापन करने मे माता का ही नहीं, पूरी नारी 

कि नारी स्वभाव से ही प्रेम की प्रतिसा 
है, कब्णा की देवी हे |उसमे सहनशीलता है। जिसमे ये गुण नहीं 
उसका जीवन मी सुस्ती नही । वह बवइर होकर सारे कुटम्ब में भया- 
नक उत्माद मचाया करती है| छलना इन गुणों से शून्य थी, इसी लिये 
उसने कटम्व मे--राज्य म--यह विद्राह खड़ा किया था | मागन्धी भी 


एप 
अम्मा 
| 
+ ४॥ 
ष्प्य 
थर्ड 
बन कु 
| 
०२७: 374 


“धास्तव्ििकफ रूप के परिवर्तंत की इच्छा मुझे इतनी विपम्रता में ले 
आई । अपनी परिस्थति को संबत न रखकर व्यथ महत्व का ढोंग मेरे 
हृदय ने किया, काल्‍्यतिक सुख लिप्सा से ही पड़ी रही । डसी का यह 
परिणाम हैं । स्त्री खुलम एक स्विस्घता, सरलता की सात्रा कन्न हो जाने 
से औवन में केसे बनावटी साव था गये 2? 

पुरुषों मे इस स्नेह की कर्मी रहती है। लेकिन नारी अपने प्रभाव 
से--अपनी शिक्षा से--पुरुषों को भी बदल सकती है। क्रर पुरुष भी 
इस विण्य मे छ्धियों का शासन चाहते है । 

“क्िरायश--... . . - मलुप्य कठोर परिश्रम करके जीवन-संग्रास 
में प्रकधि प्र यथा शक्ति ऋविकार करके भी एक शासन चाहता है, जो 
उसके जीवन का परस ध्येय हैं, डसका एक शीतल विश्वाम्न है, ओर 
वह स्नेह, झेंचा करुणा की सू्ति तथा साब्त्वना क्षे अभय-चरदु हस्त 
का आश्रय, सानंव सज्नाज की सारी दृत्तियों की कु जी, विश्च-शासन की 
एकमात्र अधिकारिणी, प्रकृति रवरूपा ख्त्रियों के सदाचारपूण स्नेह का 
शासन ३ | डसे छोड़कर असमथता, दुर्बलता अ्कट करके इस दौड धूप 
में क्यों पड़ती हो देबि ! तुम्हारे राज्य की सीमा विस्तृत है और पुरुष 
की संकीण् । कठोरता का डदाहरण हे पुरुष ओर कोमलता का विश्लेषण 
है स्ली जाति | पुरुष क्र्रता है तो स्त्री करुणा है ज्ञो अन्तर्जगत्‌ का 


द्प ] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


75 है 


डच्चतम विकास है, जिसके बल पर समस्त सदाचार उहरे हुए हैं | 
इसीलिए प्रकृति ने उसे इतना सुन्दर और सनसोहना आदरण दिया 
है--रसणी का रूप |? 

मल्लिका भी यही कहती है-- 

“मख्रियों का कर्तव्य है कि पाशव वृत्तिचाले क्रर कर्मों पुरुपों को 
कोमल और करुणालुप्त करें; कठोर पीरुप के अनन्तर उन्हें जिस शिक्षा 
की आवश्यकता है--डस स्नेह, शीतलता, सहनशीलता ओर सदाचार 
का पाठ उन्हें स्थियों से ही सीखना होगा ।?? 

इसी कारण ही सम्भव हैं प्रसाद जी ने विश्वमेत्री के संस्थापक 
गौतम का भी इतना अधिक प्रभाव नाटक पर नहीं वतलाया जितना 
मल्लिका का | अ्रजात, मासन्धी, विस्डझक ससी मल्लिका से ही आदश 
अहण करते हैं। गोतम से तो केवल मागन्धी को ही ज्षमा मिलती है ! 
यद्यपि इस दशा में सी मागन्धी की ही विजय है | 

इस प्रकार प्रसाद जी की दृष्टि मे विश्वमैत्री सानवीय-प्रेम, कर्तव्य 
ओर सेवा पर अवलम्तरित है। जब॒ तक मनुष्य से इन गुणों की उद्‌- 

भावना न होगी, तव तक विश्वमेंत्री असंसव ही है | और तब तक 
संसार मे युद्ध होते ही रहेगे। अशान्ति का साम्राज्य रहेगा | मनुष्य 
प्रेस के द्वारा इस संसार को स्वग वना सकता है | प्रेम एक देवी गुण 
है, लेकिन यह गुण कोटठम्बिक शिक्षा पर निभर है। जब तक मनुष्य 
के हृदय पर करुणा का साम्राज्य न होगा, तब तक विश्वमैत्री स्वम्नवत्‌ 
ही रहेगी | 

कामायनी की दाशनिक पृष्ठभूमि इस रूप से अजातशन्नु के बहुत 
समीप है। अजातशत्र शैशवावस्था की व्याख्या थी, कामायनी उत्तर 
काल की | कामायनी मे मानव का एकमात्र लक्ष्य आनन्दसय विश्व- 
चेतना की साधना हे, इसमे इड़ा और कासायनी (अद्धा और करुणा) 
सहायक ओर प्रेरक हैं| वित्ता इनकी सहायता के मानव चिर-मद्धल 
नहीं पा सकता | समाज-निर्माण ओर लोक-कल्याण इस आनन्द तक 


अजातशत्र्‌ | [ ६६ 


पहुँचने की सीढ़ी मात्र दे | इस उन्नति मे श्रद्धा का अनिवार्य महत्व है। 
वही मानव की पथ-प्रद्शिका है | 

अजातशत्र का कथानक करुणा की इसी नीव पर ही निर्मित हुआ 
| विन्ता कदणा के ससार उदश्रान्त, जगली ओर द्रोहपूर्ण रहा करता 
| करुणा से'ही ससार मे सुख, मेंत्री ओर शान्ति है। जिस मनुष्य 
रुणा नहीं वह पशु है, क्योकि मानवी स॒ष्टि करुणा के लिए है। 
जावशतन्र के प्रथम अक से ही हम करुणा के महत्व से मित्र हो 
हैं। करूंगा और क्ररता का सघप ही नाटक का कथानक है | 
| क्ररता का अन्त हो जाता है, वही नाटक की भी समाप्ति हो जाती 
कचणाहीन छलना ओर अजात, वासवी ओर पद्मा के विरुद्द खड़े 
है| भगवान्‌ गातम वा वासवी के उपदेशों का उन पर कोई भी 
प्रभाव नहीं पडता । द्वेष, ईप्या ओर अ्भिमान से उन्‍्मत्त होकर देवदत्त 
गौतस के विरुद्ध पंड़बत्र रचता है ओर छुलना वा अजात महाराज 
विम्बसार वा ठेवी वासवी पर नियंत्रण रखते हैं । उधर कोशाम्बी भें 
“अपनी परिस्थिति को संयत न रखकर व्यर्थ महत्व का ढोंग” लेकर 
मागन्धी ने, उदयन के छुदय मं, करुणा की मूति पद्मा के विरुद्ध संदेह 
उत्पन्न कर दिया | कोशल भे भी शील ओर सदाचार से शून्य विरुद्धक 
अपने पिता प्रसेन के विरुठ्र खड़ा होता हैं। ओर प्रमेन स्वयं अपने 
अभिमान से चूर हो, सन्देह के गत से पड़कर अपने मेनापति बन्धुल 
की मृत्यु के लिए पड्यत्र रचता है। परन्तु मल्लिका की सहनशीलता, 
उसकी करुणा पहले प्रसेन को सत्पय पर लाती है, इसके पश्चात्‌ 
तो सभी करुणा का पाठ सीखकर अपनी भूल को स्वीकार करते हैं 
ओऔर नाटक की समाप्ति सुल ओर शान्ति में होती है। इस प्रकार 
अजातशत्रु का कथानक वहुत पहले ही गौतम द्वारा व्यक्त कर दिया 
गया है--- 

“लिप्ठुर आदि-सब्टि पशुओं की विजित हुई इस करुणा से 
मानव का महत्व जयती पर फेला अरुणा करुणा से ।? 


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७० ] [ प्रसाद के तीन पुतिहासिक नादक 


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प्रसाद जी ने करुणा शब्द का प्रयोग विस्तृत अथ मं क्रिया दे 
वह केवल हमारी ढया का ही बोतक नहीं है। हुमा, सहनर्शीलता, 
प्रेम, अनुराग, भक्ति, सत्कम, कतंव्य-दान आदि सभी सुण इस कडग्या 


द्वारा व्यक्त किये गये हैं| परन्तु ये सभी गुण प्रेम जनित बलिदान 


ः 


द्वारा व्यक्त हो जाते हैं | अजातशच्रु के हृढव सेसवप्रथ्म मल्लिका का 
कप <५ के (7 «" 
सहनशीलता, उसका क्षमा आदश देखकर ही परिवत्तन हो जाता हैं, 


यद्यपि इसमे सन्देह नहीं कि वह परिवर्तन अल्पकालीन ही रहता है । 
छुलना की मंत्रणा उसे फिर हिंख कमो' की ओर ले जाती है । परन्ठ 


वाजिरा का प्रेम उसके द्वप को पूण रूप से नष्ट कर डठेता है| मेंस भी 
तो करुणा का एक रूप ही है| अजात के लिए वाजिरा करुणा की 


00० प 


मूति ही है। “भरावान्‌ ने करुणा की सूरति सेरे लिये भेजी है।? 
वाजिरा भी जेवल “तुस हसे करुण इष्टि स दुखो ओर सें कृतक्नता का 
कूल तुम्हारे चरणों पर चढाकर चली जाया करू गी? यहाँ चाहती 
है | अजात कहता है “सुनता था कि प्रेस द्वोह को पराजित करता है, 
आज विश्वास सी हो राया? यह करुणा, यह प्रेम, दूसरों के लिए 
अपना वलिदान करने की क्षमता ढेता ६ | बाजिरा छारा झुक किये 
जाने पर भी अजात वन्दीणद नहीं छोड़ना चाहता | “यह नही हो सकता । 
इस उपकार के प्रतिफल से तुम्हे अपने पिता से तिरस्कार ओर भत्यन्रा 
डी मिलेगी । श॒ुसे, अब यह तुम्हारा चिरबन्दी सुक्त होने की चेप्ठा भी 
न करेण ।2 प्रेसोढय होने पर ही प्रथम वार अजात ने डिसाता के गेम 
को समझा | “कौन ? विज्नाता ? नही तुम सेरी माँ हो । सा, इतनी ढंडी 
गोद तो सेरी माँ की भी नही है। आज मैंने जतनी की शीतलता का 
अचुभव किया है।?? अजात के छृठय से प्रेम नेजो करुणा का बीज 

वो दिया शा, वह पुऋस्नेह के जल से लहइलहा उठा। कौटुम्बिक 

प्रेम ने विश्वमैत्री और कल्णा के लिए स्थान बना दिया | अजात 

को अपने श्रम का पता चल जाता है ओर पिता से क्षमा माँगते समय 

बह अपनी मूल स्वीकार करता हे, “वहीं विता ! झुझे अस हो राया 


अजातदात्र, ] [ ७३ 


था। सुझे अच्छी शिक्षा नहीं सिली थी । मिला था केवल जड्जलीपन की 
स्वतंत्रता का अभिम्नान--अपने को विश्वभर से स्वतंत्र जीव समसने 
का झूठा अभिम्ान ॥2? 

युत्र-वियोंग मे कातर हो छुलना भी प्रथम वार करुणा का अनुभव 
करती है | अजात के बन्दी होने पर उसके हृदय पर जो चोट पहुँची 
उसी से उसके छदव में करुणा का जन्म हुआ | 

“धासवी बहिन !( रोने लगती है ) सरा कुणीक मुझे दे दो । में 
भीख साँगती हूँ । में नढीं जानती थी कि निसर्य से इतनी करुणा और 
इतना स्नेह, सनन्‍्तान के लिए इस हृदय में सचित था। यदि जानती 
होती तो इस निप्ठुरता का स्वांग न करती? इसी कशूणा ने छुलना में 
नारी सुलन सरलता और शान्ति उत्पन्न कर दी | 

इस तरह समस्त गुणों की जननी एक करुणा है, जिसका जन्म 
कुठ्म्ब के शान्त वातावरण में दही होता है। नारी जाति करुणा 
की मूर्ति है, दूसरों के छढय में करुणा उत्पन्न कराने का एक मात्र 
साधन | सुखी कुठम्व मे ही करुणा विद्यामान रहती है। सचमुच वे 
चर स्पृदरणीय हैं जहाँ--- 

बच्चे बच्चों से खेले, हो स्नेह बढ़ा डनके सन में । 

कुछ लच्मी हो खुद्धित, भरा हो मंगल डनके जीवन में ॥ 

बच्धुवर्ग हों सम्मानित, हो सेवक सुखी, अणत अजुचर | 

शान्तिपुर्ण हो स्वामी का सन्‌; तो स्ट्टृहणीय न हों क्‍यों घर ॥ 

ऐसा कुटुम्ब ही विश्वमैत्री की स्थापना कर सकता है । 


कथा संगठन 

पूरा नाटक ३ अको में विसाजित है | पहले अक भे ही करुणा 
ओर अकरूणा का संघ सगध, कोशाम्बी ओर कोशल मे प्रारंभ हो 
जाता हैं | दूसरे अंक से अकरुणा की विजय होती है, परन्तु तीसरे अंक 
के प्रारंभ होते ही करुणा की विजब-पताका फहराने लगती है | सस्क्ृत 


७२ ] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


के नाव्य शाज्रो का सिद्धान्त यद्यपि प्रसाद जी ने नाटक को ४ अंकों 
मे विभक्त करने से नही अपनाया है तथापि संस्कृत की पाच सचियाँ 
नागक में भली भाँति ठेखी जा सकती हैं। 
अजातशत्र का कथानक गौतमबुद्ध के समकालीन अजातशत्र की 
जीवन की घटनाओ से लिया गया है। मगध, कौशल ओर कोशाम्बी 
की घटनाओं का समावेश भी नाटक से है, क्योंकि इन राज्यों की घट- 
नाएँ एक ओर तो अजातशत्र के जीवन से संबंध रखती हैं, दूसरे 
ऐतिहासिक दृष्टि से भी पारस्परिक संबंध होने के कारण इन राज्यों की 
घटनाओं का चित्रण आवश्यक था | इस प्रकार नाटक मे तीन राज्यों 
की घटनाएँ दिखाई गई हैं| प्रत्येक राज्य से एक ओर तो आन्‍्तरिक 
संघ्रप चला करता है--दूसरी ओर बाह्य | सगध में छुलना _ और 
अजात, वासवी और बिम्बसार के विरुद्ध खड़े होते हैं | गौतम के कहने 
से वा ग्रह-विवाद मिटाने के लिए विम्बसार अजात को राज्य दे देते 
हूँ। परन्तु भिज्लुओ का बिना दान लिये लोट जाना बिम्बसार को बुरा 
मालूम होता है | इस कारण महादेवी वासवी दहेज मे दिये हुए काशी 
के कर को अपने काम मे लाना चाहती हैं। इस काय के लिए उन्हे 
अपने भाई कोशल नरेश प्रसेनजित की सहायता लेनी पड़ती है। यही 
से बाह्य संघ सी प्रारम्भ होता हे। उधर कोशल ओर कोशाम्बी मे 
भी आन्तरिक सघष चल रहा है | प्रसेन के विरुद्ध विरुद्वक विद्रोह की 
ध्वजा फह्राता है और पद्मा के विरुद्ध मागन्धी | इन कौटुम्बिक और 
राजनेतिक सघपों के साथ ही गोतम ओर देवदच की सी घात प्रतिघात 
चल रही है। इस कारण अजातशत्र नाथ्क के कथानक का बोझ काफ़ी 
हा गया हू | मगध की कथा मुख्य कथा हैं, परन्ठु वह नाटक के २६ 
इश्या मस ८म ही समाप्त की गई है। कोशल और कोशाम्बी का 
कथानक इससे भी कम से | हाँ--कोशाम्बी की सल्लिका और वाजिरा 
का, मगध और कोशाम्वी की घटना संगठित-करने में मुख्य साग है। 
शल की घटना भी मागन्धी द्वारा एक रूप से कौशाम्बी के घटना«- 


अजातशत्र |] [ ७३६ 


प्रवाह में मिल जाती है--परन्लु यथाथ से कोशल की घटना का मुख्य 
क्थानक के विकास मे कोई महत्व नहीं | 

नाठक्रकार ने ऐतिहासिक सत्यता के कारण ही इन तीनों राज्यों 
की घटनाओं को कथानक में परिणत किया है। परन्तु उसने काय- 
सकलन की ओर ध्यान नहीं दिया [ प्रासंगिक घटनाएं दो वा तीन है 
जिससे प्रधान कथानंक पर बुरा प्रभाव पढ़ता हैं और कथावक का 
स्वाभाविक प्रगह सक जाता हैं। कथा-विकाश के लिए कम स्थान होने 
के कारण घटनाओं और चरित्रों मे एकाएक परिवतन बताया गया हें। 
क्रर अजातशत्रु मह्लिका के कुछ क्ष्णों के उपदेश से ही सधर जाता 
है| घट्ना-विकास के लिए और चरित्र-चित्रण के लिए श्रच्छा होता 
यदि नाटककार मगध को ही घटना का केन्द्र बनाता | 


चरित्र-चित्रण 

कथानक बड़े हो जाने के कारण चरित्रों की सख्या सी बढ गई 
है | मागन्धी को छोड़ कौशाम्बी के किसी पात्र का मुख्य कथानक से 
कोई सम्बन्ध नहीं। उदयन, पच्मा और वासवदता घटना-विकास 
की दृष्टि से व्यर्थ ही हैं | इन्हे निकाल ढेने से भी नाटक मे कोई हानि 
न होंगी | उदयन का सुख्य कथानक से कोई भी सम्बन्ध नहीं। पद्मा 
अवश्य ही नाटक भें महत्त्व रखती हे, परन्तु उसके न रहने पर भी नाटक 
को कोई विशेष हानि न पहँचती | क्योकि प्मा का कार्य ओर चरित्र 
उसकी माँ वासवी के समान ही है। कोशाम्बी कथानक से तथा वहाँ 
के चरित्रो की अवतारणा से मुख्य चरित्रों के विकास को स्थान नहीं 
रहा है | जो भी विकास चरित्रों से हआ है वह एकाएक ही और बाह्य 
शक्तियों द्वारा | अजातशत्रु के चरित्र करा विकास अवश्य ही क्रमशः 
हुआ है, परन्तु वह आन्तरिक इृढ् द्वारा नही | त्राह्म परिस्थितियों ने ही 
उसके चरित्र के रूप को बदला था| यही बात मागन्धी, ठेवदत्त आदि 
के विपव मे कही जा सकती है। परन्तु चरित्र-विकास मे अन्तः- 


७४ ] [ प्रसाद से सीन एसिहासिक नाटक 


विकास आवश्यक है। ब्योझि नाटक में सेव ही दोनों दे सस्टा करते 
है, झआन्तरिक झर बटिर | आर खान्तरिक पंद्र में : तर ; 
ही आवश्यकता है जितनी बहिर की। कथन की शनिदा में ऊार 
पात्रों की संख्या भे प्रसाद जी अन्तट्द्र को बूल जाते ४ | इसलिए 
चरित्रा का जो ऋलछु विकास रशआा £े बह बांध दरंद द्वार ही | 
वस्तु की जथ्लिता ऋ कारण नाटक ऋ के पागा ने अधानता झट सग 
कर ली हैँ | विरुद्रक, अजातशत्र, गौतम और सब्विदा »े खरिक पूरा 
रूप से विकसित हैं। अतएव पहिला प्रश्न जो हमार सामने झाता ८ 
यह है नाटक के साटकत्व का। फलासम वी दृष्टि मे हग्ध ह 
आये है अजातशत्र ही फल का स्वामी होता है । इससे सन्‍्देह नह 
इसके पूव मचब्लिका ओर विरुद्धक को फल स्वाम्य का अधिकार २: 
जाता है, परन्तु नाटक की समाप्रि अजात के हृदय में कणा के उद्र 
होने पर ही होती है| बीजारोपण ओर फलागम की ओर ले जानेगली 
शक्तियों मं गीौवम ओर मब्लिका को श्रेय है। क्‍योंकि उन्हीं के 
आचरण और परिश्रम से अजात वा अन्य पात्रों को सदृबत्ति मिलती 
है | गोतम और मब्लिका से, जैसा हम देख आये हैं, नाटककार ने 
मह्लिका को अधिक श्रेय दिया है। नायकत्व के नाते गौतम का यह 
श्रेय भले ही कम हो, परन्तु भिन्न-सिन्न राज्यों की घटनाशथों का सबंध 
उन्ही से है । श्रतएव इन तीन चरित्रों म नाटक का नेता कोन ह 
मल्लिका का प्रश्न यह कह कर टाला जा सकता हैं कि उसका महत्त्व 
नाटक के उत्तर भाग स है, पूव भाग मे उसके दशन भी नहोीं होंते। 
गौतम और अजातशत्र्‌ के विषय से प्रश्न गभीर अवश्य है परन्तु कठिन 
नही | शिलीमुखजी गौतम को ही नेता मानते है, उनके शब्दों मे 
खसस्त नाटक स जिस विचारधारा क्रो अचनाह हे, जा नाथक क्के ड्छ्स्य 
को निर्धारित करती है, गोौतस उसका ग्राकृत रूप है । डसकी करुणा 
“का अन्त से विजय होती है, सब कोई उसके प्रभाव को स्वीकार करते 
हैं। नाटक का अन्तिस दृश्य भी गोतस के बिना ससाप्त नहीं होता। 


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अजातरात्र | [ ७९ 


गोतमस अभय ढाते हैं तमी यवनिका पतन होता है । हस वो यही 
सममते हैं कि एक रूप से नाटक की आत्मा होने के कारण और अन्तिम 
इस्य सें केवल अभय हाथ उठाने के छिए प्रवेश करने के कारण गोतस 
ही अजातशत्र का नायक है अजातशत्र नहीं। अजातशन्र का फल- 
स्वाम्य तो दूसरे पात्रों के लिए सी साधारण है, परन्तु गौतम की जेसी 
विजय होती हे वेसी ओर किसी की नही ।?? 

घटना-संगठन की विवेचना करते हुए हम बता आये हैं कि 
अजातशत्रु का कथानक करुणा ओर अकरुणा के संघप पर ही निर्भर 
है | गौतम में यह संघप् नहीं मिलता | अजात ही इस इंद्र का पात्र है, 
इस कारण नायक वही है गोतम नहीं | 


अजातशत्र 


अजातशत्र के चरित्र म हमें अन्तद्द्व नहीं मिलता। हृदय भे 
रहने वाली क्रोमल ओर पाशविक दत्तियों का सघप नाटककार ने 
उसके चरित्र से नहीं रखा ओर इस कारण चरित्र उतना जटिल नहीं 
है, जितना स्कन्द्शयुम का या चाणक्य का। प्रारंभ मे अ्रजात को 
हम क्रर और उद्दस्ठ राजकुमार के रुप से देखते है| धीरे-धीरे 
'घटनाचक्र और अन्य महान्‌ चरित्रों के प्रभाव से उसके चरित्र में 
विकास होता हे ओर राजकुमार का क्रूर हृदय कोमल बन जाता है। 
पहले ही दृश्य से हम उसे क्रर ओर उद्दृण्ड देखते है। उसकी 
क्ररता चित्रक द्वारा मोलेमाले मृगशावकों के खेल ओर वध देखकर 
ही सन्ठ॒ुष्ठ रहना चाहती हैं | सृगशावक के न आने पर अजात की 
निव्यता लुब्धक के साथ ही क्रीड़ा करना चाहती है “हॉँ तो फिर मे 
तुम्हारी चसडी डथेड़ता हूँ, सम्ुद्ध ला तो कोडा 7? शील ओर नम्रता 
का पाठ अजात ने मानो पढ़ा ही नहीं। शुरुजनों के प्रति व्यवहार- 
कुशलता का उसे ज्ञान नहीं | बड़ी बहिन का, जो उसके यहाँ अतिथि 
होकर आई थी ओर बड़ी माँ वासवी का अ्रनादर करना उसके लिए 


हर १३ मम बा न्क नह ;४ कर, हि जे ता फटा कत री 
प्‌ | |. धूदीग या खाने पसशतार 7 सार 


छा 


३ ्ट कट कह *आ कम 
सुझ्दारे यह ने जाऊंगा उस या पा घर मे पारस] 


स्‌ 
हक . अलाक #३ अन्न .कंड 5४8 न्‍ अत न्म्जा हू के य छान 
यह पद्म से बार द्वार खपदर्त शिया चाहता हे झा सिल कान 


। 
हु] है ढ है अ न हा 
इसमे सन्‍्ठेंह सही कि ऋरता ता बट बाड़ उठा व हे खाट 
पढ़ाया हुआ ६ । बच्चे ऊे होदव भे उसी से सह “बंडीली आदीपए लगा 
+> तय 
पे 2 स्शपाः के ८ बा न क लज टू चल हटाए औानाएं 
दी ह। छुलना का मी इसमे दोप नी । उठा लिज्सूसी रखा अर्या 
खक ् रो ॥ नी पु 2 रँ 
मे ही उत्तम राज्यशासक देखता # | उसके लिए उद्दगददा ही पृधनतन 


की द्योतक ह | 

“जो राजा होगा, जिसे शासन करता होगा उस विखम्ई था पाठ 

ही पढाया जाता । राजा का परमवर्म न्याय है, व दण्ट के आधार पर 
है। क्या नुस्दे नही सालूम कि वह भी हिसामूलक है ।'! 

ग्रजात का यह कठु ओर दुबिनोत व्यवहार अपने पिता # प्रति 
भी है| गौतम के पूछने पर कि “क्ष्यों कुमार, तुस राज्य का कार्य संत्रि- 
परिपद्‌ की सहायता से चला सकोगे १? अजात यह शील ओर विनव- 
शून्य उत्तर ही देता है “क्यों नहीं, पिताजी यदि आज्ञा दु ॥7? शासन 
पा चुकने पर विस्द्वक का पक्षु लेते हुए सी वह कहता है--- 

“हस नहीं समझते कि इन छुडढों को क्या पडी है ओर इन्हे सिंहासन 
का कितना लोभ है । कया यह पुरानी ओर नियंत्रण से बंधी हुईं, संस्कार 
के कीचड में निम्नज्जित, राजतंत्र की पद्धति, नवीन उद्योग को सफल कर 
देगी ! तिल भर भी जो अपने विचारों से हटना नहीं चाहता उसे अवश्य 
नष्द हो जाना चाहिए, क्योंकि यह जयत ही गतिशील है 7? 

शासलाधिकारी होने पर वह निरंकुश ओर स्वेच्छाचारी शासक 
बन जाता है । राजा का कतंव्य प्रजा मे सुख ओर शाति बद्ाना है । 
यदि राजा इस योग्य नहीं तो उसे शासक होने का कोई अधिकार नहीं 
और इस रूप मे प्रजा से कर लेने का भी उसे अधिकार नहीं। काशी 
की प्रजा इसी आधार पर कर नहीं देना चाहती थी। 


अजातशत्नू | [ ७७ 


“हम लोग उस अत्याचारी राजा को कर न दंगे; जो अधर्म्म के 
बल से पिता के जीते सी लिंहालन छीनकर बैठ गया है । और जो पीड़ित 
प्रजा की रक्षा सी नहीं कर सकता। डनके दु्खों को नहीं सुनता 0? 
शैलेन्द्र से प्रजा को बचाना तो दूर ही रहा, अजात प्रजा के साथ 
भी क्ररता का व्यवहार ओर कठोर शासन करने की सोचने लगता है | 
“ राजकर मैं न दूँगा! यह बात जिस जिह्मा से निकली, बात के 
साथ वह भी क्यों न निकाल ली गई ? काशी का दण्डनायक कोन शूरखे 
है ? छठुमने उसी समय डसे बन्दी क्‍यों नहीं बनाया २? 
निरंकश ओर आतकवादी शासन क्र र मनुष्य द्वारा ही हो सकता 
है| नवीन रक्त राज्यश्री को सदैव तलवार के दपण मे देखना 
चाहता है | 
मल्लिका के संपर्क मे आने पर उसे प्रथम बार अलोकिक शाति 
का अनुभव होता है। 'दृवी, आप कौन हैं ? हृदय नम्न होकर आए ही 
आप अणाम करने को कुक रहा है । ऐली पिघला देने वाली वाणी मेने 
कभी नहीं सुन्रीं /? मागन्धी का ऋ्षमादान, अपने पति के हत्यारे के 
साथ दया ओर नम्नवा का व्यवहार, अजात को मंत्रमुग्ध-सा कर देता 
है। वह मल्लिका को एक देवि रूप मे देखने लगता है। 
“दब भी आपने उस अधम जीवन की रक्षा की। ऐसी क्षमा | 
अआश्चय ! यह देव कतंव्य ... ... 
मल्लिका द्वारा अ्रजात प्रथम बार ही अनुपम शाति का अनुभव 
करता है | प्रथम बार ही उसे मनुष्य-कतव्य का पाठ मिलता है और 
शासन की क्ररता में कमी आरा जाती है--झुद्ध मे भवानकता मालूम 
होने लगती हैं | 
“मां चरम हो | युद्ध से बडी सयानवता होती है | कितनी ख्याँ 
अनाथ हो जाती हैं । सेनिक जीवन का सहत्वमय चित्र न जाने किस 
घडचसंत्रकारी मस्तिष्क की भवानक कल्पता है ॥7 
इतना ही नहीं, उसे अपने पिता के प्रति कर्तव्य का भी शान होने 


ध्ड शक (2273) 
ज्प्र ] [ झसाद के सीन छत्िता खत सीटत 


ब्डेः कर दा ्ख्ल्टाा वन >क 2२25 ;?५४/ वा 
लगता है, “मे आज भी रलिंदासन से रसकर पिता छी हरेखा करने वी 


. हे क्न्ज अलन्‍कक, अन्‍्य&४+6..३. कक: कि छ ना नहा फू 
प्रस्तुत हैं ।/ मह्तिका का रूपक साम्दल था, उतका सनाद भा 
5 


नी 
4 न क्‍ििज्नानामाा ना 20... 53.0... >«] है न कलकक. ल्‍्ण्नपाजल +टिकानकत 
क्ररिक ही रहा | छुतता, वस्द्ठक झार दखदस को मसगशप उस कस 


युद्ध की और ले जाती है। वास्तव में वह क्षीयवा पररवरतन वेधम 
वाह्म शक्ति द्वागा ही हुआ था | झनी तक अवातशत्रु «: सब कमा 

 अ्नभव न था | बन्‍्दी बनने पर. वाजिय के प्रेम अखा न थी 
उसके हुदय मे करुणा उत्तन्न होती है और उसी समय मे उस अपने 
कर्तव्य का ज्ञान भी होने लगता ६। प्रेम ऊे द्वारा विद्रोए नी पराशित 
हो जाता है। कर न देनवाली प्रत्न के विद्गेट को दबाने के लिए जो 
शक्ति और बल का प्रयोग करना जानता था उसगा चिद्रोह्दी ग्रठव स्वर 
करुणा से अभिमृत हो जाता है । 

“सुलता था भेस दोह को प्राजित करता है। आज विरदास हो 
गया । तुम्हारे उदार अंस से सेरे विद्नेही हदय को दिज्ञित कर दिया ॥? 
स्वयं भंस का अनुभव होने पर वह प्रम के सह्त्य का भा पहचानने 
लगता है। दूसरों के प्रेस को भी देख सकता है | 
न विय्नाता १ नही नुन्न मेरी ज्ञां हो सां, इतनी ४ंडी गोद तो 
सेरी ज्ञां को सी नही हू। आज सेन ज़दनी की शीदलता का अजुनव किया ॥?7 
पुत्र-र्न पाने पर अजात को पितृ-स्तेह का परिचय मिलता है। दिम्दतार 
भा इस वात की ससक्तता है | क्यों अजात, पुत्र होने प्र पिता के स्वेह 


की, 0 


3९२, 
का शोरव तुस्हे विद्वित हुआ १” अजात को अपनी मूल मालूम -ोता है | 
नहा पता, खुक्ते अस हो गया था। झुस्ते छच्छी शिक्षा नही मिली 


थी। सिला था केवल जंगलीपन की स्वतंत्रता का असभिम्रान---अपमने 
को विश्वभर से स्वतन्र ज्ञीव समझने का रूडा अधिव्तर 7? 


गौतस 


के सहाृत्मा हू | कंतब्य- 


गोतम के चरिज्र से को ई विकास नहीं । वे 
महात्मा के नाते वे सभी 


॥ 
पालन और सत्करम ही उनका आदर्श हे। 


अजातशत्र ] [७६ 


ञ् 


गुग-सम्यक्ष है। ओर इस रूप में उनका चरित्र बहुत हो सरल है | 
नाटक की सारी बद्नाओं के वे ही वेस्ट हैं-- उनका प्रभाव तीनो राज्य- 
मंच्लो में ठेखा जाता है। उसका चरित्र उनके सिद्धान्तो का व्यक्ती- 
करणा है| वे क्षमा के अनुगामी टैं--करुणा के पुजारी हैं--मेम ओर 
उया को ये समार-विज्ञव में महान शक्ति समझते हैँ | “विश्व सर 
में यदि कुछ कर सकती दे तो वह करुणा है, जा प्राणिसान्न से सम 
इष्टि रुवती दे” मधुर व्यवहार से वन्य पशु भी वश मे हो जाते हैं 
पिर मनुष्य तो मनुष्य ही है। “शीतल वाणी, मधुर व्यवहार से क्या 


गे 


वन्‍्य पशु भी चर में नहीं हो जाते १” गौतम के विचारो ओर सिद्धान्तो 
का मूल सत्ञ करुणा हे जो विश्वमैत्री की प्रथम सीढ़ी है। सत्या- 
चरणा से सत्य की सर्देव ही विजय होती हे, इसी कारण ढेवदत के कपटा- 
चरण की परवाह न करते हुए वे अपना कर्तव्य करते रहते हैं | “क्या 
करुणा का आदेश कलक के डर से मल जाओगे १? “सत्य-सू्थ को 
कहीं कोई चलनी से ढक लेगा ? इस शणिक प्रवाह भें सब विलीन 
हो जायेंगे । खुके अकाय्य करने से क्या लाभ 7? शत्रुओं के प्रति उदा- 
सीन हो जाना ही शत्रुता की पराकाष्ठा है | इसा कारण गौतम ने 
देवदत के सलिन कम्मो की ओर ध्यान नहीं दिया क्‍योंकि “दूसरों के 
मल्न कर्मी! के विचारने से भी चित्त पर सलिन छात्रा पड़ती है ।?? 
भौतम के सिद्धान्त नाटक के मूल तत्व हैं, उन्हीं पर नाटक निर्मित हुआ 
है | अतएव उनके सिद्धान्तों का कुछ से कुछ रूप हमें विम्बसार, 
मब्लिका आदि चरित्रों में मी मिलता है। 


घन्‍्बसार 
जे के ॥> पी व 
माहाराज बिम्बसार कुछ दाशनिक के रूप में हमारे सामने आते 
हैं | जब भी हम उन्हें अकेला पाते हैँ तभी “जीवन की ज्षणमंगुरता? 


निंयति आदि विष्रयों पर ही सोचता डुआ्रा देखते हैं | अ्रन्तिस दृश्य में 
थे अपने जीवन पर ही दाशंचिक सिद्धान्त निर्भित करते हैं ओर दूर 


८० ] [ प्रसाद के तीन पेंतिहासिक नाटक 


३६ ४ 


अंक के छठवे दृश्य मे वे प्रकृति से मायावी बवंडर देखते हैं| वह 
दाशनिकता वास्तव में उनकी हृदयब-जनित नंहाँ हं। वह ता कवल 
गौतम के प्रभाव का परिणाम-स्वरूप ही मालूम होती है। क्योंकि जीव 


की ऋणमगुरता जानते हुए भी बिम्बसार को अपने राज्य से मोह है । 
गौतम की आजा पालन करने के लिए ही उन्होंने शायद राज्य छोड़ा 
[--क्योंकि बाद से भी राज्य की लालसा उनकी बातों से ्पका करती 
हैं | दसरे दृश्य मे सी गोतम के प्रस्ताव पर कि राज्य अजातशत्र का दे 
दिया जावे--वे कुछ आनाकानी करते है जो वास्तव में अजात की 
योग्यता ओर अयोग्यता से उतना संबंध नही रखती, जितना उनके अधि- 
कार-सुख से | “योग्यता होनी चाहिए महाराज ! यह गुठ्तर कार्य है। 
नवीन रक्त राज्यश्नी को सदेव तलवार के दपण में देखना चाहता हैं ।? 
गौतस इस उत्तर का रहस्य समझते है इसीलिए वे हँसकर कहते हैं । 
“यह बहाना तुम्हारा राज्याधिकार की आकांक्षा प्रकट कर रहा है । 
राजन ससक लो । शुह-विवाद ओर आन्तरिक रूगर्ड से विश्वात्ष लो 7 
प्रथम अक के चोथे दृश्य से वे अपने इसी राज्य-त्याग के बारे 
सोच रहे हैं ओर किसी तरह अपने मन के वहलाने का प्रयत्न कर रहे 
हूं। 'संखारी को त्याग तितिक्षा था विराग होने के लिए यह पहला ओर 
सहज साधन है| पुत्र को सम्तस्त अधिकार देकर वीतराशण हो जाने से 
असन्‍्तोण नही रह जाता, क्योंकि सनुष्य अपनी ही आत्मा का भोरा डसे 
भी समझता हे ।” वासवी के इस उत्तर ने कि “सुस्ते यह जानकर 
प्रसन्नता हुईं कि आपको अधिकार से वंचित होने का दुख नही ।?? एक 
प्रकार का व्यंग्य सा मालूम होता है क्योंकि दसरे ही क्षण त्िम्बसार 
की लालसा प्रकट होती-सी दिखती है | “दुख तो नही है | देवी ! फिर 
भी इस कुणीक के व्यवहार से अपने अधिकार का ध्यान हो जाता है । 
तुम्हे विश्वास हो यान हो, किन्तु कस्ी-क्ती घाचकों का लौट जाना 
सेरी बेदुना का कारण होता है ॥? 


अन्तिम दृश्य म सी वे कुछ-कुछ ऐसे ही विचारों से मसन हुए दिखते हैं। 


अजातशत्र ] [८5१ 


“मनुप्य-हृद्य भी एक रहरय है, एक पहेली है । जिस पर क्रोध से 
भरवहुड्भार करता हें, उसी पर स्वेह का अभिषेक करने के लिए प्रस्तुत 
रहता है | उन्माद | ओर क्या ? सनुपष्य क्या इस पागल विश्व के शासन 
से अलग होकर कभी निश्चेष्टता नहीं अहण कर सकता ? हाथ रे मानव ! 
ज्यों इतनी दुरभिल्ञापायं' बिजली की तरह तू अपने हृदय में श्रालोकित 
करता है।* हा 
महाराज विम्बसार का प्रेम रानी वासवी पर पहले ही से अधिक 
है ओर वे अधिकतर उन्हीं के कहने पर काय भी करते हैं | राज्य- 
स्थवाग की इच्छा उन्होंने वासवी की इच्छा के बाद ही प्रकट की | 
वास्तव में रानी वासवी महाराज से अधिक चतुर हैं। दूसरे अक के 
छुठव दृश्य में वासवी की बुद्धिमत्ता महाराज से अधिक मालूम होती 
है | इस कारण यह आश्वयजनक नहीं कि सहाराज भी वासवी की 
इच्छा पर ही कार्य करे । “बिम्बसार के चरित्र का प्रधान लक्षण उसकी 
हवल प्रकृति है। जिसके कारण वह शान्ति की इच्छा करता हुआ भी 
शान्ति नहीं पा सकता है ** : विम्बसार के चरित्र का परमश्रेष्ठ गौरव 
इसी वात में है कि उसकी दुर्बलताओं का व्याकरण करके वैराग्य दृत्ति 
के साथ उनका कुशल सामण्जस्य किया गया है। जहाँ उसके चरित्र 
के विश्लिष्ट गुणों की संकरता दिखाई गईं है, वहाँ लेखक की सूक्ष्म 
पर्यवेज्षण-शक्ति का अच्छा प्रकाश होता है। ऐसे स्थलों स एक स्थल 
परम मनोहर है जिसमे चित्रण की कुशलता द्वारा भावुक कवित्व की 
सुन्दर प्रतिष्ठा हुई है । अजातशन्र प्रवेश करते ही अपने पिता के पैरों 
म गिर पड़ता है | तब पिता कहता “नहीं, सगधराज, अजात- 
शनत्र को सिंहासन की सर्यादा नहीं भंग करना चाहिए। मेरे दबल चरण--- 
आह छोड दो !? व्यग्य, असिमान, वात्सल्य, व्याकुलता आदि का एक 
साथ ओर इतने थोड़े मे ऐसा संघप बड़ा उज्ज्वल हो उठा है [११ 


पे शिली मुख-- अलाद की नाव्यकला? पु० १८६8-६० 


«यु 


प्र 


छ ३४ ठें अल 
कथा संगठन 


अजातशत्र के ८ वष पश्चात्‌ स्कन्दशुम नाठक प्रकाशित हुडा । 
जनमेजय का नागयज्ञ इन दो नाटकों के बीच की कृति है| ऋतएव 
नाटककार ने नास्य रचना को इतने काल तक छोड़ा वही और उसकी 
नाख्यकला का जो विकास क्रमशः चल रहा था वह यहाँ पृण हो गया 
है। स्कन्दगुप्त प्रसाद के नाटकों से परमोत्कृष्ट रचना है । इसके पश्चात्‌ 
भी यद्यपि साटककार को चन्द्रमुत्त ओर भर वस्वामिनी नाटक ओर 
लिखने थे, परन्तु चन्द्रयुत मे जो दोप आ गये हैं उन सभी दोपो से 
स्कन्दगुस बच गया है । 

स्कन्दगुप्त आये साम्राज्य के पतन-काल का चित्र है | अंतविद्रोह 
ओर स्वाथपरता ने देश को अशक्त बना डाला था। गुप्त साम्राज्य की 
राजधानी, मगध, विल्लासिता का केन्द्र बन गई थी। पारतीक मदिरा 
और नतेकियों का मान था । कुमारगुप्त सिंहासन प्र बैठे-बैठे राजदुण्ड 
हिला देने से ही”? राज्य करना चाह रहे थे | पश्चिमी भारत पर हणों 


जज [ परे 


है झकमसग हान प्रारम्भ हो गये थे शोर चद्द्रगुत द्वारा स्थापित गुप्त 
सद्नाज्य अपने ब्रिनाश कछ्वी ओर अग्रसर हा रह्या था | भारत के उत्कप 
की बह दोसर अहर था | इस समय यदि आशा थी तो केवल स्कन्द 
स>वही सुस्त कुल का ऊगमागता नक्षत्र था। सारा भारत केवल 
डसा का आर रहा था | स्न्दगुग्त नाटक ऐसे ही पतित होते 
हुए भारत का चित्र है भिससे स्कन्द अपनी प्रतिमा से उसे उन्नति के 
पथ पर ले जाने का प्रयत्च करता ई | 
इस कारण रकन्दर्रुण्त नायक में एतिहासिक वातावरण के साथ ही 
'शाथ स्कन्दर की महानता प्रदर्शित करने के लिए समकालीन भारत का 
जीता जागता चित्र नाटककार को चित्रित करना अत्यावश्यक था | 
इतिहास ओर साहित्य दोनों के नाते भारत के इस परिवर्तंनकाल को 
जितने मो गहरे रंगों से भरा जा सके, जितना ही स्पष्ट रूप वह उसे दे 
सके उतनी ही सायककार की कला ओर कल्पना सफल समझी जावेगी। 
इसीलिए नाथ्ककार ने भारत की उस दयनीय दशा के चित्रण का 
पूर्ण ध्यान रखा है | उसी के ऊपर ही साहित्य के नाते स्कन्‍द के नाय- 
कत्व का ओर इतिहास के नाते सत्वता का बोध हो सकता है | 
स्कन्‍्दगुप्त मे पाच अंक हैं| ऐसा मालूम होता है कि प्रत्येक अक 
संस्कृत की पांच सधियों के आधार पर ही निमित किया गया है। 
नाटक का उद्देश्य रजन्द को अपनी प्रतिकूल प्रत्येक वाधाओं पर विजयी 
बनाकर चक्रवर्ती सम्राट बनाना दे ओर इसके लिए उसे हूणो का दमन 
करना, अन्तर्विद्रोह्द का अत करना और विलासिता में फसी हुई आय्य 
जाति को आदर्श पथ की ओर अग्रसर करना आवश्यक है। प्रथम 
अंक में ही बीजारोपण हो जाता है और स्फन्‍द मालव पर आक्रमण 
करने वाले शक्क ओर हणों को परास्त करता है | हूणो की यह पराजय 
मुख सन्धि ही समझना चाहिवे।| इसके अनन्तर दूसरे श्रक म॑ स्कन्द 
सम्राट बनता है और अन्तर्विद्रोह के प्रथम प्रयक्ल को असफल करता 
“स्कन्द अपने उद्देश्य की ओर ही बढ़ रहा है ओर यहाँ हमे बीज 


2 
ड्‌ 
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क््स्त 
श्य भड, 


स्य्8 ] [ ग्रसाद के सीन ऐसिदामसिक नाटक 


मशः विकास होने के लकण दिए उसे / | उस सरद दि 
अंक के कुछ पूर्व ह प्रतिमुल सम्द्रि की समर 
अंक मे परिरियतियाँ का अधित विझास हा सता ४ 

“पोससेन--आाव साम्राज्य का टद्धार हु या 7 । चहिन 
सें स्‍्लेच्छुराज ध्व॑ंस हो गया है । प्रवीर सन्नाद स्उन्‍्दगप्त ने बिय 
डपाधि चारण की है। गी, दाह्मग फोर देवताओं की घोर कोई भी पाततवा 
आंख उठाकर नहीं देखता । लोहित्य से सिन्धु तब, हिप्नालय की प॑ 
राशों से भी स्वच्छन्द्ता-पवक सामगान होने लगा।?! आद्प्रविनल 
हूणों के आतक को पूण रूप से नष्द करने के लिए, उन्दे एक बार 
भारतीय सीमा से दूर करने के लिए स्कन्द्र सभी सामन्‍्तों को आमंतित 
कर अपने उद्योग में लगा हुआ ह। प्रतिमुख संवि की परिस्थितियां 
तीसरे अंक की थि२ में और भी अधिक विकसित हो गई ६ 
चोथे अंक मे ही अवमश ने भसणनक वाघाएँ उपस्थित कर दीं | 
भटाक का पडयत्र सफल हो गया और वहां स्मन्‍दग॒प्त लो “"रम्णियों 
का रक्षक, बालकों का विश्वास, वुद्धों का आभम्रय और आश्यवित्त दी 
छुत्रच्छाया? था, वही आज “'निष्प्रभ, निस्तेज उसी के सलिन चित्र 

सा?” इधर-उधर मारा-मारा फिरता है। पणुदत जिसके लोदे से आग 

बरसती थी अब सूखी लकडियाँ वटोरकर आग सुलगाता ह | सूखी 
रोटियाँ ओर कुत्सित अन्न को अक्षय निधि के समान बदोरकर रखता 
है। सारा अंक निराशापूर्श है | स्कन्द के सम्राद्‌ होने की आशा स्वप्न- 
बत्‌ मालूम पड़ती है। पाँचवे अंक में भारत के भाग्य का उदय होता 
है | स्कन्द के बाहुबल और भटाक वा परण के प्रयत्ञों से हूणों की परा- 
जय होती है। भारत-लक्ष्मी फिर हँसती है। सम्राद स्कन्दरगुप्त 
साम्राज्य पाकर उसे अपने साई पुरशुप्त के लिए छोड़ देते हैं। अन्त- 
विद्रोह ओर हूणों के आतंक को नष्ट कर स्कन्द भव्य भारत के उन्नत 
ललाट पर प्रातः भानु की मसाँति प्रकाशमान्‌ होने लगता है। 

स्कन्दगुप्त का कथानक अजातशत्रु के कथानक की भाँति उलका 


्र 
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यु 


नहों हैं। उसमें एक ही झुख्य कथा है | प्रासंगिक घटनाओं के फेर में 

पड़कर साटक की कथावस्त को जटिल नहीं बनाया गया है | यद्यपि 

कृकार यर्टा भी मगध झीर मालव के राज्यों से सम्बन्ध रख रहा 
परन्तु मालब की सारी घटना: आधिकारिक बरतठु की ही अंग हैं 
उनका सहयोग नाटक में एकता आर पूणता स्थापित करने के लिए 
कथानक को विश्रखल बनाने के लिए नहीं। फलागम को सामने रखते 
हुए नाटककार ने प्रथम अंक के सात दृश्यों म स्कन्द की आ्रापत्तियो 
श्रौर बाधाओं का दी उल्लेख क्रिया है| पुष्वमित्रों के चुद, शक, हूण 
ओर मगोलो द्वारा पश्चिमी भारत पर आक्रमण, सौराष्ट्र को पदाक्रान्त 
कर मालव पर उनके अभियान की सूचना, मगध सम्राट को अपने 
उत्तरदायित्व की ओर उन्मुख करती है । लेकिन कुमारणुत्त की 
विनास-मात्रा की सूचना भी हमे परणंदत्त द्वारा और साम्राज्य के 
अव्यवस्थित उत्त राधिकार-नियम की सूचना चक्रपालित द्वारा मिलती 
है | आशा का तारा केवल रकनद ही दिखता है जिसकी ओर हमारी 
दृष्टि आप से आप भ्ुकने लगती है| स्कन्द जिस उत्साह से मालव- 
दूत को उत्तर देता है वह आप से आप हमारा ध्यान नायक की और 
ले जाता दे। 

ख,.. “दूत केबल सन्धि-नियम ही से हस लोग बाध्य नहीं हैं ; किन्तु 
शरणागत की रक्षा भी क्षत्रिय का धर्म है । तुम विश्वास करो । सेनापति 
शंदत्त समस्त सेना लेकर पुष्यमित्रों की गति रोके गे । अ्रकेला स्कन्दगुप्त 

माल्रव की रक्षा करने के लिए सन्नद्ध है । जाश्रो निभय निद्रा का सुख 

लो । स्कन्दगुप्त के जीते जी मालव का कुछ न बिगड़ सकेगा ॥?7 

दूसरा दृश्य राजधानी की विल्लासिता का चित्र है जहाँ धातुसेन 
का व्यग सम्राद की निरीहता और अनंतदेवी को कूद मत्रणा का 
परिचायक है | कुमारशुप्त छोटी रानी के हाथ मे कठपुतले हैं| राज्य 

का काय कुमारामात्य प्रथ्वीसेन ही किया करते है। भला सम्राट को 

मदिरा और पारसीक नर्तकियों से समय कहाँ ! इन दी दृश्यो की 


ह ] 
रस्म 


कर 


कक [ प्रसाद के तीन गेतिहाडिक नाएके 


शा 


घटनाओो को अधिकता का दशकी की रुएति पर आवक भार न पर. 
इसालए तृताय दृश्य प्रवम दा दृद्या व सतज्नप से वुनरातत (>जम्त करता 
उधर खत्त प्र 5 ॥ य्््य गतं-वां नी कै दे प्‌ ! न्यू न ने ब्द छा 7 ््य भट !] 2 


[उठ 


अपने व्यर्शत्मामिमान मर प्रप्चबुद्धि सलप्म । उचर * लिए 
कुमारगुप्त की हत्या कर पुरगुम को सिंटासन पर विद्वालन का भगनंक 
पडयत्र रच रहे हैं| मगध मे स्कन्दयुन की श्र्र्पा इत्कारियों 


के लिए अमृल्य अवसर प्रदान कर देता हं ओर अनाखपुर का 
अन्तर्विद्रोह छठे दृश्य तक पूण रुफन्न हो जाता है| छठ आर सातव 
दृश्यों मे स्कन्द हूणों पर विजय पाते हैं। दूसरा अक देखभेना ओर 
विजया की प्रण॒य-लीला का है । स्कन्द मालव का सम्राट बनना हैं 
ओर पुरणुप्त के प्रवत्तों पर पानी फेर देता है। कथानक का प्रदाह 
कहीं भी सद नहीं पड़ता । भिन्न-भिन्न खोत आकर उसकी घाराविस्तृत 
ओर गहन करते जाते हैं, उसके मार्ग मे चद्धाने लाकर बाघाथें उपस्थित 
नही करते | 

तीसरा श्रक दूसरे अंक को घटनाओं को ओर भी आगे बढ़ाता है। 
विजया ओर देवसेना के आन्तरिक द् प का परिणाम प्रपचचुद्धि के निद्त 
होने मे होता हे, जिसके फलस्वरूप “थुप्त परिषद” के प्रभावशार्ल 
व्यक्ति की मृत्यु से पडयत्रकारियों की शक्ति को काफी क्षति पहँचती है । 
फिर मी मठाक का पडयंत्र सफल हो जाता है ओर आर्य साम्राज्य का 
विध्यस चोथे अक का कलेवर बनता है | विपत्तिया ही मनुष्य को सत्पथ 
पर पेरित करती हैं, आँखा का परदा वास्तविकता देखने पर ही हट 
जाता है। भटाक मे सद्बुद्धि जागती है, वह स्कन्द का क्षमाप्रार्थी होता 
है। कनिष्क के स्तूप के पास आय साम्राज्य के सभी बिखरे रत्नों को 
परणुदत्त पहले से ही इकट्ठा कर लेता है। एक बार स्कन्द फिर अपनी 
शक्ति संकलित करता है ओर इस बार उसके स्वप्न साज्षात्‌ हो 
जाते हैं। 


नाटक का एक भी दृश्य ऐसा नही जो अपने आधिकारिक स्थान 


स्कन्द्गुप्त | स्दिय 


हटा हुआ # | अस्देक दृश्य मल ऊथानक से इस प्रकार सम्बद्ध है 
हुक हश्य की न्यूनता सारी अंखला को विच्छिन्न कर देगा | प्रत्येक 
का झेपना-अपना स्थान है झोर प्रत्येक अपने मूल क्थानक के विकास 
में इस सहवाग देता है | कुछ लोगों ने रफनदगुम के बौड़ और श्राह्मणु 
देश्व को अनावश्यक बतलाया है | लेकिन जता हम लिख आये 
कि स्कन्द के उत्लप के लिए भारत की दवनीय दशा का चित्रण 
नितान्त आवश्यक है | यह दृश्य केवल नाटककार की इतिहासनिष्ठा 
का द्ोतक नहीं और यद्य लीन परिस्थितियों के चित्रण करने 
में उसका सबसे प्रमुस्य रथन हे, लेकिन साहित्य और नाटक की दृष्टि 
हे भा उसका कम मह्च्च नहीं | दश्डवायक का यह कथन-- 
ररिक्मणु * यह समय अन्तर्विद्रोह का नहीं । देखते नहीं ह्दो 

कि साम्राज्य बिना कर्शधार कापोत होकर डगमगा रहा है और तुम्त लोग 
छुद्ध बातों के लिए पररपर रूशढ़तें हो (7 
वास्तव मे भारत की शोचर्नीव दशा का चित्रण है, जिससे स्कन्द 
का काय और भी कठिन हो जाता है। इन्हीं आन्तरिक झगड़ों के 
कारण ही तो इस आर्यावत्त भे हण प्रवेश कर सके थे | 

“इन्ही बो्ों ने गुप्त शत्र्‌ का काम किया है. कई बार के वित्ाड़ित 
हूण इन्हीं लोगों की सद्दायता से पुनः आये हैं । इन गुप्त शतन्र थं की 
हैतत्ता का उचित दणख्छ मिलना चाहिये । 

्रमण--ठीक हे । गंशा, यमुना और सरयू के तट पर गढ़े हुए य्ष- 
चुप सद्धम्रियों की छाती में ठकी हुइ कीलों की तरह अब भी खटकते हैं । 
हम लाग निस्सद्ाय थ, च्था करते ? विध्मी विदेशी का घशरण मे भी 


यदि प्राण बच जाय॑ और धर्म की रच्या हो 77 
परन्तु यह वास्तव मे सद्धम के उत्कप की चेष्टा न थी | यह थी 
पक युद्ध करने की सनोदृत्ति की श्रेरणा से उत्तजित होकर अधघर्स करना 


और घर्साचरण की हन्द्रणी बजाना।” इसी प्रेरणा के कारण ही 
हूणों से संधि की थी, श्रन्त:पुर में विद्रोह की ज्वाला 


८८ ] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


प्रज्वलित की थी और अपने घर्म को ऊपर उठाने के लिये अधर्म का 
रास्ता अपनाया था। यह उसका वास्तविक घर्मप्रेम न था, यह थी 
उसकी धर्मान्धता, “क्रर कर्स की अवतारणा से भी एक बार सद्धर्स के 
उठाने की आकांक्षा !? इसी धर्म्माचरण की शवनाग ने हँसी 
उड़ाई थी। 


“प्रपंच०--धर्म की रक्षा करने के लिए प्रत्यक उपाय से काम लेना 


होगा । 
शर्ब०--झिक्ष शिरोसणे ! वह कोन सा धर्स है, जिसकी हत्या हो 
रही है ? 


प्रपंच--यही हत्या रोकना | अहिंसा, गौतस का घर्सम है यज्ञ की 
बलियों को रोकना, करुणा ओर सहानुभूति की प्ररणा से 
कल्याण का प्रचार करना | हां, अवसर ऐसा है हम वह 
काम भी करें जिससे तुम चोक उठो । परन्तु नहीं, वह तो 
तुम्हे करता ही होगा। 
भटाक--कक्‍्या ? 
प्रपंच०--सहादेवी देवकी के कारण राजधानी मे विद्रोह की 
सम्भावना है, उन्हें संसार से हटाना होगा । 
शव ०---ढीक है, तभी आप चोकते हैं ओर तभी धर्म की रक्षा होगी, 
हत्या के द्वारा हत्या का निषेध कर लेगे--क्यों १?! 
बोद्धो का यही आचरण हूणों के षडयंत्र मे भी सहायक होता है। 
हूण का चर भठाक से कहता है “आये सहाश्रस॒ण के पास से हो 
आया हूँ। समस्त सद्धस्स के अनुयायी और संघ स्कन्दगुप्त के विरुद्ध 
हैं। याज्ञषिक क्रियाओं की प्रचुरता से डतका हृदय धर्मनाश के भय से 
घबरा डटा है ओर सब विद्रोह करने के लिए उत्सुक है ।?? 
वोद्दो और ब्राह्मणों का दृश्य इसी धर्म्मान्धता और अदूरदर्शिता 
का परिचायक है | यदि केवल प्रपंचबुद्धि और महाश्रमण से ही 
अन्तः विद्रोह की भावना होती तो स्कन्द के लिये उन्हे हटाना कठिन 


रकन्दगुप्त | [ मध् 


न होता। लेकिन पूरीबोद्द जनता के ये भाव नायक के लिए एक 
विकट समस्या उपस्थित कर देते हैं। सनातन धर्म के इस अभ्युदय- 
काल मं ब्राह्मणों की जो संकुचित मनोज्त्ति थी, वही बौद्दों की भी थी। 
साम्म्दायिक झूगड़ो से एक दूसरे को कट्ठर श्र बना ठिया था 
अतएवं यह दृश्य ऐतिहासिक सत्यता का चित्र अ्रकित करने के साथ 
ही साथ नाटक मे भी विशेष महत्व रखता है। उसे केवल कवि का 
इतिहास-प्रेम-प्रद्शन कहना भूल होगा | 

वस्तु-संकलन में पूर्ण समाहार हुआ है । घटनाओं में प्रवाह है 
लेकिन इतनी द्वतता नहीं कि पाठक की विचार शक्ति पिछडने लगे। 
आकांज्ा और जिश्नासा की प्रत्येक दृश्य मे उत्तरोच्तर बृद्धि होती जाती 
है और अन्त में उसका समाधान पाँचवे अंक मे होता है। ओत्सुक्य 
की चरम सीमा चौथे अंक में पहुँच जाती है जहाँ स्कन्द की सारी 
आशायें निर्मल हो जाती हैं। वह अकेला अपने भाग्य को कोसता 
हुआ इधर-उधर मारा-मारा फिरता है। उसके हृदय में शान्ति नहीं. 
कुटम्ब मे शान्ति नहीं, राज्य मे शान्ति नहीं। शवनाग, परणंदत, सटाक 
सभी “ह्लुट गये से, अनाथ और आश्रयहीन”? । श्राशा को किरण भी 
नहीं | पढते-पढते हृदय घबड़ा उठता है। आगे क्या होगा ? यही प्रश्न 
हमारे सामने नाचता रहता है | नाटककार धीरे-धीरे इस दयनीय दशा 
को बढाता ही गया है, अन्त में घटनाये चरमसीमा पर पहुँच कर पूर्ण 
शान्ति मे समाप्त होती हैं | 


अस्वाभाविक घटनायें ? 
कछ लोगो को भमटाक का अपार धन-राशि मिलना घटनाओं की 


समाप्ति के लिए एक असम्भवनीय कल्पना जान पढ़ेंगी | लेकिन ऐसी 
नित्य प्रति ही छोटी-छोटी घटनायें हमारे जीवन से होती रहती हैं | फिर 
भी नाटककार ने इस घटना का सकेत बहुत पूव ही बिजया के हारा 
करा दिया था। 


“मेरा रलयृह अभी बचा है, उसे सेना-सक्क्त करने के लिएु 


शपकपक- कक 
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अ्कन्‍्वसुप्त | [ ६९ 


ग्‌ स्थल मं? क्या इमारी उत्कस्ठा आर 
मे सुप्र ही पद्दी रहती है! दइुय मे काय 
व्यापार हो आविस्ता भी पर्वत ह लेकिन नाटककार 7मारा समर्थ 

| मख्य-सुख्य घटलाओं की पुनरा 
मसे दूरगरे तीसर आर चोवे दृश्यी मे कर दा है | 
8 लय शर्मोशवामिंक डेप्टि में ही. रखा ४ जि ठ है 
। ताच सेखनाये ही मिलती दें--( १) रकन्द 
विद्ारा के प्रति उदासानता (२) हू्यों। का श्रातक (३) 
कुमारसुन का शासन से हदा दंगा दिल | टसमें सन्देंह नहीं कि छोटी 


लोटी-सी घटनाये तने बरस के मृत्यु का समाचार पृष्यमित्रों का 
युद्, बत्लभी, सोरिण्ट् सर मालव पर हर आर शकों का नवीन आ्रसि- 
यान आदि अन्य बातो का क्षेग्व भी इसमे है, परन्ठ नाटक की दंष्टि 

[मतों बीरसेन का नाम ही विशेष महत्व का हू ओर न वलभी 
तौराप्ट आदि के नाम दी । हा यदि हम इतसा बाढ रख सके कि इस 
समय हण्गों ले कई देशा की पदाक्रान्त कर डाला है तो नाटककार का 


 है। पहली अर तीसरी सना ह#ं लिए तो 


श 


उद्दश्य पूणणु हा जात 
नाटककार ने चार शण्ठा का उपयोग किया है । 
खब प्रश्न यंदे 5८ सकता हैं कि जब नाटककार का इतनी घटनाओ। 


ओर चरित्रों की सूचना अवश्य के नहीं तो फिर वह इनका व्यथ मे 
क्यों समावेश करता & £ इतने घटनाओं का एक अनात प्रभाव हमारी 
मनोवत्तियों पर पहता है। बढनाणो का बाहल्व और उनकी तीत्रगति 
टमारी मानसिक अवस्था का बि्चिप्त कर देता है जितई कारण हम 
आपस आप ह्षत-विक्षुत भारत का पूर्ण खनुसव होने लगता हैँ । 


से ता बनाये रखने में भी नाटककार बहुत सफल 


२ | [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


४404 
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सन्‍्न्डे 
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हट है काका अचहाम्फ-पआर, इमनी अन्ना 
हा ह | प्रत्यक झक या पत्यक इरस हमार) जशाेहत का 5? 
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४: 3 तप जय मर है कब 

जाता ह दृश्य का सिभाग सा दशा खाधार पर हा दएई। कादर व 

द ि *० दिख अम्क का की कनरिलकट कल, 

तो भावा को चरमसीमा पर ले एफकर /कदन पटादइाए । रे मे साद्का- 
ही] मी श्र मी ा 


कार दशकों का उपर ले जाकर शस्व मे कोाए देदा दे जिसमे सीजतम 
रसोत्ादन में नाटककार सझल हो सका 2] फिर भी नाइआऋार ने 
कही भी अस्थाभाविकता नहीं आने ढी। देवकी वा मत्यु के ८दर्ने 
समीप पहेंचना हमारे कविहल ओर भावावेश बहाने ने मुख्य स्थान 
स्कन्द का ठीक समय पर परहेंचला उतना अस्यानादिक नर्रीं क्योकि 
उमक पर्व | बालन आर व लेकाकफकारागार न्प खत क्री र्ड मुस्द्ि 
की बात ओर स्कनद का मसगध परेचना 
थोरी सी अग्वासाविकता स्वन्‍द 
क्योंकि यदि रासा देवकी के प्राग तचाने में प्रदत्त नस करनी 


लगाना ओर देवकी पर आक्रमण होने के एक ज्ञण पूर्व पहुंचना केवल 
दशकों के भावों सम क्रदन मचाने को है। अच्छा तो यह होता कि 
स्कन्द के आने की सूचना नाटककार हमें वाद वाले दृश्य में देता । 
एकाधघ स्थान पर ओर भी ऐसी ही असंभवत्तीय घटनायें आ गई हैं । 
स्कंठ श्मशान म मातृशुप्त की प्रतीक्षा करता हुआ प्रपंचबुद्धि को देखता 
है। “ओह ! केसा भयानक सनुष्य है ! केसी कर आकृति है ! सूर्तिसान 
पिशाच हे---अच्छा, सातगुप्त तो असी तक नही आया। छिप कर देखे ।? 
सकन्द छपकर क्या देखना चाहता ह १ क्‍या प्रपचतुद्धि को ? लेकिन 
उसे देखने को उत्कंठा स्कन्द को प्रपंच के समीप ले जाती है। हां, उसका 
छिपना देवसेना के प्राण बचाने में सहायक अवश्य होता है | 
चरित्र-चित्रण 

पात्रो में अन्तद्वेद्र / 

कथानक की तरह स्कन्दशुत् का चरित्र-चित्रण भी दोप-रहित 
इआ है। अन्तस्तल की उन नियूढ धाराओं पर भी कवि ने प्रकाश 


स्कन्दगुप्त | [ ६३ 


डाला है जिनको मनुष्य का दम्भ सदेव छिपाने का प्रयत्न करता रहता 
हैं | मानव-चरित्र इतना सरल नहीं है कि वह अच्छे ओर बुरे के दो 
वबगा में बंठ जावे । नीचे से मनुष्य के हृदय मे कभी न कभी सद्भाव 
की प्रेरणा होती है और आदश चरित्र भी किसी न क्रिसी दुबलता का 
शिकार बना रह जाता है। यदि मानव-चरित्र इतना जटिल न होता 
तो मानव मानव न रहकर या तो हिंसक पशु होता या उसमें देवताओं 
के ही गुण रहते, परन्तु मनुष्य मनुष्य ही है । उसमे जहा देवताओ के 
शुण विद्यमान हैं वहा हिख पशुओं की क्ररता और स्वाथ परता भी 
उसमे है | इन दो असमान गुणों का भिन्न भिन्न समिश्रण से ही मानव 
चरित्र मे अनेक रूपता का सूजन होता है | बुराई और मलाई सब से 
होती है लेकिन उसकी अधिकता और न्यूनता से ही हम महापुरुषों 
आर खला की प्रतिष्ठा करते हैं। 

चरित्रों की यही समष्टि अन्तद॑ंद की योजना करती है। यह 
अन्तहृंद सदैव सब के हृदय में चला करता दै। सद्भाव मनुष्य को 
अपना सर्वस्व दुखियो की सेवा में छुटा देने को कहता है, लेकिन 
मोह उसे अपने और अपने बच्चों के लिये रखने को कहता है | मानव- 
जीवन के ही साथ अन्तद्वंद का भी विकास हुआ था | अ्रतएव मानवी 
चरित्र-चित्रण के लिये, जीवन की जटिल समस्याओ्रों को प्रकाश में 
लाने के लिये, इस अन्तह्ंद का चित्रण किसी न किसी सीमा तक आव- 
श्यक है | सच्चा नायक वही है जो अपने बहिद्ंद पर विजयी ती हो 
ही लेकिन अपनी दुर्वलताओं को भी कर्तव्य-पथ से एक किनारे हटा 
दे। अन्तद्वृंद ओर बाह्मह्वद दोनों मे विजयी होना ही इस जीवन को 
वास्तविक सफलता है। अपनी आपत्तियों के ढेर को तो पश्चु और 
नीच मनुष्य भी हटा लेते हैं। 

स्कन्दरुसत के चरित्रों में यही एक सत्र से बड़ी महानता है। सभी के 
हृदयों मे लेखक ने कुछ न झुछ गुण-दोषारोपण किया है ओर इन्हीं के 
सिन्न-भिन्न योग के कारण ही हमे पुरगुप्त और स्कन्दगुस्, भटक और 


&४ ] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


2 


हक] 
जल 


परण, बिजया और देवसेना तथा देवकी आर अनन्तदेवी के द शन हो 
है| जयमाला मालव की रानी न रहकर स्वग की देवी यदि 
अपना राज्य स्कंद को अपर करने से आनाकानी ने करता |; 
तक तो अपने स्वाथ के लिये लइते सुने गये --किर तो जयमाला 
इस संसार की एक साधारण रानी थी। सारा साटक ही समासि के 
आ जाता यदि स्कद सचमुच ही साधारण संनिक ही तना रहना चाहता 
ओर शायद वह सारत का सम्राद भी कभी नहों सकता यदि नीच 
भठाक की सदूपेरणा उसे सत्पथ पर न लाती | 


लटका 
थ्य् पे 


चरित्रो मे विकास 


संसार का धटनाचक्र मनुष्य की इच्छाश्रों से स्वतंत्र चलता रहता 
हैँ | मनुष्य उसे अपने अनुकूल बनाने का प्रयक्ष करता है लेकिन मानों 
वह नियति का खिलौना ही है, जो उसे नित्यप्रति खेल खिलाती है। उत्तका 
ओर नियति का सदेव ही यह घात-प्रतिघात चला करता है । कभी नियति 
उसे किसी ऊंचे सिद्दासन पर बेठाती हैँ तों कभी उसे किसी माग से 
भीख मागते हुए फिराती है | स्कन्द सी अपने साग्य के साथ खेला था 
चेतना कहती हैं कितू राजा हे और उत्तर मे जैसे कोई कहता है 
कि तू खिलौना है. ॥?? स्कन्द ही क्यों ? सटाकं, ठेवसेना; विजया इसी 
प्रकृति के खिलोने मात्र ही रहे हैं | उसका वाह्मद्वंद घटनाचक्र के साथ 
चलता रहा और इस घात-प्रतिघात का प्रभाव उनके चरित्रो पर पड़ता 
रहा । यही वाह्मदंद् ही मानव-चरित्र से परिवतन करता है, जिसे हम 
नावक में चरित्र का विकास कहते है| स्वाभाविक ओर मनोवैज्ञानिक 
चरित्र-चित्रण का यह एक आवश्यक अंग है | स्कनन्‍्द के सभी चरित्रो 
से हम यह विकास पाते हैं। अपने बीजरूप से घीरे-घीरे विकसित हो 
नाटक की समाप्ति तक चरित्र अपने वास्तविक रूप मे दिखने लगते है | 
अन्तद्ृद्व ओर चरिजत्रों के विकास के कारण ही स्कन्द के चरित्र 
वहुत ही स्वाभाविक हुए हैं | इसमे सन्देह नहीं कि नाक मे चरित्रो 


स्कन्दगुप्त | [ ६५ 


की संख्या अ्रधिक है लेकिन नाठक विस्तृत होने के कारण प्रत्येक मुख्य 
चरित्र के आन्तरिक दृंद् ओर विकास की ओर नाटककार का ध्यान 
जाता रहा है | नाटक के सुख्य चरित्रों तक ही नाटककार का वह 
मनोवैज्ञानिक चित्रण सीमित रहा हो, यह बात भी नहीं है । उदाहरण 
के लिये हूणो के आक्रमणों से ढुखी स्‍्त्री-पुसुपो को यह दयनीय दशा 
देखिये | दुष्ट सेनापति की आजा से बालकों को जलाया जानेवाला 

है। स्त्रियों के कोमल शरीरों पर जलते हुए लोहो के दाग लगने वाले 
है| भला ऐसी दारुण विपत्ति मे भगवान के सिवाय और कौन सहायक 
हो सकता है १ भगवान्‌ तक अपनी करुण घुकार पहुँचाने के लिये, 

उनके हृदय में पीड़ित नागरिकों के लिये दया उत्पन्न करने के लिये 

एक दुखभरी आवाज ही काम मे आ सकती है। नागरिकों के हृदय 

का दुख उछल पड़ता है, उनके हृदय की करुण भावना साकार हो, 
व्यक्त होने के लिये स्वाभाविक रूप से कविता का ही आश्रय लेगी। 

गद्य में तो उसकी तीत्रता ही विलीन हो जावेगी, अत] 


स्तियॉ--- 
हे नाथ 
हमारे निर्बलों के बल कहां हो 
हमारे दीन के सम्बल कहां हो 
पुरुष--- 
नहीं हो नाम ही बस नाम है क्या 
सुना केवल यहां हो या वहां हो 
ख़तिर्याँ--. 


पुकारा जब किसी ने तब सुना थी 

भला विश्वास यह हसको कहाँ ह्दो 
प्रार्थना स्वाभाविक ही है, परन्ठ स्त्री-पुरुषों की प्राथनाओं में मिन्नता 
है| स्त्रियों की 'निबंलता आश्रय अहण करने के लिये ही है, लेजिन 
पुरुषों को यह दयनीयता अपेस्चित नहीं | वह संसार का सब से श्रेष्ठ 


४६ | [ असाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


प्राणी ही है। ससार से अपने को सब से अधिक प्रधावशालीसम मने 
का उसे अम्यास सा हो गया है, अतएव रित्रयों ने पुकारा-- 

हमारे निरबंसलों के बल कहां हो 

हसारे दीन के सम्बल कहां हो 
लेकिन जब सगवान्‌ न आये तो पुरुष भगवान्‌ के अस्तित्व पर ही 
हस्तक्षेप करने लगे--- 

नही हो नाम ही बस नाम है क्‍या 

सुन्रा केवल यहा हो था वहां हो 
कितनी छोटी सी बात है, लेकिन मनोविज्ञान ने स्त्रियों से ऐसी बाते 
कराने का साहस न किया होता | सगवान्‌ की प्राथना प्राथना ही है| 
लेकिन प्राथना हृदय की उस भावुकता की अभिव्यक्ति है जो स्वय॑ 
मनुष्य के जीवन पर--उसके चरित्र पर अवलम्बित रहती है। 


स्कन्दगुप्त 
लालसा और कत्तेव्य 27 । »/ 


स्कन्द नाटक का नायक है | मगध के राज्य का उत्तराधिकारी 
भी वहीं है | लेकिन अव्यवस्थित उत्तराधिकार-नियम उसकी भविष्य 
की आशाओं पर पानी फेर दे रहा है | इसका एकमान्न उद्देश्य 
भारतवर्ष को फिर से एक साम्राज्य मे सम्बद्ध करना है। उसे हणो 
के आक्रमणों से सुरक्षित करना है। वह साम्राज्य का एक सेनिक 
रहना चाहता है। लेकिन--१ लेकिन सम्राठ के रूप से | साधारण 
सनिक के रूप में नही | सम्राट बनने का प्रलोभन उसके हृदय मे है, 
परन्तु अपनी इच्छा-पूर्ति के लिये वह विद्रोह नहीं करना चाहता। 
उसकी सदबत्ति उसे सुसाग की ओर ही ले जाना चाहती है, पर 
ह॒ुदय को आकाज्षा दबाने पर भी नहीं दबती |वह अधिकार-सुख 
को मादक और सारहीन समभकर अपने हृदय को उससे विलग करने 
का अयत्त करता है। लेकिन “डँह हम तो साम्राज्य के एक सेनिक हैं? 


स्कन्दगुप्त ] [ ६७ 


से उसके हुदय का वैराग्य से मालूम होंकर उस प्रवृत्ति को दालने का 
प्रयत्त ही दिखता है । खुबरात् का अकेले टहलकर केबल इस वात को 
सोचना कि “अविकार-सुख क्रितना सादक श्रौर सारहीन है। अपने की 
वियामक और कर्ता ससझने की बलवती स्टदा डससे बेगार कराती 
है! उस्सवों में परिचारक और श्रस्त्रों में ढाल से भी अधिकार-लोछ॒ुप 
रिक्त भावों का ही द्योतक हे । यदि 
युवराज वाह्तव में इतने उदासीन ये तो उर््ह अधिकार का | 8 
उठाना द्वी न था। पुरसुम के लिए सत्रणा चल रही थी | खुवराज के 
था | अन्तविद्रोह् का कारण भी 


मनुष्य क्या अच्छे हैं १? उसक छान्त 


लिए नो यह साने में सुगंध का मौक 
शो # पे न्द *-] +-- 

न रहता, अधिकार सुख की मादकता भी न रहती शोर स्कन्द सनक 

के ल्‍प में अधिक काम कर सकता | परन्‍्ठ रक्न्द एक दुबंल मनुष्य हो 


तो है। अधिकार, मस॒प्व की सवसे प्रिय वस्ठे; तह कैसे ठुकरा सकता 
धत नियम ने स्कन्द के ढृदय 


था | अतएव उत्तराधिकार के ध्व्यवरि 
में आँची उठा दी है । यह भवानक तृफान भले ही न हो, लेकिन वह 
इनना शान्त समीरण भी नहीं कि उसका प्रभाव प्रकृति पर न पढ़े । यह 
सच है कि स्कन्द पुरगुम के समान नीच प्रकृति का पुरुष न होता, वह 
शायद साम्राव्य के विरूद्र अअन्तर्विद्रोह्द भी न करता; परन्ठ यह सोचना 
कि उसके हृदय में अमिलाषा की कोई वन्या नहीं एक भूल कल्पना 
ही होगी। अस्त । 
स्कन्द इस आँधी को हटा देना चाहता है। लेकिन हटाये केसे १ 
चंह तो हृदय की गूढ अभिलापा है। वैराग्य से हो सकता है | 
स्कन्द इसी उद्देश्य से प्रवत्त करता है, “अधिकार-सुख कितना मादक 
और सारहीन है... .- » इसमे सन्देह नहीं कि स्कन्दगुप्त अपने भावों 
को इतनी अच्छी तरह से दबाये हु है कि उन्हें कोई जान भी नहीं 
सकता | चूद्ध पर्णद्च सचमुच में स्कन्द को अपने अधिकारों के प्रति 
डदासीन समभता है| वह कहता है 'सन्देंह दो बातों से है, सन्नाद 
......अपने अधिकारों के प्रति आपकी उदांसीनता और अयोध्या में 


छ 


श्र ] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


लित्य नये-तये परिवर्तत |? स्कन्‍्द पहली बात को टाल देता हैं ओर 
चट दूसरी बात पर आ जाता है। वह पूछता हे--“क्या अयोध्या का 
कोई नया सप्माचार है १? है 
वृद्ध पणंदत से भले ही यह बात छिपी हो लेकिन उसके साथ रहने 
वाला, उसका समवयस्क चक्रपालित उसकी उदासीनता का कारण 
जानता है| पण के पूछने पर वह कितना स्पष्ट उत्तर देता है। 
“पर्ण--तुम्हारे युवराज अपने अधिकारों के प्रति डदासीन हैं । वे 
पूछते है अधिकार किस लिए ?? 
चक्र--तात, इस किस लिए का अथ से समसता हूँ । 
पर्ण--क्या ? 
चक्र--गुप्त-कुल का अव्यवस्थित उत्तराधिकार नियम ॥?? 
स्कन्द की भोौहे टेढ़ी पड़ जाती हैं| उसके हृदय का भाव चक्र 
समझ कर व्यक्त करे, उसकी छिपी हुईं आकाँक्षाओं का अवशुर्ठन 
वह उठाये, यह उसे पसन्द नहीं | वह पुछता है-- 
“चक्र, सावधान ! तुम्हारे इस अनुसान का कुछ आधार भी हे ??? 
परन्तु चक्र को अपने अनुमान पर पुण विश्वास है | वह कहता है-- 
“यह अज्ञुमान नहीं है, यह प्रत्यत्त सिद्ध है । 
मालव युद्ध के पश्चात्‌ जब हम स्कन्द को चक्रपालित के साथ 
पाते हैं तो वह यही कहते हुए आता है, “चक्रपालित, संसार में जो सब 
से महान्‌ है, वह क्या है ? त्याग । त्याग का ही दूसरा नास महत्त्व है । 
प्राणों का मोह त्याग करना वीरता का रहस्य है? स्कन्द इसी त्याग 
की ओर बढ़ना चाह्ता है। अपने हृदय की उस मूक अभिलाषा को 
वह अब त्याग के नाम से बहला देना चाहता है। जहाँ पहले वह 
अधिकार नियम को तुच्छ और सारहीन बतलाता था--उससे विरक्त 
होने का सयत्न करता था--वहाँ उसी विचार के दूसरे पहलू से वह त्याग 
जन पता है | सचमुच में अपना सव कुछ दूसरे के लिए त्याग 
देना ससार मे सब से महान्‌ है। स्कन्द उसी आदर्श की ओर जाकर 


स्कन्दयुप्त | [ && 


अपनी अभिलापाग की भुलावा देना चाहता है। यह त्याग का 
आदर्श शायद वह तहुन दिनो से साच रहा था। इस कारण प्रत्येक 
त्याग को वह इसी झआादर्श क्री ओर भुकाना चाहता है। प्राणो का 
मोह त्याग करता ही बह वीरता का रहरव समभता है। परत्तु क्या 
बास्तव में वीरता की यही परिसापा है? ढुःखी गरीब आर पापी 
आदमी भी मृत्यु को अपना लेना चाहते हैं | स्कन्द जैसे बीर से वीरता की 
इतनी उथली परिसापा हम स्वीकार नहीं कर सकते | इसका तो केवल 
यही एक उपयुक्त कारण हो सकता दे कि स्कन्द अपनी अमभिलापाओों 
को भुलावा देना चाहता है। चक्रपालित के स्कन्द से यह पूछने 
पर कि “सिंहासन कंब्र तक सूना रहेगा? स्कन्द अपने उच्चादर्शों 
को रखते हुए कहता है, “नहीं चक्र । अश्वसेध पराक्रम स्वर्गीय सन्नाट 
कुमारमुप्त का आसन मेरे योग्य नहीं है। मे रूगडा करना नहीं 
चाहता । सुर सिंदासन नहीं चाहिए । एुरगुप्त को रहने दो । मेरा अकेला 
जीवन है |? परन्तु क्या वास्तव में स्कन्द को अकेला जीवन पसन्द है 
यदि ऐसा होता तो अन्तर्विद्वोहद ढी क्यों होता। भटठाक का प्रण भी 
पूरा हो जाता और अननन्‍्तदेवी की अमिलापा भी सस्त॒ष्ट हो जाती। 
क्यों स्कन्द यह बखेड़ा खड़ा कर ढेता है! उसे किसी ने राज्य अहण 
करने के लिए. बाध्य नहीं किया वह क्यों पुरगुप्त को ही सम्राद नही 
हने देता १ आया हुआ अधिकार लौटठाना आदश में सरल किन्तु 
प्रत्यक्ष में बहुत कठिन है| स्कन्द जिस आादश को अपनाने के प्रयत्न 
में लगा रहा वह अभी तक पा नहीं सका। 
वन्धुवर्मा की इस उक्ति से कि “डन्होंने पुरणुप्त को इस जघन्य 
अपराध प्र भी सरध का शासक बना दिया है; वह तो सिंहाखन भी 


नहीं लेना चाहते? स्कन्‍्द के महान, आदर्श का ह्वी पता चलता है। 
सचमुच मे पुरणुत के साथ स्कनन्‍द ने दया का व्यवहार किया परन्ठ 
पुरगुप्त को सम्राव्ही क्‍योंन रहने दिया बन्धुवर्मा के इस कथन से 
कि “वह तो सिहासन भी नहीं लेना चाहते” यही पता चलता है कि 


३०० ] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


कम से कम परिस्थितियों के विचार स उन्होंने साम्राज्य का यह बोक 
अपने ऊपर ले लिया है लेकिन वे परिस्थितियाँ कौन-सी मे ! कम से 


! 
कम नाट्ककार ने यह कहीं भी नहीं बताया । अ्रतएव स्कन्ढ का यह 
कथन कि “अधिकार सुख कितना सादक ओर सारहीन हें? स्कन्द के 
अधिकारों के प्रति उदासीनता का परिचायक्त नहीं। अधिकार- 
किसी न किसी अंश में उनके छद॒य मे विद्यमान था । ओर इसी कारण 
ही उन्होंने मालव का सम्राट होना भी अंगीकार किया था | 

राजसिंहासन पर बैठने के पश्चात्‌ स्कन्‍्द फिर इसी विचार से लग 
जाता है | श्मशान से घूमते हुए वह कहता है, “इस साम्राज्य का बोस 
किसके लिए ? हृदय में अशान्ति, राज्य से आशान्ति, परिवार में 
अशान्ति ? केवल सेरे अस्तित्व से । सालूस होता है. कि सवके--विश्व 
भर की--शान्ति रजनी से मैं ही घृसकेतु हूँ, यदि सें न होता तो यह 
संखार अपनी स्वाभाविक गति से, आनंद से चला करता। परन्तु मेरा तो 
निज का कोई स्वाथ नही, हृदय के एक-एक कोने को छान डाला कहीं 
सी काप्तना की वन्‍्या वहीं। बलवती आशा की आँधी नहीं चल रही 
है। केवल शुप्त सन्नाठ के वंशधर होने की दयनीय दशा ने सुके इस 
रहस्यपूर्स क्रिया कलाप सें संलरत रखा है। कोई भी मेरे अन्तःकरण का 
आलिशन करके न रो सकता है और न हँस ही सकता है। तब भी 
विजया..... ? ओह डसे स्मरण करके क्या होगा ॥?? 

५ ५ की यह स्वगत पिछले स्वगतों के ही अनुकूल है, अतएव 
यह कुछ विशेष लिखने की आवश्यकता नही | हाँ, वैराग्य उत्पन्न होने 
में एक कारण विजया का प्रेम भी है और इस कारण ठुकराये हुए. 
भें म के प्रभाव से हृदय से अशान्ति हो तो कोई आश्चर्य की वात नहीं 
हृदय को आशाओं पर पानी फिरते ही--कल्यना के स्वप्नों के सग्न होने 
पर--यदि एक सम्राट साम्राज्य को बोर मानने लगे तो यह साम्राज्य 
के प्रति उदासीनता नही | 


पाचवे अंक सें कोमार्य त्रत घारण करने के पश्चात्‌ स्क्षन्द्‌ 


“पे, 
पं 


स्क्रन्‍दगुस | [१०१ 


पुरगुप को युवराज ही घोषित करता है, उस समय भी स्कनद साम्राज्य 
का भार पुरगुप्त को देकर सन्‍्यास का मार्ग नहीं लेता | अतएव स्कन्द- 
गुप्त के हृदय मे सम्राट बनने की अमिलापा थी अवश्य, परन्तु वह 
प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण उन मंभझटों से विल्षण रहने का ही 
प्रयक्ष करता है| कभी अधिकार सुख को मादक और सारहीन बताकर 
तो कभी त्याग को संसार मे सबसे अधिक महत्व देकर | तब क्‍या स्कन्द 
पाखण्डी था ! क्या वह अपने हृदय में दूसरे भाव रखकर दूसरों को 
धोखा देने की चेष्टा करता था ? नहीं | अन्तविद्रोह के विरुद्ध होने के 
कारण, सिहासन के लिए अपनी इच्छा प्रगट कर वह अपने साथियों 
को विद्रोह के लिए नहीं भड़काना चाहता । इसी लिए वह सभी को 
अपनी उदासीनता से परिचित करा ठढेना चाहता है | इस मनोजृत्ति 
को वह अपने छद॒य तक से निकाल देने का प्रयत्न करता है | इसी 
कारण ही वह चक्रपालित पर क्रोधित होता है| इसी कारण ही जब 
चक्र पूछुता है कि “अयोध्या चलने का आ्रापने कौन-सा समय निश्चित 
किया है ? राजसिंहासन कब तक सूना रहेगा ? पुष्यमित्रों और श्कों के 
युद्ध समाप्त हो छुके दे ।?? तब स्कन्द कहता है-- 

“तुम्त मुझे उत्तेजित कर रहे हो ॥? 

“हो युवराज, सुझे यह अधिकार है ॥?? 

“नही चक्र | अश्वमेध पराक्रम स्वर्गीय सम्राट कुमारणशुघत का आसन 
मेरे थोग्य नही है । मे कगढा करना नहीं चाहता । मुझ्ते सिंहासन न 
चाहिए । पुरगुछ्त को रहने दो । मेरा अकेला जीवन है ॥? 

राष्ट्र की समस्‍या इस समय बड़ी विकट है। वन्धुवर्मा के ये भाव 
स्कन्द के भावों को अधिक व्यक्त कर रहे हैं “आर्य्यावते पर विपत्ति के 
प्रलय की मेघमाला धघिर रही है। आर्य्य स्गश्नाज्य के अन्तर्विरोध और 
दुर्वलता को आक्रमणकारी भली-भॉँति ज्ञान गये हैं | शीघ्र ही देश- 
च्यापी युद्ध की सम्भावना है ।? इसीलिए साम्राज्य की सुव्यवस्था के 
लिए अआ्रर्थावर्त की स्वाधीनता के लिए वह अन्तर्विरोध की अग्नि नहीं 


१०२ ] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


भड़काना चाहता | इसीलिए वह अपने अधिकारों के प्रति उदासीन 
है । इसी अन्तविरोध को बचाने के लिए ही तो देशभक्त प्रृश्वीसेन 
महाप्रतिहार ने अपना वलिदान दिया था | 

“महाग्रतिहार | सावधान * क्‍या करते हो ? यह अन्तर्विद्वोह का 
समय नहीं है । पश्चिम और उत्तर से काली घटाएँ उमड़ रही हैं, यह 


समय बलनाश करने का नही हे..... ... परन्तु भटाक जिस नुम खेल 
समझकर हाथ सें ले रह हो डस काल झुजंगी राष्ट्रनीति की प्राण देकर 


के के 


भी रक्षा करता । एक नहीं, सो स्कन्दगुप्त उस पर न्यौछावर हैं ।? 

मराघ का पड़यंत्र परिपक्व न होने पाया था कि अचानक स्कन्द 
वहाँ पहुँच गया | पदढ्यत्र द्ूट गया, भठाक ओर अनन्तव्ेवी की इच्छा 
पूण न हो पाई । वे, सेना द्वारा स्कन्द का सामना न कर सके अतएव 
स्कन्द के सम्राय होने से कुछ भी रक्तपात का स्थान न रह गया | 
स्कन्द ने इसी लिए अपने को सम्राट घोषित कर दिया | बन्धुवर्मा का 
राज्य भी वह अपने साम्राज्य मे मिला लेता है क्योंकि वह तो पूरे 
आर्यावर्त का सम्राट होना चाहता था | स्कन्ढ का यह कथन कि 
“मैं केवल एक सैनिक बनकर रह सह गा सपन्नाट नहीं? केवल शिष्टाचार 
मात्र ही है। 
देशग्रेम और विवेक 

स्कन्द की अन्तर्विद्रोह से यह घृणा उसके देश-प्रेम का 
परिचायक भी है और स्कन्द का केवल साम्राज्य का एक सैनिक होने 
को इच्छा करना उस प्रेम का प्रत्यक्ष प्रमाण है। देश की चिन्ता उसके 
जीवन की सबसे वडी चिन्ता है। आर्थावर्त की दयनीय दशा उसके 
हृदय को व्यथित किये है| लेकिन वह साधारण सैनिक ही नहीं | 
आह्मत्याग, उदारता ओर बलिदान की वह साज्षात्‌ मूति ही है। 
तत्यानःठ हॉना क्रय होने की प्रथम सीढ़ी है। केवल संधि नियम 
ही नहीं शरणागत्‌ रक्षा भी क्षत्रिय का घर है | अतएव यदि समस्या 
कठिन भी है तो क्या ? “ अकेला स्कन्दयुघ्त सालव की रक्षा करने के 





स्कन्दग्रुप्त ] [ १०३ 


लिए सन्नद्ध है। जाओ निर्भय-निद्रा का सुख लो । रकन्दगुस के जीते 
जी सालव का कुठु न बिगद सकेगा |”? सचसुत्र में “आय साजन्नाज्प 
के भावी शासक के उपयुक्त ही यह बात है?? अन्यथा सम्राठ का कार्य 
ही क्या--यदि वह भीपण परिस्थितियों से पढ़कर केवल अपना ही 
भला देखे ओर अपने अधीनस्थ राजाशों की समस्या सुलभाने मे 
असमथ रहे | स्कन्ठगुप्त की यह उक्ति सचमुच वीरोचित ही है। ऐसे 
शासक को पाकर सचमुच में ही गुप्त साम्राज्य की लक्ष्मी प्रसन्न होगी | 
अपने वचन के समान ही वह कर्म करने से भी साहसिक ओर बीर 
है। थोड़ी-सी सेना को लेकर हूणो और शको की विजय को पराजय मे 
'परिणत करना उसी का ही काम है। कूट मंत्रणाओं ओर राजनैतिक 
कुचक्रो से भी स्कन्दगुप्त खूब परिचित है । प्रत्येक परिस्थिति का चैर्य 
ओर विवेक से सामना करना ही नायक का काम है। चन्द्रगुप्त 
के समान वह थोड़ी-सी कठिनाइयों से घबड़ा नहीं जाता | गान्घार की 
घाटी ओर कुभा रणक्षेत्र में उसकी कायपढठुता देखते ही बनती है। 
चक्रपालित और स्कन्दगुप्त समवयस्क होते हुए भी अपने चरित्रों में 
कितने भिन्न हें ! चक्रपालित में यौवन का जोश है। विवेक नहीं, 
वह परिस्थितियों से पूर्ण परिचित भी नहीं हो सकता है। यदि 
स्कन्दगुप्त के स्थान पर कही चक्रपालित होता तो शायद कुभा रणत्षेत्र 
में युद्व होने के पूर्व ही भटाक विद्रोही बन वैठता । लेकिन स्कन्दगुप्त 
परिध्थितियों को देखकर काय करता है ओर इसी कारण वह किसी सीमा 
तक सफल हो सका है | “में मटाक पर विश्वास तो करता ही नहीं परन्तु डस 
पर प्रगट रूप से अविश्वास करने का भी सम्मय न रहा ।? मे “'नहीं सन्नाट 
डसे बन्दी कीजिये? की अपेज्ञा कितनी विवेकशीलता है | स्कन्ठ और 
भठाक का वार्तालाप भी सम्राट ओर उसके सेनापति का ही वार्तालाप 
है | स्कन्द अपने अधिकारों और स्थिति का पूर्ण ध्यान रखकर ही 
सम्रायोचित वार्तालाप करता है | भटाक की अवहेलना करने पर भी--- 
*'तुस अभी बालक हो” वह उसे क्षमा ही कर देना चाहता है। लेकिन 


१०४ ] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


डक जलन, 


चक्र ? उसमे इतना विवेक कहाँ ? भठाक यद्यपि स्कन्द ज्षी बालक ही 
समसता है, लेकिन उसके वाकू-चाठव्य के सामने उसे भी नत मच्तक 
हो जाना पढ़ता है। भमठाक की निकलती हुई तलगर स्थान मे ही रह 
जाती है। भठ्याई के प्रस्थान के पश्चात्‌ उसकी ऋाब-प्रणाली उल्की 
दूरदर्शिता का बहुत सुन्दर परिचय देती है | 
प्रेम 

स्कन्द का प्रेम सी उसके स्वभावानुकूल गंभीर है। उसने उच्छुट्ठ 
लता या चचलता नहीं। मालव युद्ध में विजया ने मिलते ही उसके 
वीर हृदय स उस सुन्ठरी के लिए प्रेमोदवय हो गया था, लेकिन भायी 
सम्राट के लिए प्रेम के भाव अपने हृदय म दी पु 
देता है--(विशेषकर जठ देश की परिस्थिति &गार के लिए अनुकुल 
न हो ) | व्जिया--उसकी प्रेयसी भी वह न जान पाई---खैर उसकी 
अज्ञानता ज्षम्ब भी है परन्तु देवसेना ? वह तो सन्देह के रत से ही 
रही आई | सम्राटासिपेक के समय विज्या जब भठ्यक को वरण॒ु ऋर 
चुकी तो स्कन्द के हृदय से एक हलचल मच गई--वह अशान्‍्त हो 
गया--लेकिन उसकी गभीरता ने उसे मौन ही रखा। स्कंद की 
प्रमवाचित अशाति के परिचायक के साथ ही साथ उसकी गंसीरता 
ओर सम्राठोचित भाव-प्रद शंव का यह दृश्य वड़ा सुन्द 

स्कल्द---ओर तुस विजया ? तस क्यों इससे-- 

देवसेना--सन्नाट | विजया सेरी सखी है । 

विजया--परन्तु सैने सटाक को चरण किया है । 

जयमसाला--घिजया ! 

विजया--कर चुकी दुदी । 

देवलेता---डसके लिए दूसरा उपाय त था राजाधिराज ! प्रतिहिसा 

सजुष्य को इतचे नीचे गिरा रूकती है ! प्रनन्‍्त विजया 
तूने शीक्रता की । 


हे । 


स्कन्दगु्त | [ १०७, 


(स्कन्द विजया की ओर देखते हुए विचार सें पड जाता है ।) 
गोविन्द--यह बृद्धा इसी कृतन्तन भठार्क की माता है। भटाक के 
नीच कर्सा' से दुखी होकर यह डज्यती चली आई है । 
स्कन्दु--परन्तु विज्यया, तुमने यह क्या किया £ 
देवसेना--(स्वयत) आह ! जिसकी झुझे आशंका थी, वही हे । 
विज्ञया श्राज व्‌ हारकर भी जीत गई । 
देवकी- वत्स ! आज तुम्हारे शुभ सदाभिपेक से एक बुंद भी रक्त 
न गिरे ! तम्हारी साता की सी यह मंगल कासना हे कि 
तुम्हारा शासन-दृण्ड ज्षम्रा के संकेत पर चला करे । आज 
में सब के लिए झ्षमा-आर्थी हूँ ।? 
स्कन्द का मन फिर राजकाय में नहीं लगता वह केवल “जैसी 
माता वी इच्छा ?? कहकर राजसभा समाप्त कर देता है | 
स्कन्द के हृदव मे केवल विजया के लिए ही स्थान था। देवसेना 
के लिए नहीं | अपना कर्तव्य देखकर ही वह देवसेना की ओर भुका था। 
स्कनढदु०--ढु वसेना, आज में बन्धुवर्सा की आत्मा को क्या उत्तर 
दूंगा! जिसने निस्‍्वार्थ भाव से सब कुछ मेरे चरणों में 
अर्पित कर दिया था, उससे कैसे उऋण होऊँगा ?.. 
साश्नाज्य तो नही है, में बचा हूँ, वह अपना ममत्व तुम्हे 
अर्पित करके उऋण होऊँगा, और एकान्तवास कझया। 
देवसेना--सो न होगा सम्नाट [ में दासी हूँ । सालव ने जो देश के 
लिए उत्सर्ग किया है, उसका अतिदान लेकर रत आत्मा 
का अपमान न करूँगी । सन्नाद ! देखो, यहीं पर सती 
जयमाला की भी छोटी सी सम्ताधि है, उसके ग्रोरव की 
भी रचा होनी चाहिए । 
स्कन्द ०--देवसेना ! बन्धु बन्छुवर्मा की भी तो यही इच्छा थी । 
देवलेना--परच्तु क्षमा हो सशञ्राट्‌ ! डख सस्र॒य आप विजया का स्वप्त 
देख रहे थे, अब प्रतिदाव लेकर में उस सहत्व को कलंकित 


१०६ ] | अलाद के तीन ऐसिहासिक नाइक 


न करूँगी। में आ्राजीवन दासी बनी रहेंगी, प्रन्त 
आपके पआप्य से भाय न लूंगी । 
स्कन्द का देवसेना के प्रति प्रेम कर्तव्य के रूप मे ही है। और इस 
रूप से उसका चरित्रअधिक आदर्शमान्‌ है। आगे चलकर यद्द कत्तव्व 
गेम अवश्य ही सच्चा प्रेस बन जाता, ओर उससे उसके हृदय की 
उच्छच्ठलता नही मालूम होती | 


* 


४2 


देवसेना 

देवसेना का चरित्र प्रसाद जी की एक अलोकिक भेंट है | प्रकृति 
की गोद मे पली हुई वनदेवी के मूक प्रणय की यह करुण कहानी है | 
देश और प्रेम के लिए जिसका उत्सम पारिजात के फूल से भी कोमल, 
हिमालय से सी महान्‌ और वेदना उे भी कठोर रहा हो, जिसने कोयल 
के मधुर सगीत से अपनी वेदना का स्वर मिल्लाकर हृदय मे क्रन्दन 
मचाने वाले संगीत की रचना की हो, आई हुई थाती को--पों के 
सीठे स्वप्तों के साकार स्वरूप को-- कल्पना की मीड़ों द्वारा पाली हुई 
आकाज्षाओ्ं के सफल को-वापिस लोटा दिया हो, उसी वाला का यह 
सौम्य सुन्दर चित्र है। पति-परायश सती जयमाला के मधुर प्रेम से 
अआलोकित, उदार हृदय बधुवर्मा के सुखी कुठम्ब में ही इस बालिका 
का चरित्र निमित हुआ था। जिसे प्रकृति के संगीत ने अपने जीवन को 
संगीत की तान बनाने की शिक्षा दी थी, उस बालिका का--उस 
ेवसेना का--चरित्र हिमकिरणों से भी उज्ज्वल, शिशु से भी सरल, 
साविज्नी सा आदशसान्‌ और प्रकृति सा ही नियामक होना स्वाभाविक 
है । उससे विजया के हृदय की उच्छूड्डलता नही, जो मह्त््वाकाक्षी का 
पुजारी रहे- उससे बिजया की भीरुता नहीं, जो कटारी को हृदय पर 
रखने से सयानकता समसे, उससे विजया का स्वाथ नहीं, उथला देश- 
पेस नही, पेस क्रय करने की च्छ नहीं | देवसेना का चरित्र विजया 
के चरित्र के विरोधी उपकरणों की संस्ति है। देवसेना की निर्मेल 


स्कन्दभुप्त | [ १०७ 


ज्योति को ओर भी अधिक दीप्तमान्‌ करने के लिए ही विजया के चरिन् 
के गहन अंधकार का सूजन हुआ है| पाप के समकक्ष ही पुण्य का 
आलोक पूर्ण रूप से विकसित होता है--रात्रि मे ही शशि राका के 
शीतल साद्य से हम चकित होते है| विजया ओर देवसेना का सम्पक 
भी आलोक को ओर भी अधिक दीप्तमान्‌ करने को है | 


संग्रीत और प्रकृति 


प्रथम अंक के अन्तिम दृश्य भ जब पहली बार हम इस प्रेम- 
प्रतिमा के दर्शन होते हैं तो उसका सच क्ञत्रित्व हम॑ मुग्ध कर लेता 
है | युद्ध के समय भी गान १ जिसका पूण जीवन ही संगीतमय हो 
गया हो, जो प्रकृति की प्रत्येक क्रियाओं में एक तान, एक लय सुना 
करती है उसे युद्ध क्या ? और पेम क्या ! जब प्रकृति ही सगीतमय है 
तो उसके दों रूप युद्ध ओर प्रेम दोनों सगीतमय हैं। जिसने यह 
संगीत न सुना, जिसने उस लय में अपना स्वर न मिलाया उसका जीवन 
भी सार्थक न हुआ । जिसने इस विश्ववीणा के स्वर से अपना स्वर 
'विकृत रखा वह क्‍या ग्रकृति का अनुगामी है ? वह प्राकृतिक 
होकर भी कृत्रिम है। “बिना गान के कोई काथ्य नहीं ! विश्व के अत्येक 
कम्प में एक ताल है” जिसने सुना नहीं उसका दुर्भाग्य ।देवसेना 
कब्पना लोक की देवी है जिसे प्रत्यज्ञवाद कभी की क्रर दृश्थों की ओर 
नहीं ले जाता | वह दर आकाश में एक स्वण रश्मि के समान, मूक 
प्रेम का मादक गान करती हुई हमारे सामने से निकल जाती है। हम 
उसे ठेखते हैं, सुनते हैं, देखकर सुनकर चकित होते है ओर फिर 
उसे इहलोक का वासी जान उसके सामने श्रद्धा से शिर भुका लेते 
हैं| उसने अपना जीवन ही प्रकृति के परिमाणुओं से मिला दिया है--- 
भयंकर अलयकारिणी प्रकृति के रूप मे नहीं--सोम्य सरल सुखदा 
प्रकृति माँ के स्वरूप भे | उसने अपना स्वर उसी की वीणा मे मिला 
दिया है | श्रतएव प्रकृति के समान ही वह हसारी पूजा की-- श्रद्धा की--- 


१०८] [ प्रसाद के तीन गुतिदासिक नाटक 


देवी वन जाती है | वनदेवी के समान ही वह अपने अस्तित्व को मानद॑ 
जगत से भिन्न रखे हे । विजया से वह कहती है, “विजया, प्रकृति के 
प्रत्येक परसाणु के मिलन में एकसस हे, अत्येक हरी हरी पत्ती के हिलने 
में एक लय है। सलुष्य ने अपना स्वर विक्ृत कर रखा है । इसी से तो 
उसका स्वर॒विश्ववीणा मे शीघ्र नहीं सिलता । पारिव्त्य के सारे जब 
देखो जहां देखो, बेताल वेसुर बोलेगा। पक्षियों को देखो, उनकी चहचह 
गकत छलछल से, काकिली से, रागिनी है? प्रत्वन्ञवाद और भोतिक 
वाद के पुजारी उसे क्‍या समझेगे | विजया पृछिती है,“राजकुमारी क्या 
कह रही हो ?” देवसेना तो उसी प्राकृतिक संगीत का स्वर होकर अपने 
ही आलाप से मुग्ध हो कहती हो जा रही है | उसे श्रोताओं की आलों- 
चना से क्या ? 
देवसेना--तुसने एकान्त टीले पर, सबसे अलग शरद के सुन्दर 
से फूला हुआ, फूर्लों से ला हुआ पारिजात वृक्ष देखा है 
विजया--नहीं तो । 
देवसेना--डसका स्वर अन्य बूर्षों से नही मिलता, वह अकेले अपने 
परम को तान से दक्षिण पवन से कम्प उलनन्न करता हे, 
कलियों को चटकाकर ताली बजाकर, रूस झूसकर नाचता 
है। अपना इेत्य अपना संगीत वह स्वयं देखता है--- 
सुनता है । उसके भ्रन्चर मे जीवन शक्ति वीणा वजाती 
है। वह बडे कोसल स्वर से गाता है--- 
हि घने असर तरु तले |? 
प्रेम 
लेकिन देवसेना कोई वनदेवी नही, कोई सुरवाला नही | वह भी 
इसी संसार की एक सरल हृदय रमणी है। उसने प्रेम करता भी सीखा 
है परन्तु उसका प्रेम मानवीय स्वाथ का प्रेन नहीं | जो अपने प्रेमी को 
अपने अन्तराल मे छिपाने का प्रयत्न करता है। यदि प्रेम सचमुच से 
परमात्मा है तो वह प्रेम के उत्सगे, बलिदान और त्याग से ही वास 


चना 


स्कन्दगुस्त | [ ३०६ 


करता है क्रव करनेवाले प्रेम म॑ नहीं--अपने को वेचकर उसके बदले 
भें कुछ रखने की इच्छा में नहीं | जब हमने ही अपना सारा अस्तित्व 
नुम्हीं को अपित कर दिया, जब हमारा स्वयं ही कुछ न बचा तो तुमसे 
पकिसके लिए कुछ मागें। ठमकों पाना सी तो व्यथ है। प्रेम की चरम 
सीमा शरीर का नहीं आत्माओों का मिलन है| उसी को भक्त लोग 
मीज्ष और प्रेनी प्रेम कहता है। आत्मसमपंण ही यदि प्रेम है तो फिर 
उसमे स्वा्थ कहाँ, अपनत्व कहाँ ?! इसी कारण प्रेम संदेव एक के 
लिए होता हे | दो से होने वाला प्रेम, प्रेम न रह कर वासनामात्र ही 
रह जाता है | बिजया और ठेवसेना केप्रेम में यही अन्तर है। एक 
उम परमात्मा का स्वरूप है श्रोर स्वग की सृष्टि करता है। दूसरा 
अपनी भौतिक और शारीरिक अमिलापाओं को पूर्ण करने का साधन- 
सात्र ही है | 
“जहों हमारी सुन्दर कह्पना आदर्श का नीड़ बनाकर विश्राम करती 
है, चही स्वर्ग है ! चही विहार का, वही प्रेस करने का स्थल स्वर्ग हे और 
इसी छोक में मिलता हे। जिसे नहीं मिला बह संसार सें 
अभागा है ॥?? 


काउण्य 


प्रेम की केवल एक इच्छा होती है। वह चाहता है कि उसका 
देवता उसकी पूजा को--उसकी भेंट को स्वीकार कर ले । अन्य पुजा- 
रियों से उसे कोई हेप नहीं | परन्तु यदि उसकी भंठ की उपेक्षा होती 
है-यदि उसकी भेंट ठुकरा दी जाती है तो उसका हृदय काँच के 
समान ही थोड़े से आधाव से ठुकड़े-ठकड़े हो जाता है | उसकी सारी 
अमिलापाएँ, सारी इच्छाएँ ही विल्लीन हो जाती हैं | उसका जीवन से 
ओर उसके सुख से फिर कोई भी सम्बन्ध नही रहता | उसे सिद्धि से ही 
क्‍या और ईश्वर से ही क्‍या १ 

“परन्तु सुझे सिद्धि से क्या अयोजन ? जब मेरी कामनाएँ विस्द्॒ति 


११० | [ असाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


के नीचे दबा दी गई हैं तब वह स्वय चाहे इंश्वर ही हा तो कया १?! 

“विस्मृतिः? की इसी वेदना ने देवसेना के जीवन में ऋचणता ला 
दी है। मीठी संगीत की तान जअ करुण रस की धारा बहाती है तो 
हमारे हृदय को हिला देती हें | हमारे अस्तित्व को ही कुछ ज्षणों के 
लिए. भुला देती है। इसी कारण से ही शायद वागेश्वरी इतनी 
सब प्रिय है | वागेश्वरी की करुणता भले ही उतनी लोकप्रिय न हो, 
लेकिन जब वह देदसेना के रूप मे प्रगट होती है तब कोई सी ऐसा 
नहीं जो उसके सामने अपने को विस्मृत न कर दे | देवसेना के सब- 
प्रिय होने का यहां रहस्व है | 

तृतीय अक में जहाँ देवसेना ओर उसकी सखियों का परिहास 
हम उपवन मे देखते हैं, वहाँ देवसेना का दा €ण दुख फूट कर निकल 
पड़ता है | हँसमुख चेहरे पर उदासी की झलक दिखाई दे जाती है। 
जयमाला कहती है--- 

तू डदास हे कि असन्न, कुछ समर से नहीं आता | जब तू गांदी 

है तब तेरे भीतर की राग्रिनी रोती है ओर जब हँखती है तब जैसे 
विषाद की प्रस्तावना होती है ।४ 

हास्य और करुण के इस सम्मेलन ने इस दृश्य को और भी अधिक 
करुण वना दिया हैं। इसी कारण से ही देवसेना की पीझा इतनी 
अधिक बढ़ जाती है कि उसकी आखों से अआसू बहने लगते हूं, फिर 
भी हृदय के उफान को दबाने का प्रयत्त कितना सुन्दर है। 


त्वाय 


त्याग तो मानों उसके चरित्र से मूर्तिमान होकर ही आ गया है। 
विजया के लिए तक वह अपने सवस्व को लुटा देना चाहती है 
विजया स्कन्द को पंम करती है तो अच्छा हे, भगवान के तो अनेकों 
पुजारी होते हं। सच्ची पूजा से ही तो भगवान्‌ प्रसन्न होते हैं। विजया 
के कारण हो देवसेना अपने प्रेम को अपने अन्तस्तल में ही छिपाये 


स्कन्दगुप्त | [ ११६ 


रही | प्रेम तो हृदय की मनोदत्ति है, उसे रपष्ट करने से क्या लाभ ! 
फिर भी आशा और निराशा की हिलोरे सुख पर सुख और हुख की 
रेखाएँ अंकित कर ही देती है | विजया चक्र की ओर आक्ृष्ट हुई। 
देवसेना की आशा मे फूल लगना प्रारंस हो गया । उसका स्वग शायद 
उसे मिल जावे, फिर भी कितना अस्पष्ट उस्लास हैं। विजया वेचारी 
देवमेना के सुख को कैसे जान सकती है १ वह तो उसके हृदय का खोत 
था, जो हृदय मेरु में मेंडराता हुआ संगीत के छोटे से मरने में बाहर 
निकल पद्म था । 

आत्मसमर्पण ही तो मोच्ष है। त्याग से ही तो ईश्वर मिलता हे । 
देवसेना इसी त्याग की कितनी सुन्दर व्याख्या करती है--उसकी 
संगीत-रुचि ने त्याग को भी सगीतमय बना दिया है। “भाभी, सर्वात्मा 
के स्वर में, आत्मसमपण के अत्येक ताल से अपने विशिष्ट व्यक्तित्व का, 
विस्तृत हो जाना एक सनोहर संगीत है । क्षुद्र स्वार्थ, भाभी, जाने दो, 
भट्या को देखो - कैसा उदार, कैसा सहान्‌ और कितना पवित्र ? 

उसके हृदय की इच्छा है कि वह भी पूजा कर सके, लेकिन वह 
विजया को हटाकर नहीं । विजया ने भूल की, देवसेना उसकी भूल को 
सुधारना चाहती है। उसे उसको भूल बताना चाहती है--अपना 
अनुराग--अपना स्वार्थ नहीं । 

८कया जो तुमने किया है उसे सोच ससझ कर कहीं तुम्हारे दृस्भ 
ने तुमको छल तो नहीं लिया १ तीघ्र मनोद्त्ति के कशाघात ने तुम्हें 
विपथगासिनी तो नहीं बना दिया 


द्ु हु त् 
शीक्षरता करनेवाली खत्री ! अपनी अखावधानी का दोष दूसरे पर 
न फेंक । देवसेना सूल्य देकर प्रणव नहीं लिया चाहती... ...। अच्छा 
इससे क्या २? र 


उसे सबसे अधिक छुःख इस बात का है कि विजया उसके प्रेम 
को इतना साधारण समझती है । वह विजया के स्थान को मोल लेना 


११२ ] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


नही चाहती थी, इसी कारण कापालिक के सर्मीप अपनी मृत्यु जानकर 
वह कहती है--- 2 
“परन्तु कापालिक, एक प्रौर भी इच्चा मेरे छदय में है वह पूर्ण 
नहीं हुईं है| सें डरती नही हूं । केचल डसके पूर्ण होने की प्रतीचय है । 
विजया के स्थान को में कदापि अहण ले करूँगी । उसे अम है यदि चहद 
छूट जाता ।?? ह है 
देवसेना के हुख को प्रण॑ विरह-दुख समझना भूल ही होगा | उस 
आत्माभिमानिनी को अपने प्रेम का मूल्य हलका होना सबसे अधिक 
खटकता है | जिसके भाई ने देश-प्रम के कारण अपने देश को निस्वा- 
व्यंता से त्याग दिया हो उसके त्वाग को स्वार्थ के रूप में देखना उसे 
असह्य था| वह अपने प्रेम का मूल्य नही रखना चाहती थी | वह 
प्रेम क्र न करना चाहती थी | इस कारण मालव के त्गग ने उसकी 
आशाओं को पानी मे डुवो दिया | देवसेना के उत्तर मे कितना व्यद्ग 
और कितना दुख भरा हुआ है। 
आना किसने की है, यह रहस्य की बात है । क्यों ? कहूँ ? प्राथना 
हुईं है सालव की ओर से, लोग कहेगे कि सालव देकर दुेवसेना का व्याह 
किया जा रहा है !? लेकिन सखियाँ उसकी मार्मिक पीड़ा को क्‍या 
समभतीं | उन्हे हँसी वूकती ही गई। दुख असह्य हो गया---“क्ष्यों 
वाव पर नमक छिंड़कती है ? सैने कमी उनसे प्रेस्त चर्चा करके डनका 
अपमान नही होने दिया है । नीरव जीवन और एकांत व्याकुलता, कचो- 
टने का सुख मिलता है । जब हृदय से रुदुव का स्वर उठ्ता है तभी 
संगीत की वीणा म्रिला देती हैँ । डसी सें सब छिप जाता है। ( आँखों 
से ऑसू बहाता है। ) 
३ सखी--है--है, क्‍या तुम्त रोती हो ? सेरा अपराध क्षमा करो । 
देवलेना--(खिसकती हुईं) नही प्यारी सखी ! आज ही से गम के 
नाम पर जी खोल्वकर रोती हूँ । बस फिर नहीं । यह एक 
एस का रुदन अनंत स्वर्ग का सुजन करेगा । 


स्कल्द्युप्त | [ ११३ 


२ रुखी--तुस्दे इतना दुख है में यह कल्पना भी न कर सकी थी। 
देखसेना--(सम्हलकर) यही दू भूलती 6 । झुक तो इसी सें सुख 
मिलता है, सेरा हृदय सुमसे अचुरोध करता है, सचलता 
रूपा है से उसे मनाती हूँ। आँखें अ्रणय-कलह 
उत्पन्न कराती है, चिच उत्तेजित करता है, छुद्धि भडकती 
है, कान कुछ सुनते ही नहीं । मे सबकी समकझाती हूँ, 
विवाद मिटाती हैँ सखी, फिर सी में इसी रंगडालू कुटस्त 
से गृहस्थी सम्हालकर स्वस्थ हो कर बेठती हूँ ॥” 
३ सखी--आश्चर्य ? राजकुमारी : तुम्हारे हृदय से एक ब्रसाती 
नदी वेग से भरी है। * 
देवसना--#लों में डफनकर बहनेवाली नदी, तुसुल तरंग, प्रचण्ड 
पृ०न और सयानक वर्षा । परन्ठु उसमे भी नाव चलानी 
ही होगी 7? 
प्रेम, वेदवा और त्याग का कितना स्पष्ट चित्रण इस हर्य मेहुआ 
है | प्रसाद के महान्‌ दृश्यों में से यह सी एक दृश्य है । 


कं 


०, ४ | 


609 


च्क 


७५४ 


कान्य 

कुछ लोगों के विचार से ग्रेम ओर बिरह ही लोगों को कवि वना 
देते हैं | दूसरे कवियों के उदाहरण मे यह वात भल्ते ही सच न ही 
परन्तु देवसेना की भावव्यक्ति किस कविता से कम रहे जाती हैं ! वह 
स्वयं एक काल्पनिक लोक की रमणी ह,, कल्पनामय उसका जीवन है। 
क्षुण-क्षण पर उसकी कब्पना सुन्दर चित्रों की व्यवस्था करती जाती है। 
मक प्रणव की निष्ठर पीढ़ा ने उसके सावों को ओर भी अधिक तीजत्र 
कर दिया इसलिए, ये भाव बिना कल्पना के सहारे शायद स्पष्ट ही न 
हो सकते | इसी कारण ही देवसेना का वार्तालाप काव्य रूप मे प्रवा- 
हित होता है। उसका सारा जीवन ही कवितामय हो गया है। वह 
सोचती दे लेकिल उसके साव काव्य के अ्रनंत खोत से वह रहे हैं। 


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६ (रे 


रह 


११४ ] [ असाद के तीन एतिहासिक नाटक 


संगीत सभा की अन्तिम लहरदार ओर आश्नयहीन ताव, धुपदानकी 
एक क्षीण गंध घुस-रेखा, कुचले हुए फूर्लों का बलाच सौरभ और उत्सव 
के पीछे का अवसाद, इन सर्बो की प्रतिकृति - मेरा शक्षद्र नारी जीवन ? 
रे प्रिय गान ? अब क्यों गारऊँ और क्या सुनाऊं ? इस बार-बार के याये 
हुए गीतों मे क्या आकर्षण हे--क्या बल हे जो खीचता है / केवल सुनने 
की ही नहीं प्रत्युत उसके साथ अनंतकाल तक कंठ मिला रख्ने की 
इच्छा जग जाती है |” अस्तु । ' 
देवसेता ने अपने इसी आत्मासिमान के कारण ही अपने आये 
हुए घन को लोटा दिया । वह अपने स्वार्थ के लिए भाई की उदारता 
को क्रय मे परिग्तित नही करना चाहती | 
“दंवसेना--सो न होगा सम्राट ! में दासी हैँ । सालव ने जो देश 
के लिए उत्सर्य किया हे उसका अतिदान लेकर सुत 
आत्मा का अपमान न करूणी। सन्नाट देखो यहीं पर 
सती जयसाला की भी छोटी-सी सम्राधि है, उसके गौरव 
को सी रक्षा होनी चाहिये । 
स्कन्द--देवसे वा, वन्छु बन्धुवर्मा की सी तो चही इच्छा थी । 
देवलेता--परन्तु क्षप्ता हो सम्राट ? उस समय आप विजया दा 
स्वप्न देखते थे, अब अतिदान लेकर सें डस सहत्व को 
कलंकित न करूँगी । मे आजीवन दासी बनी रहूँगी; 
परन्तु आपके झाप्य सें भाग न लूँ सी ॥? 
वैराग्य 


देवसेना का त्वाग विजया की उच्छ खलता से कितना भिन्न 
क्तिना नोरवपूर्ण हे। अपने स्वार्थ के लिए वह अपने कर्तव्य से नहीं 
हटना चाहटी---'आपको अक्मंण्य जनाने के लिए देवसेना जीवित न 
रहेगी ।? देवत्तेना का वह त्थाग कितना प्रेमपूर्ण है, कितना ऊँचा 
है | जिसके लिए वह अपने जीवन भर स्वप्न ठेखती रही--उसी द्वार 


कट 


सा [ ११% 


पर झातगि हुए. मिखारी को वह जाटों रही ह्द ] विजया के समान इसमे 

प्रतिद्िसा नहीं | यह प्रेम की ही चरम सीमा है जहाँ अपने प्रेमी के 
कक का नी र्‌ः 2 

सुख और आदर्श के लिए अपने सवस्व की तिलाजलि दे दी जाती है। 


उँवर से फेसाकर कलुपित न कीजिये । ताथ ! में आपकी ही हूँ, मेने 


द्ं 

कर्तव्य करने में महान्‌ सुस्त है, परन्ठु वह आदर्श सुख इस लोक 
में नहीं, उस लोक में मिलता है। जीवन भर की आकाज्नाओं का 
त्याग कर देना महान बलिदान है। जहाँ सब कुछ अपने देवता को 
थ्र्पण कर दिया जाता है, जहा अपना निज का कुछ नहीं, वहा स्वयं 
वैराग्य की भावना-सी जाग्त हो जाती है। 

“हुद्य की कोसल कल्पना ! सोजा । जीवन में जिसकी संभावना 
नहीं जिसे द्वार पर श्राये लौटा दिया था, डसके लिए पुकार मचाना क्‍या 
तेरे लिए अच्छी वात है ! श्राज जीवन के भावी सुख, आशा और आकांक्षा 
सब से में बिदा लेती हैँ ।”? इसी वैराग्य भाव से उत्पन्न देवसेना की 
यह युक्ति क्‍या किसी महात्मा की उक्ति से कम है ! 

“क्रष्ट हुदुय की कसौटी दे, तपस्या अप्नि है। सम्नाट्‌ , यदि इतना 
भी न कर सके तो क्‍या ! सब ज्षणिक सुर्खो का अन्च है जिसमें सुर्खो का 
श्रन्त न हो इसलिए सुख करनाही न चाहिए । मेरे इस जीवन के 
देवता | उस जीवन के प्राप्य ! क्षमा ?? 

देवसेना के चरित्र के इसी विकास के कारण नाटक की समाप्ति 
शान्त रस में होती है। प्रारम में जो कुछ भी स्वार्थ का अश था । 
परिस्थितियों की महान, अग्नि में तपकर वह परमाथ के रूप मे पूर्ण रूप 
से चमकने लगा | जहाँ केवल विजया का प्रश्न था वहाँ वह बन्धुवर्मा, 
देश और प्रियतम के प्रति कतंव्य का प्रश्व बन गया | 


११६ | [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक साटक 


0 
सटाफे 
अभिमान 
महत्वाकांशा का सोती निष्ठुरता से रहता हैं ॥?? 


नहीं है, वह एक कतव्यनिष्ठ देश-प्रमो, स्वानि 
व्यक्ति है । यदि उसमे कोई ढाोप था तो वह थी उसकी महत्वाकान्ञा | 
महत्वाकाज्षा तो ससार के सभी व्यक्तियों में पाई जाती है क्योंकि उसी 
पर उन्नति का लालसा अवलम्बित है। परन्तु यदि अपने सवा 
लिए सत्पथ त्याग दिया जावे तो मनुष्य के लिए सचमुच एक वि 
समस्या आ जाती है| मह्त्वाकाज्षा के साथ ही साथ नठाक मे एक 
प्रकार का दम्भ भी था। उसे कुछ कर गुजरने की बड़ी लालतसा थी । 
वह साम्राज्य के सावी शासकों का नियासक बनना चाहता था ओर 
इसी दम्भ ओर महत्वाकाकज्षा के कारण उसे अपना सत्पथ त्याग 
देना पड़ा । 

भटाक को अपने बाहुबल पर पूर्ण विश्वास था, वह स्वयं को एक 
महान्‌ वीर समकता था पर यह उसका दम्भ ही था। 

“बाहुबल से, वीरता से ओर अनेक प्रचंड पराक्रस़ों से ही सुझ्े मगध 
के सहाबद्याधिकृत का सानतीय पदु मिला है । से उस सस्मान की रक्षा 
करूंगा ।!? लेकिन इस साननीय पद पाने से अनंतदेवी का हाथ था| 
पृथ्वीसेन के समान बुद्धिसान अमात्य ले इसका विरोध किया था और 
भटाक का यह कथन--“यह सुझे स्मरण है कि प्रथ्दीसेन के विरोध 
करने पर भी आपकी कृपा से खुझ्के सहाबन्लाधिकृत का पद सिला है ॥? 
वास्तव में अनन्तदेवी की चापलूसी नही है; क्योंकि सटाक इस प्रकृति 
का पुरुष नहीं जो व्यथ ही दूसरों का कृतज्ञ होने के लिए तैयार हो | 
उसके दम्भ में शिष्टाचार के लिए स्थान नहीं | सटाके क्रा दम्म उसकी 
प्रत्येक बात में ठपकता है। अनन्तदेवी को आश्वासन देते हुए वह 


वाला चोर” जब स्कन्द द्वारा निरस्कृत छाता है तो भटाक अपने 


होना चाहिएु ॥/? 

क्या संदाओ वास्तव में बीर था ? उसकी वीरता का सन्देह कई 
बातों से दोता है, (१) एश्वीसेव जैसे इृद् ओर अनुभवी अमात्व का 
उसके मद्रावलाधिकृत बनने में खगापत्ति डालना, (२) स्कद सद्वद्न-युद्ध 
मे हारना; गोविस्दगुम्त जैसे इुद्ध भी उसकी तलवार आसानी से छीन 
लेते है | इसमे सन्देद्द नहीं कि कुमारगुत को हला के समय उसने 


गहतलाकांतच्ा 


ठम्भ के साथ ही साथ भटाक्र की महत्वाकाक्षाओं ने उसको 
मनुष्य से पशु बना दिया। उसकी अमिलापा साम्राज्य के सर्वोच्च 
पद पर पहुँचने की है| कुमारशुत के सामने भी उसने सौराष्ट्र के 
सेनापति बनने की इच्छा प्रगठ की थी, परन्तु वह फलवती नहीं हुईं । 
उसी पढ को पाने के लिए बह सदैव प्रयज्ञ करता रहा। वीरता के 
दम्म ने उसे और भी अन्धा बना ठिया। अपने ही प्रयल्लों से वह 
उच्चधपदासीन होना चाहता है| कभी-कभी यह लालटा उसे सत्पथ से भी 
ग्रलग कर ठेती है--“में सज्जनता का स्वांग नहीं ले सकता, सुझे यह 
नहीं भाता । सुके जो कुछ लेना हे, वह जैसे मिलेगा लूँगा | साथ दोगे 
तो तुम भी लाभ से रहोगे 2 शव को भी वह अपने कुचक्रो में भविष्य 
के सुखो को सामने रखकर घसीटना चाहता है | भविष्य के भोतिक 
सुखों के लिए. वह समझता है कि प्रत्येक मनुष्य अपने कतंव्य से 
विचलित हो जावेगा--“शीघ्रता न करो शर्व ! भ्वविष्यत्‌ के सुखों से 


१६८] [ प्रस्गद के तीन ऐत्तिह: मादक 
इसकी तुलना करो ।?? 


स्वामिमक्ति 


यदि भठाक में ये दो दोप न होते तो सम्भव दे बह स्वामिसिक्त 
चरित्रवान्‌ और गुणसम्पन्न व्यक्ति होता | वह गम्भीर है और 
सद्युणों का पुजारी | पृथ्वीसेन महाप्रतिहदार ओर दर्डनायक् की झूत्यु 
के बाद जहाँ पुरगुप उन्हें पाखएडी समभ्षकर तिरस्फार से देखता है 
वहाँ सगाक को इन स्वामिबक्त सेंगका की झत्यु स दुःख हाता है । 
वह सोचता है उससे कुछ भूल हो गई है | 
“पुरुप्त--पा्खंड स्वर्य बिदा हो गये | अच्छा ही हुथ्रा । 
भटाक--परन्तु सूल हुई । ऐसे स्वासिभक्त सेवक... ...।?! 
अच्छे गुणों को परखनेवाला, उनकी सराहना करनेवाला स्वयं 
गुणी होता है । वह भी कभी उस आदश्ञ को अपनाने का प्रयक्ञ करता 
है। यही चरित्र मे सुधार होने की आशा रहती है | उपयु क्त ढोपों से 
शूल्य होने पर वह भी इन्ही अमर आत्माओं के समान स्वामिभक्त 
होता, परन्तु भविष्य के काल्पनिक सुखों की आशा ने उसे घुरितत ओर 
लिंदनीय काय करने का साधन वनाया। पुरणुप्त के जाने के एक ऋण 
पश्चात्‌ ही वह कह उठता हें--“तो जायें सब जाये, गुप्त साम्राज्य 
के हीरों से डज़बल हृदय चीर युवर्कों का शुद्ध रक्त सब मेरी अतिहिंसा 
राक्षस के लिए बल्नि हो ।7 
इसी तरह प्रत्येक कुक करने के पूरब भणाक की सदबुद्धि उसे 
सजग करती है। वह कुचालों से दर रहने का यथाशक्ति प्रयक्ष करता 
है, परन्तु दम्भ और महत्वाकाक्षा के कारण वह सदैव विचलित हो जाता 
। महादेवी देवकी के वध करने के प्रस्ताव का उसने समर्थन किया 
परन्तु उसका विवेक इसके विरुद्ध है शवंनाग के समान कतव्य- 
निष्ठ भत्ते ही न हो परन्तु उसके समान उसके हृदय से भी पाप करने 
के पूव एक घृणा पैदा होती है| वह प्रपंचबुद्धि के प्रस्ताव से स्वयं 


ध््ड 


स्कन्दगुप्त | [ ११६ 


चकित होता है | वह उससे पूछता है-- परन्तु महास्थविर, क्या इसकी 
अरत्यत्त आवश्यकता है?” लेकिन प्रपच उसका घधममगुरु है जिसकी आज्ञा 
का पालन वह कर्तव्य से भी अधिक महान्‌ समझता है। प्रपच इसकी 
निरवांत आवश्यकता समझता है और भठाक भी इसमे अपना भावी 
छुख देखकर तथार हो जाता है | 


अन्धविश्वास 

/ भठाक अन्धविश्वासी भी बहुत है । प्रपंचबुद्धि का जादू उसके 
ऊपर पूरा प्रभाव कर चुका था | अनन्तदेवी का उस क्र पाखंडी का 
परिचय उसके छूदय मे विश्वास जमा देता है-- 

“उचीभेद्य अन्यकार में छिपनेवाली रहस्यमयी नियति का, प्रज्वलित 
कठोर नियति का--नील आवरण उठाकर मॉकनेवाला। डसकी शऑखों 
मे अ्रभिचार का संकेत दे, झुस्कराहट में विनाश की सूचना है । ऑँधियों 
से खलता है, बातें करता हे; विजलियों से आलिंगन 7? 
भटाक एकदम अनुचर बन जाता है। ऐसा भयकर मनुष्य सचमुच 
संसार में उथल-पुथल मचा देगा | भठाक के ऊपर प्रप॑च के आगमन, 
वार्तालाप ओर प्रस्थान का पूरा प्रभाव पड़ा-- 

“महादेवी, यह भुकर्प के सम्मान हृदय को हिला देने वाला कौन 
अ्यक्ति है ? ओह ! सेरा तो सिर घृम रहा हे । 

यही तो सिक्षु प्रप॑चलुद्धि हैं ! 

तब मुझे विश्वास हुआ | यह ऋषर, कठोर नर पिशाउ सेरी लहायता 
करेगा । में उस दिन के लिए अस्तुत हूँ ? 

प्रँंच की अलौकिक शक्ति के विपय में मी भटाक को पूर्ण विश्वास 
था | प्रपंच और शवनाग के लड़खड़ा कर गिरने पर-- 

“शर्च--बड़ी चोट आईं । 

अप च--परन्तु परिणाम अच्छा हुआ | चुप लोगों पर भारी आपत्ति 

आने वाली थी । 


१२० ] [ प्रसाद के तीव ऐतिहासिक नाटक 


भसटाकी--क्या वह टल गईं ? (आरचय से देखता 
शर्व--क््यों सेनापति टल गई ? 
प्रप॑'च--डस विपत्ति का निवारण करने के लिए ही मेने यह कष्ट सहा। 
में तुम लोगों के घत,सविष्य ओर वर्तेसाच का नियामक 
रक्षक और द्वछा हूँ । जाओ अब तुस लोग विभय्र हो 
भठाक--धन्य गुरुदेव ! 
शर्व--आरचथ | । 
सटार्क--शका न करो, श्रद्धा करो । श्रद्धा का फल मिलेगा । शर्त 
अब सी तुस विश्वास नहीं करते १? 
संभवतः सटाक का यह आचरण शवनाग को चणुल में फेसाने 
के लिए समझा जावे । परन्तु अन्य अवसरो पर हम भठाक की इसी 
प्रवृत्ति को स्पष्ट रूप से देखते हैं | 


॥, 
2५ 


कतजञ्चता 


भटठाक कृतज्ञ है। अपने अक्षम्य अपराधों की स्कन्द द्वारा क्षमा पाकर: 
वह लज्जित हो जाता है। अपने दुष्कमों के लिए उसे पश्चात्ताप है । 

“प्रप॑च--डसने तम्हे सूली पर नही चढाया ? 

भटाक--नहीं उससे बढ़कर । 

प्रप च--क्सया ? 


भटाक--मझुझे अपसानित करके क्षमा किया । सेरी वीरता पर एक 
वह डपकार का बोर लाद दिया । 
प्रप च---तुम सूख हो । शन्न से बदला लेने का डपाय करना चाहिए 
न कि उसके डपकारों का स्प्रण । 
भटाक--मे इतना नीच नहीं हूँ १? 
देवसेना के अन्त करने के पड़यंत्र मे उसकी आत्मा काँप उठती 


हैं| भल्ते ओर बुरे दोनो के दुद्ध का चित्रण लेखक की कला-कौशल- 
का अच्छा परिचायक है। 


स्कन्दगुद् | [ १२९ 


“भटाध--परन्तु में कृतश्ता से कल्ंकित होऊँगा और स्कन्दगुप्त से 
किस मुह से - . .नहीं वही । 
प्रपश्चध-न-लावधान भटाक, श्रलग ले जाकर इतना सम्काया, फिर भी 
तम पहले अननन्‍्तदेवी और पुझुणुध्त के प्रतिश्रुत हो छुके हो ४ 
सथार्क--ओह ! पाप पंक से लिछ सनुष्य को छद्दी नहीं; कुकर्म डसे 
पकड़ कर अपने नागपाश सें बॉध देता है । हुर्भाग्य !?? 
कत्तव्य-निष्ठा 


ह् 

भटात में एक मिथ्या अहंकोर अपनी सत्यनिष्ठा का भी है | 
समा में वही पवित्र आचरण वन जाता | अनंतदेवी और पुरणुप्त 
से प्रतिश्रव होने के कारण उसने बुरा मांग अपनाया | फलतः अन्त से 
वह हणों से सधि कर आर्थावर्त का पतन करता है। वास्तव मे वह 
साम्राज्य के विरुद्र कोई काय नहीं करना चाहता था। 

मठार का यह दोष काल और परिस्थिति के बीच दुराचरण ही 
समझा जावेगा | लेकिन वह अपनी बुद्धि के अनुसार सत्काय में ही 
लगा था। जो हो भठाक का चरित्र सुन्दर और घृणित कर्मों का 
सम्मिश्रण है। प्रारभ में दुराचरण का ही प्रभाव उसकी प्रकृति पर 
मुख्य है | क्रमशः नित्य की भूलो ने उसकी दुद्र सलियों का नाश कर 
डाला और उसकी आन्‍्तरिक चेतना जागण्त होने, लगो---उसे अपनी मूल 
मालूम होने लगी। जो पहिले स्कन्द का शत्रु था, अब उसका सेवक 
वन गया | जिसने अपने कर्मो से देश को म्लेच्छी के हाथ साध दिया 
था, वही अपने ही धन से सेना संकलित कर देशाद्धार मं लग गया । 


ही है 
प्रम 

भटाव के जीवन का परिवतन मुख्यतः दो बातों के कारण ही 
हुआ है | एक तो महादेवी की झत्यु ओर दसरसी माँ की भत्सन [| 
इसमे सन्देह नहीं कि महादेवी के प्रति उसकी श्रद्धा सर्देव रही है 


१२२ ] [ प्रसाद के तीन पेतिहासिक नाटक 


अतएव उनको झत्यु से उसके छुदय पर एक भयानक पक्का लगा | 
परत्पु माँ की सत्सता उसे असह्ाय थी! माँ को वह सबसे अधिक 
मानता था| माँ के रूठ जाने पर वह उसे रास्ते-रास्ते मनाता फिरता 
रहा | ह 
“साँ अधिक न कहो | साम्राज्य के विरुद्ध कोई अपराध करने का 
सेरा उद्देश्य नहीं था। केवल पुसुणुप्त को सिंहासन पर बिठाने की 
अतिज्ञा से प्रेरित होकर मैने यह किया । स्कन्द्युप्त न सही, पुरगुप्त सन्नाट 
होगा |? 
न न + 
“कम्ला--तू मेरा पुत्र है कि नही ? 
भटाके--सॉं, संसार से इतना ही तो स्थिर सत््य हे और मुझे इतने 
पर ही विश्वास है। संसार के ससरत लांछनों का में 
तिरस्कार करता हूँ। किसलिए ? केवल इसीलिए कि तू 
मेरी सो है और वह जीवित है [? 
देवकी की मृत्यु के पश्चात्‌ माँ के शब्द जादू का काय कर गये | 
उसे अ्रपनी भूल मालूम होने लगी, अपनी इुबुद्धि पर पश्चात्ताप होने 
लगा, सौ, क्षमा करो ! आजसे मैने शस्त्र त्याग दिया--में इस रंधर्ष से 
अलग हूँ । अब अपनी दुर्बृद्धि से तुम्हे कष्ट न पहुँचाऊंगा ।? 


चन्द्रगुप्त 


रचना-तिथि 

चन्द्रगुत्त नाठक स्कन्दगुस के तीन वर्ष बाद १६३१ में प्रकाशित 
हुआ | प्रकाशक के वक्तव्य से मालूम होता है कि यह ग्रन्थ प्रकाशन 
तिथि के दो वर्ष पूर्व ही प्रेस मे आ गया था | इस कारण यह नाटक 
या तो स्कन्दगुप्त के साथ ही साथ लिखा गया है या उसके पश्चात्‌ ही। 
प्रसाद जी का चन्द्रयुत्त नाटक लिखने का विचार वहुत पहले का 
मालूम होता है क्योंकि नाटक की भूमिका उन्होंने सत््‌ १६०६ में ही 
प्रकाशित कर दी थी ओर इसलिए “इश्ष उत्कृष्ट नाटक में लिखने की 
भावना सी असाद जी के मन से डसी ससय से बनी हुई थी। इसी के 
नमूने पर एक छोटा-सा रूपक कल्याणी परिणय के नाम से उन्होंने लिखा 
भरी । जो अगस्त १४१३४ सें नायरी अचारिणी पत्रिका मे अरकाशित हुआ 


९, 


था 77१ इस कारण वहुत सम्भव है कि नाटक का प्रारम्स 


) प्रकाशक का चक्तव्य । 


१२४ | 


व पहले ही हो चुका हो | सरा तो अनुमान हे कि ताटक स्कत्दसूत 
पूृथ हो लिखा जा चुका था क्वाकि नाटक को हा से इुशुम के भूल 
ए ओर वह स्कन्द्शुम से निम्न श्र्गा क्र खना प | 


 (. 


क्नात+ 


राय वाव का च भूत ् 

स्कन्दगुम और चन्द्रगुम मं समत भी बहुत ऋुद् 
घटनता-सगठन, उसका विस्तार, चरित्र-चित्रण बहुत छुछ स्कन्दगुमत 
के समान ही है। केवल ऐतिहासिक अन्वेषण ने साटक की प्रृष्ठभृमि 
को बहुत अधिक बढ़ा दिया है। राय बावू के चद्धगुम साट्क का 
अनुवाद १६१७ स आ चुका था ओर उसका हिन्दी साहित्य सं मान 
भी आंधिक हुआ था। अ्रतएवं प्रसाद जी के लिए यह आवश्यक था 
कि वे इस कथानक को कुछ मौलिक रूप में रखते । राब बाबू इतिहांस 
के फेर में नही पड़े। उन्होंने इतिहास की प्रचलित सामग्री को लेकर 
साहित्य के साँचे से ढाल दिया है। इतिहास का उन्हें इतचा ध्यान न 
था जितना साहित्य का | प्रसाद जी दूसरी ओर से ही चले मालूम होते 
हैं। उन्हें इतिहास का अधिक ध्यान था और सम्मवतः साहित्य का 
कम | जो ऐतिहासिक अन्वेषण उन्होंने १६०६ के बहुत पूव प्रारम्म 
किया था वह १६२६ तक वराबर चलता ही रहा और इस रूप में 


ऐतिहासिक लक्ष्य की ओर ही नाटककार का ध्यान अधिक रहा मालूम 
होता है । 


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१ 


प्रसाद ओर राय बाबू के नाटकों मे एक और अन्तर माल्यूम पढ़ता 
है। राय वावू का नाटक अन्तर्राष्ट्रीय भावनाओं को लेकर चला है 
परन्ठु प्रसाद जी का नाटक संकुचित राष्ट्ररभावना पर आधारित है | 
हिजेन्द्रलाल राय के लिए सिकद्र भो महान था और चन्द्रगुप्त मी--- 
वर्याकि दाता वर उुरुप थे --दोनों ससार की महान्‌ विभूतियाँ थीं। 
इतिहास सिक्दर का चरित्र चन्द्रगुत्त से महान्‌ बताता है। वह वीर 
था, वीरता का मान करने बाला था। उससे असीम उत्साह था, वह 


चन्द्रगुप्त | [ १२५ 


दूसरो के उत्साह का भी साव करता था। उद् ने जो कुछ किया था 
आरतवर्प के लिए | देश-प्रेम के नाते पुरु का पौरुष श्लाच्य है, परन्तु 
मानवता के नाते सिकंदर का पुर के प्रति आचरण अधिक प्रशंसनीय 
है। चन्द्रगुतत महान्‌ था परन्तु सिकंदर की श्रेणी में वह नहीं रखा जा 
सकता । राय बाबू ने यह ध्यान रखा है इसी कारण उन्होंने सिकदर 
- महान्‌ का रगसच पर अधिक नहीं आने दिया | उनका सिकंदर पूर्ण 
ऐतिहासिक चरित्र है| प्रसाद जी ने भी सिकंदर को महान्‌ चित्रित 
करने का प्रयक्ष किया हैं और उन्होने ऐसे स्थल रखे भी हैं जहा उसकी 
महानता प्रकट होंती है | परन्तु फिर भी चन्द्रगुत, सिहरण, चाणक्य 
ओर दाणएडायन के समीप उसकी लथुता स्पष्ट गोचर होने लगती है। 
१६२२ से जो राष्ट्रीय आन्दोलन चल रहा था उसका मात प्रमाद 
जी पर पड़ता ही रहा और इस कारण पूरे राष्ट्रवादी होकर उन्‍होंने 
भारतीय गौरव ही अपने नाठक में रखा है। राय बावू में जहा मानवता 
की पुकार है वहा चन्द्रगुप्त में रा्रीय भावना की । 
भारत गौरव प्रकट करने “के लिए प्रसाद जी ने केवल ऐतिहासिक 
अचरित्रों पर ही आधात नहीं किया है, वरन्‌ नाटक के कथानक का रूप 
भी बदल दिया है | राय बावू का नाटक स्वतस्त्र गति से चलता हुथ्ना 
दिखाता है उसके कथानक में प्रवाह है । परन्तु प्रसाद जी के नाक का 
कथानक बड़ा शिथिल हो गया है। प्रसाद जी ने महान ऐतिहासिक 
पृष्ठभूमि को नाटक में बंढ करने का अंयेत् किया है । जहाँ-जहाँ 
सी नाथ्ककार को भारतीयता प्रकट करने का सौका मिला है वहीं 
उसने दृश्य के दृश्य रच डाले हैं । आम्भीक यदि देशद्रोही था तो उसकी 
वहिन आर्यावर्त की लक्ष्मी थी जो अपने भाई और पिता के विरुद्ध 
देश की स्वतंत्रता के लिए प्रजा को भडकाती रही | इस कारण अलका 
का चरित्र और तत्षशिल्ा की घटनाएँ नाटक मे रख दी गई । यवनों के 
अत्यावर्तन में भी इतिहास ने सिर्कंद्र की महानता स्वीकार की है। 
परन्तु प्रसाद जी ने उस समय के व्यर्थाभिमाच की आओर संकेत करते हुए 


3१२६ | [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नावक 


उस समय की फूट को भारतीय पराजय का सुख्य कारण वताज ह्वै! 
पुर अपने अभिमान मे चूर था--श्राम्भीक्र पुढ से हूए रखता था: 
अतएव दोनो का पतन हुआ | लेकिन इस पतन से भी प्रसाद जी ने 
भारतीय सस्कृति की ही विजय रखी है| माल्व गणुतंत्रों ने एक साथ 
मिलकर सिकदर से मोचा लिया था इस कारण सिकदर का सारतांवा 
का लोहा मानना पद | 

ठदाण्डायन के आश्रम का दृश्य सी भारतीयता' की विजय चित्रण 
करने के लिए रखा गया है। भारतीय गोरव प्रदर्शन ऋरते के लिए ही 
प्रसाद जी ने इस विस्वृत ऐतिहासिक पीठिका को अपने नाक मे रखा 
है जिसके कारण उन्हें कई दृश्यो और चरित्रों की रनी पड़ी 
है | इसलिए नाटक में वह एकरूपता नहीं जो राय बाबू के चन्द्रयुत्त 
नाटक ने मिलती है| उससे वह उन्सुक्त प्वाह नहीं, वह अवाध गति 
नही जो सफल नाटक के लिए आवश्यक है | 


| 


कथा-संग ठन 


फलागम की दृष्टि से नाटककार का उद्देश्य चन्द्रमुप्त का उत्कप 
दिखाना है । किस प्रकार चन्द्रगुप्त तत्नशिला का एक साधारण स्नातक 
है और किस प्रकार परिस्थितियो ने उसे भारत का सम्राद बना दिया। 
यही नायक का संक्षित कथानक हे। प्रथस अंक भे हम इस चरित्र की 
वीरता को देखते हैं । बह वीर है भारत की परिस्थितियाँ भी उसके लिए 
उपयुक्त हैं। अन्य वीर योद्धा वा चाणक्य के समान बुद्धिमान पुरुष 
उसकी सहायता के लिए तैयार हैं | प्रथम अंक में ही दाए्डायन उसके 
लिए भविष्यवाणी भी करते हैं | हम उसके उत्कष के लिए आशा बँधने 
लगती है| ह्वितीय अंक से उसी वीर नायक की अध्यक्षता मे सिकंदर को 
हारना पड़ता है और सिकंदर का प्रत्यावतंन होता है। चाणक्य की 
कूटनीति पूरा काम करती मालूम होती है। तृतीय अंक से हम चन्द्रगुतत 
को भगध का राजा होते देखते हैं । घटनाएँ एक दूसरे से पूर्ण संबद्ध हैं । 


0७४ । [ १२७ 
चतुथ अंक 


रस के विचार से या काय संकलन की दृष्टि से चतुर्थ अंक भले ही 
नायक के उपयुक्त न हो पर वह विपय के अनुकूल अवश्य है। चन्द्रगुप् 
का उत्कर्प दिखाने के लिए. उसे केबल मगध का राजा प्रदश्शित करना 
शोभा नहीं देता इस कारण उसके अकण्टक राज्य का चित्रण करने 
के लिए ही चतुर्थ अक रखा गया है | इसमे हम उसकी सेल्यूकस से 
मैत्री देखते हैं और सिंहरण को जो मालवा और तक्षशिला का अधि- 
कारी है, चन्द्रयुतत का आधिपत्य स्वीकार करते पाते है | राक्षस भी 
चन्द्रगुप्त का मंत्रित्व स्वीकार कर लेता है। और इस प्रकार चद्धगुप्त 
पूरे उचरापथ का सम्राठ हो जाता हे । 
चतुर्थ अंक का विषय-महत्ब क्रितना ही हो परन्तु वह नाटक मे 
अलग से जुड़ा हुआ परिच्छेद-सा मालूम होंता है तृतीय अक नाठक 
की चरम सीमा मालूम होती है जहाँ पर हमारी जिज्ञासा की पूर्ण शाति 
हो जाती है।इस कारण चतुर्थ अंक में हमारे लिए कुछ भी आकर्षण 
नहीं रह जाता और इस अंक की घटनाएँ फिर से प्रारंभ होती हुईं मालूम 
होती हैं| यदि नाठक तृतीय अक पर ही समात्त हो जाता तो उसका 
प्रभाव दर्शनों और पाठकों पर अधिक रहता। चतुर्थ अंक की अवतारणा 
साहित्य की दृष्टि से ठीक नहीं मालूस होती । 


उपकथानक 

नाटक का मुख्य कथानक केवल इतना ही है। कई अनावश्यक प्रसंगों 
से यह कथानक बहुत बढ़ा दिया गया है। जिसके कारण कथानक में 
जटिलता आ गई है और उसकी रोचकंता भी कम हो गई है। नाठक 
इन अनावश्यक प्रसंगो के कारण खेलने योग्य भी नहीं रहा | काशी 
की रल्लाकर रसिक मंडली ने इस नाटके के ४७ में से केवल २६ दृश्य 
खेले थे फिर भी इस प्रदर्शन में कई घंटे लगे । कार्य-संकलन की दृष्टि 


4९८ | [ असाद के तीन ऐतिहासिक नादक 


से नाटक मे कई अनावश्यक प्रसंग रख ठिये गये हैं जो रसात्मक होते 
हुए भी व्यथ हैं। इसमे सनन्‍्देह नहीं कि नाटक की सारी उपकथाएँ 
सुख्य कथावक से पू्ण सबद्ध हैं। वे अजातशत्रु की उपकथानकों 
के समान स्वतंत्र सत्ता नहीं रखतीं | परन्तु उपक्रथधानको की भरमार 
इतनी अधिक है कि मुख्य कथानक का रूप ही हमारी समझने 
नहीं आता । सिहरण-अलका का प्रेम, परवतेश्वर-कऋल्याणी कथानक 
ओर कल्याणी-चन्द्रगुप्त प्रणय ये तीनो घटनाएँ मुख्य कथानक के विकास 
में किसी प्रकार की सहायता नहीं देतीं | यदि ये तीनो घठनाएँ निकाल 
दी जावे तो नाठक में कोई अरोचकता न होगी | हाँ, उसका कथानक 
काफ़ी निम्चरे रूप से आ जावेगा | साथ ही च_न्द्रगुत के चरित्र का 
विकास जो सिहरण, पवतेश्वर आदि अन्य चरित्रों की अवतारणा 
वा उनके बार-बार नावक मे आ जाने से रुक जाता है, पूण हो 
सकेगा । 
नाटककार ने इन दृश्यो वा चरित्रों की केवल अपने देश-प्रेम 
ओर प्रसूति-कल्पना के कारण रखा है | सिंदरण और अलका नदी मे 
वहते हुए दो तिनकों के समान सिल जाते हैं। कथानक के धाराप्रवह 
में उनका कोई महत्त्व नहीं | अधिक से अधिक यही कहा जा सकता है 
कि इस कथानक के द्वारा पबतेश्वर के चरित्र पर प्रकाश पड़ता है और 
सिंहरण को अलका का प्रेम, उसको देश-सेवा के पुरस्कार-स्वरूप 
मिलता है| पर इससे तो पबतेश्वर की वीरता, उसकी इतिहास प्रसिद्ध 
इृढ़ता पर ही छीटे पड़ते हैं। पवतेश्वर हमारे सामने कामुक और देश- 
द्रोही के रूप से आता मालूम होता है! 
पवतेश्वर-कल्याणी कथानक सम्भवतः उस ससय की ऐतिहासिक 
उष्ठभूमि खीचने के लिए ही रखा गया है। सिकंदर की भारत 
विजय का कारण यहाँ की फूट ही बताई गई है और इस फूट का 
कारण आम्भीक ओर पवतेश्वर तथा मगध के विद्ेषपूर्ण संबंध से 
अच्छी त्तरह मालूम हो जाता है | कल्याणी-चन्द्रशुत कथानक 


है 


न्द्रगुप्त | [१२६ 


कार्य-संकलन की दृष्टि से नाटक में अनावश्यक ही है। हमारे जीवन में 
भी कई ऐसी घटनाएँ हुआ करती हैं जितका हम पर कुछ भी प्रभाव 
नहीं पड़ता | कलाकार को मुख्य कथानक्र चयन में ऐसी घटनाओं का 
संशोधन करना पड़ता है। कल्याणी-चन्द्रगुप्त प्रणय चन्द्रयुत की मुख्य 
कथा का एक निरथक्र भाग है क्योकि उसका कोई भी प्रभाव चन्द्रगुत 
के जीवन विकास पर नहीं पड़ता । दो पात्रों की अवतारणा सी अना- 
वश्यक्र है, एक आम्भीक का पिता इंद्ध राजा ओर दूसरा मालविका | 
इनके बिना भ्री कथानक पूर्ण रूप से श्ट खलाबद् रह सकता था । 
इन चरित्रो वा घटनाओं की अधिकता से मुख्य घटना कुछ दब-सी 
गई है और नाठक के दशकों और पाठकों को कथानक समभने मे कुछ 
कृष्ठ सा उठाना पड़ता है। नाटक के मुख्य पात्रों पर इसका बहुत बुरा 
प्रभाव पड़ा है। नाटककार ने नाटक का नायक चल्दश॒प्त माना है; 
परन्तु चन्द्रगुप्त के चरित्र में पूर्ण विकास न होने के कारण हमारा ध्यान 
चाणक्य की कार्यरैली पर केन्द्रित हो जाता है। वही एक व्यक्ति है जो 
इन भिन्न-भिन्न घटनाओं वा चरित्रों को नाटक मे एक दूसरे से सम्बन्धित 
किये हुए है | नाठक में उसी की तूती खूब बोल रही है । ओर वहीं 
नाटक का नायक बना बैठा-सा मालूम होता है। 
कथानक बढ़ जाने के कारण नाटककार से कई अन्य भूले भी हुई 
है| विशेषत३ उपघटनाओं के चित्रण श्रौर उपकथानक से संबंध रखने 
वाले दृश्यों मे | उदाहरणाथः--सिल्यूकस के ऊपर चन्द्रगुप्त से पड़यंत्र 
करने का अभियोग लगाया गया । सिकदर न्याय करने बैठा । चन्द्रगुम् 
से कुछ गरमागरम बातें हुई ! वह तलवार चलाकर निकल सागता है । 
इसके पश्चात्‌ -- 
“प्िकल्दुर-सिल्यूकस ! 
सिल्यूकस---पतन्राट : 
सिकदर--यह क्या 
सिल्यूकस-- आपका अविवेक ! चन्द्रमुप्त एक घीर युवक है! यह 
६ 


१३० ] [ प्रसाद के तीन ऐनिद्ासिक नाटक 


आचरण उसकी भावी श्री ओर पूर्ण मनुष्यता वा ग्ोलक है, खध्यट * 
हस लोग जिस काम से आये है उसे करना चाहिए | फिलिपस छो प्स्ला- 
पुर की सहिलाओं के साथ वाल्हीक जाने दीजिये । 

प्िकदर--( कुद सोचकर ) अच्छा ज्ञाओं ॥४! 
चन्द्रगुत्त की यह प्रशंसा वो सिल्यूकस के अपराध को ओर + 
करती है | किर सिल्यूकस सिकदर को पाठ पटाने लगता £ | 
जैसे भूल ही जाता ई कि वह न्याय करने बेठा था और #ह उठता 
है, “अच्छा जाओ? 

इसी प्रकार मालबिका का प्रेम-प्रदशन करते के लिए---चन्द्र॒गुर् 
मालविका ने बातें कर रहा है। चाणक्य आकर कत्ता दें, या सुंद 
का समय है, “द्ोकरियों से बात करने का समय नहीं? । चन्प्रगुशत और 
चाणक्य का वार्तालाप होता है उसके बाद वह कहता 5, “घचलिये में 
असी आया? ओर फिर मालविका से बातें करने लगता दे । गुरू ने 
जिसके लिए मना किया था वही आचरण | शुरू का यह झपमास ! 
फिर भी चाणक्य चुपचाप चले जाते हैं। चाणक्य वेचारा क्‍या करें, 
नाटककार को तो मालविका-प्रणय पूरा करना है। 

इन सब कारणों से कथानक का रूप काफी विकृत हो चुका है । 
उसमे वह एकरूपता नहीं रह गई है जो नाटक के कथानक मे उन्पुक्त 
प्रवाह लाता है। कथानक का विस्तार प्रासंगिक घटनाओं से इतना 
बढ़ गया है कि मुख्य घटना दव-सी गई है। सुख्य पात्रों का चरित्र- 
चित्रण सी स्पष्ट नही हो सका है ओर नाटक का विस्तार इतना हो 
गया है कि वह रंगमंच के उपयुक्त सी नहीं रहा | 





चरित्र-चित्रश 
एकांगी 


कथानक के बढ़ जाते से पाजन्नों की सख्या भी बढ़ गई है जिसके 


चन्द्रगुप्त | [ 4३५४ 


कारण मुख्य चरित्रो के विकास पर बुरा प्रभाव पड़ा है। पूर्ण प्रस्फुटित 
न होने के कारण पात्र हम केवल छाया मात्र ही मालूम होते है। वे 
हमारे सामने एक जटिल प्रकृति के मनुष्य के समान नहीं आते जिसमे 
प्रेम होता है, दया होती है, क्रोध होता है, घृणा होती है। जो हँसता 
है, रोता है, गाता है | चन्द्रगुत्त का कोई भी चरित्र इस जटिल प्रकृति 
का चित्र नहीं | उनमे मानव चरित्र के केवल एक ही श्रग को ले लिया 
गया है और उसका चित्रण किया गया है। सिंहरण केवल वीर है, 
युद्ध करना जानता है, कभी-कभी प्रेम भी कर लेता है। बस। 
चन्द्रशुम॒ सिहरण के चरित्र के ढाँचे मे ही ढला हुआ हैं। आम्भीक 
का पिता एक असहाय पुरुष है जो राजा होने के योग्य भी नहीं। 
नंद विलासी है। राक्षस शकदार वरुरुचि भी एकागी है। चाणक्य 
का चरित्र भर इतना सरल नहीं है इस कारण वहीं कुछ अच्छा 
चरित्र हो सका है | 


विकास 


चरित्र का केवल एक पहलू लेकर भी उत्तम चारत्रो की अवतारणा 
होती है क्योकि ऐसे चरित्र अपने इन एकागी रूप के कारण घटनाओं 
को प्रभावित करते हैं वा घटनाओं द्वारा स्वयं प्रभावित होकर अपने 
चरित्र मे विकास करते हँ। परन्तु अत्यधिक चरित्रों के कारण चन्द्रयुतत 
मे यह सी संभव नहीं हो सका दे । उनमे कोई विकास नहीं। हम जिस 
चरित्र की जो बातें पहले दृश्य में पाते हैं वही मध्य मे आर वही अत 
मे | केवल चाणक्य के चरित्र में यह विकास है | कुछ विकास चन्द्रगुतत 
के चरित्र मे भी मिलता है, परन्तु यह विकास नायक के महत्त्व के योग्य 
नही | आदि दृश्यो में चन्द्रगुत की वीरता ही हमे देखने को मिलती हे 
ओर कुछ नहीं। हाँ, वह कर्तव्य-पेमी है इस कारण प्रेम आदि के 
मंसटों मे नहीं पड़ता | कल्याणी के प्रेम की वह उपेक्षा करता है 
लेकिन यह कल्याणी के प्रति उसकी उदासीनता ही थी; क्योकि युद्ध- 


१४२३ ] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


काल में वह मालविका वा कार्नीलिया से प्रेम करता है । 

सिंहरण वीर है | मंद विलासी ओर बाद में निर्दबी हो जाता है; 
परन्तु अपने चरित्र-विकास या घटनाओं के कारण नहीं | वह पहले से 
ही अविवेकी राजा था--तभी तो शकटार को बन्दी किया था और 
चाणक्य को अपमानित कर निर्वासित किया था | पव्तेश्वर के चरित्र 
मे अवश्य विकास है| वह अभिमानी राजा है परन्तु उसका अभिमाने 
चूर हो जाता है और वह विरागी वन बैठता हैँ। परन्तु यहाँ एक 
अस्वासाविकता आ जाती है, जिसका कोई भी कारण नहीं | इस 
वैराग्य से वह फिर क्‍यों समगध का आधा राज्य माँगता है ? क्‍यों 
कल्याणी से पेस कर अपनी मृत्यु तुलाता है ? आम्भीक एक 
मच्च्वाकाक्षी कुमार है पर अंत में अपना राज्य तक अलका को 
दे डालता है--सो क्‍यों! क्‍या केवल अपनी पराजय के कारण ? 

स््रीपात्रों के चरित्र प्राः एक से ही हैं। अलका, सालविका और 
कल्याणी सच्ची प्रेमिकाएं हँ--देश की रक्षा का ध्यान रखती हैं | 
सुवासिनी--शक्तिशाली की पूजा करती हे ओर कभी राक्षस की आरा- 
धना करती है ओर कभी चाणक्य की। कार्नीलिया भारत से प्रेम 
करती है और चन्द्रगुतत से सी । वह प्रेम की मूर्ति है, पवित्र निस्वार्थ 
प्रेम की | 
अन्तद्वेद्र 


जिस समय चरित्रों का केवल एक ही अंग उपस्थित किया जाता 
है उस समय उनमे हमें अन्तह्वद् नहीं मिलता। चन्द्रगुत मे चाणक्य के 
चरित्र को छोड़ ओर किसी में यह अन्तहवद्द नहीं दिखाई देता। 
अवसर आये हैं पर नाटककार ने उनका उपयोग नहीं किया | 
सुवासिनी ने राक्षुस पर अपना प्रेम प्रगट कर दिया, पर राजकोप का डर 
था । राक्षस के हृदय में एक हलचल आवश्यक थी | 


“एक परदा डठ रहा है या गिर रहा है समरू में नहीं आता, 


चन्द्रगुप्त ] [१३३ 


€ ओँख सोचकर ) सुवासिनी ! कुछुमपुर का स्वर्गीय कुसुम । में हस्तगत 
कर लू ? नहीं राजकोप होगा । परन्तु मेरा जीवन वृथा है । मेरी विद्या, 
मेरा परिष्कृत विचार सब व्यर्थ है। सुवासिनी एक लालसा है, एक प्यास 
है; वह अम्तृत है उसे पाने के लिए सौ बार मरू गा ॥7? 

केवल इतने से ही अन्तद्वद् का अवकाश चला गया। चाणक्य 
के चरित्र में नाटककार ने अ्रवश्य ही कुछ जटिलता रखी है। उसके 
हृटय भी है ओर मस्तिष्क भी । मस्तिष्क हृदय को दवा देना चाहता 
हैं पर जैसे वह बार-बार बाहर माँक पढ़ता हो | एक उत्तम चरित्र की 
सामग्री उपस्थित है। नाटककार ने चाणक्य के चरित्र-चित्रण में 
सफलता भी प्राप्त की है। पर यह चरित्र भी स्थानाभाव से पूर्ण नहीं 
हो सका है। कही-कहीं तो यह अ्रन्तद्वद्व इतनी फीकी तरह से चित्रित 
हुआ है कि वह अस्वाभाविक-सा लगने लगता है | उदाहरणा्थ--- 

चाणक्य अपनी भोपड़ी पर लोग्कर आता है। पिता निर्वासित 
हो गया है | शकटार, उसके पिता का मित्र, वदी है; सुवासिनी, उसकी 
कोमल स्मृति, भूख की ज्वाला में अभिनेत्री हो गई। संसार मे चाणक्य 
के लिए कुछ भी नहीं | उसे मगध के ऊपर क्रोध आना स्वाभाविक 
ही था-- 

“झराध | मग्रध | सावधान ! इतना अत्याचार | सहना असंभव हे? 
तुझे उलट दं गा। नया बनाऊंगा; नहीं तो नाश ही कर दूं गा । (5हरकर) 
एक बार चलूँ; नंद से कहूँ--नहीं; परन्तु सुझे मेरी भूमि, मेरी दृत्ति 
वही प्रिल जावे, में शाख्र-व्यवसायी न रहूँगा। में कृषक बनूंगा मु 
राष्ट्र की भत्ताई घुराई से क्या 7? 

इस परिवर्तन--इस शातिमय जीवन अपनाने का क्‍या रहस्व है १ 
नाटककार के पास इसका उत्तर नही | 

यह भी बात नहीं है कि सभी मूले स्थानाभाव से ही हुई हो। कही- 
कही नाटककार ने अपनी भल से या किसी अन्य कारण से चरितरों म 
कुछ अरवाभाविकता ला दी है| प्रतिवेशी स्वर्थ आकर चाणक्य को 


१३४ | [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाह्क 


टोकता है उसे हँस-हँंसकर सब बाते बताता है--जैसे वह बात करने मे 
बड़ा आनद लेता हो, परन्तु चाणक्य के पूछने पर कि शक्रदार का 
कटम्ब कहाँ है ? वह जैसे एक उदासीन पुरुष हो ब्रात कम करना 
पसंद करता हो | कहता ह--“केसे मजुप्य हो | अरे राजकोपानल मे 
सब जल सरे । इतनी सी बात के लिए झुझे लोटाया था ? छिएः? क्या 
वास्तव में यह “इतनी-सी बात” है। 


चन्द्रगुपत 
विकास 


चन्द्रशुप्त नाव्क का नायक है, परन्त चाणक्य के सानने नायक 
का महत्त्व बहुत ही कम हो गया है। चाणक्य ही घटनाओं का सूत्राधार 
है--वह विचार है तो चन्द्रगुत साधन मात्र । प्रारंभ में अवश्य ही वह 
कुछ स्वतंत्र होकर काम करता है परन्तु बाद में विना चाणक्य के वह 
कुछ भी नही कर पाता है। उसके चरित्र से जो विकास हुआ है वह 
नाथक के महत्त्व को बरढ़ानेवाला नहीं। जहाँ प्रथम अंक में वह निर्मीक 
योद्धा के समान युद्ध करता है, चाणक्य को कार्य-संचालन मे सलाह 


देता है, वहाँ अन्तिम अक में वह युद्ध करते हुए घबड्ञाता-सा है। 
' बिना शुरु के उसे अपने बल पर भरोसा नहीं । उसका व्यक्तित्व ही कुछ 


नहीं रह जाता | इन सब कारणों से चन्द्रगुप्त नायक का नायक प्रतीत 
नहीं होता । 


आत्म-सम्मान और वीरता 


चन्द्रशुप्त के चरित्र के केवल दो पहलू ही नाटककार ने हमारे 
सामने रखे हैं; पहली उसकी बीरता और दूसरा उसका प्रेम | पहले ही 
दृश्य में हम उसे सिंहरण की रक्षा के हेतु आम्भीक के विरुद्ठ युद्ध करते 
देखते है फिर तो जब चाहे तव उसकी युद्ध-कुशलता का परिचय मिल 
जाया करता है--कार्नीलिया के बचाने से, अपनी स्वतंत्रता के लिए, 


कन्द्युप्त [ १३९ 


फिलीपस से द्वंद्व-युद्ध आदि में | 
अपने भान का उसे पूरण ध्यात है। चाणक्य से वह कहता भी 
» आर्य, संसार भर की नीति और शिक्षा का अथ सेने केवल यही सममा 
कि आत्म-सम्मान के लिए सर सिटना ही दिव्य जीवन है ।? यह 
सेद्धान्त चन्द्रगुतत अपने जीवन में व्यवह्रात्मक रूप से रखना चाहता 
है उसी के लिए वह फिलीपस से दूंद्व युद्ध करता है, सिकन्दर से युद्ध 
करता है, अपने को स्वतंत्र रखता है ओर चाणक्य की रक्षा 
करता है । । 
आत्म-सम्मान के लिए वह चाणक्य को भी रुष्ट कर देता है, वह 
चाणक्य का नियन्त्रण राज्य-शासन में सहन कर सकता है। परच्तु 
पारिवारिक संबंधों में स्वतंत्र रहना चाहता है। 
“यह अल्लुण्ण अधिकार आप कैसे भोग रहे हैं ? केवल सातम्नाज्य 
का ही नहीं, देखता हूँ, आप मेरे कुट्ठम्ब का भी निय॑ं न्रण अपने हाथों में 
-रखना चाहते हैं ।? 
उसमे युद्ध करने की कुशलता है | उसने सिकन्दर ओर सिल्यूकस 
दोनों के विरुद्ध युद्ध किया था। वह सभी बातों को खूब ध्यान से देख 
सकता है | यवनों की रणनीति से भी वह खूब परिचित हा गया है। 
कब कहाँ पर क्या होनेवाला है वह श्रच्छी तरह जानता है | इन सब 
गुणों के होते हुए भी क्या चन्द्रगुत्त अच्छा राजा हो सकता है! वह तो 
केवल चाणक्य के हाथ की कठपुतली के समान चाणक्य के इशारों 
पर चलता है। अपने सेनापतित्व में उसते सिकन्दर को हराया; पर इस 
विजय में चाणक्य को अधिक श्रेय ढै--उसी की रणनीति, उसी की 
कार्य-कुशलता के कारण चन्द्रगुत्त को मगध से सहायता मिली, वह 
मालव के गणतत्रों का सेनापति चुना गया, उसीने युद्ध मे कहाँ पर 
कसा काम करना है, नियत किया हे, उसी के इशारे पर सिंहरण चन्द्र 
जुप्त के आधिपत्व में काम करता है। रे 
सिल्यूकस से जब युद्ध हुआ था उस समय वह अवश्य है चाणक्य 


) 04४ /ए* 


॥। 
हल्लटक 


4 


१४६ ] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटकः 


के शासन से मुक्त है। परन्तु उसके सभी कामों मे, उसकी बातचीत में 
एक प्रकार की विह॒लता मालूम होती है, वह स्थिर नहीं है कुछ घब- 
ड्रता सा है। चाणक्य के क्रोधित हो चले जाने पर--- 

“चन्द्र ०--जाने दो-(दीथे। निश्वास लेकर)--तो क्या में असस्थ 

हूँ ? ऊँह सब हो जावेगा ॥7? 
युद्ध स्थल पर--- 

“चन्द्र०--हैं ? सिंहरण इस प्रतीक्षा मे है कि कोई चलाधिकृत जाय 
तो वे अपना अ्रधिकार सोप दें । नायक ! तुस खड़ पकड़ 
सकते हो ओर उसे हाथ में लिए सत्य से विचलित 
तो नहीं हो सकते ? बोलो ! चन्द्रगुप्त के नाम से प्राण 
दे सकते हो? मैने प्राण देनेवाले वीरों को देखा है । 

चन्द्रयु्त युद्ध करता जानता है । और विश्वास रक्खो,. 
उसके नाम का जयघोष विजय-लच्मी का संगल गान 
है। आज से मे ही बलाधिकृत हूँ, मे आज सम्राट नहीं,. 
सैनिक हूँ ! चिन्ता क्‍या ! सिंहरण और गुरुदेव न साथ 
दें, डर क्या ! सैनिको सुन लो, आज से में केवल सेना 
पति हूँ ओर छुछ नहीं... .. ।? ेृ 
इतनी बड़ी हार जो सिल्यूकस को सहनी पड़ी उससे चाणुक्य का भारीः 
हाथ था। इन सब कारणो से हम चाणक्य को चन्द्रगुम का सूताधार 
कह सकते हैं। बिना चाणक्य के चन्द्रगुप्त का कोई अस्तित्व नही। 
ग्रेम 
प्रणयी के रूप मे चन्द्रमुत कसोटी पर नही उतरता | प्रथम अंक 
से तो हम यही समझते हैं कि करतंव्य-पथ मे दृढ़ होने के कारण वह इन 
पेस बन्धनों से दूर भागना चाहता है। परन्तु बाद में हमारी यह 
घारणा गलत मालूम होती है | स्नातक बनकर लौटने के बाद जब 
उसकी भेंट कल्याणी से होती है और कल्याणी कहती है, “परन्तु मुके 


चन्द्रमुप्त ] [ १३७ 


आशा थी कि तुम सुझे भूल न जाओगे? तब चन्द्रगुत उस बात का 
कोई उत्तर ही नहीं देता | वह यह कहकर बात दाल देता है, “देवि ! 
यह अनुचर सेवा के लिए डपयुक्त अवसर पर ही पहुँचा । चलिये शिविकाः 
तक पहुँचा दू 0१? 
दूसरी बार पर्वतेश्वर ओर सिकन्दर के युद्ध में जब कल्याणी और 
चन्द्रगुप्त मिलते हैं ओर कल्याणी अपने हृदय को खोलकर चन्द्रशुत 
के सामने रख देती है--वह मैदान में आई थी, “केवल तुम्हें देखने के 
लिए । में जानती थी कि तुम युद्ध में अवश्य सम्मिलित होगे और सुर 
अम हो रहा है कि तुम्हारे निर्वासन के भीतरी कारणों में एक मे भी हूँ? 
चन्द्रगुम फिर भी उदासीन है, “परन्तु राजकुमारी, सेरा हृदय देश की 
शा से व्याकल है | इस ज्वाला में स्खतिलता मुरका गई हे । 
कल्याणी---चन्द्रगुप्त ! 
न्द्गुघश---राजकुसारी, समय नहीं ॥?? 
क्या यह प्रणयी चन्द्रगुप्त है ! क्‍या उसके हृदय में कुछ भी सहानुभूति 
नहीं ! क्या वास्तव में उसे देश का इतना ध्यान है यदि ऐसा है तो 
मालव-युद्ध के समय वह मालविका का संगीत क्याँ सुनना चाहता हे? 
मालविका कहती है--- 
माल०--युद्धकाल है, देश में रण-चर्चा छिड़ी है । आजकल सालच 
स्थान सें कोई गाता-बजाता नहीं । 
०--रणभेरी के पहले यदि सघुर सुरली की एक ताव चुन लू 
तो कोई हानि न होगी | मालविका ! न जाने क्यों आज 
ऐसी कामना जाग पढ़ी है ।?? 
छोकरियों से बात करने का मना करने पर वह चाणक्य से कह ठता 
है, “आप चलिये से अभी श्राया” और फिर बात करने लगता हैं। 
क्या यह कतंव्य-ज्ञान है ? क्‍या सचमुच उसका हृदय दश की दुदशा 
व्याकुल है ? 
इसके पश्चात्‌ जब कल्याणी पव॑तेश्वर को सार चुकत पै हतो 


4१८ ] [ धसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 
मृत्यु का कारण बताते हुए वह चन्द्रयुत से कहती दै--यह पशु शेर 
अयमान करना चाहता था “परन्तु मोय्य कल्याणी ने वरण किया था 
केवल एक पुरुष को--चह था चन्द्रगुप्त |” चन्द्रगुप्त जन सोकर जामनग 
उठा हो | “क्या यह सच है कल्याणी ?? इस दृदव की अस्थपिर्ता को 
क्या कहा जा सकता है ! मालविका से वह प्रेम करता था | उसकी 
मृत्यु पर उसे दुःख भी हुआ परन्तु इसमें प्रेम के आदश की कमी थी | 
कार्नीलिया-प्रश्य॒ भी तो उसी समय चल रहा था | योदन ऊछे प्रवेश 
काल से वह सभी को प्रेम करना चाहता दे | इसी कारण नायक होते 
हुए भी वह हसारे हृदय को आकपित नहीं कर पाता क्योंकि इतना 
अस्थिर मनुष्य हमारी सहानुभूति ओर शुभाकाज्षाओं का पात्र नहीं हो 
सकता । 
चन्द्रगुप्त का चरित्र अंतिम अंक भे॑ अवश्य ही कुछ ऊपर उठा 
है। वह हमारे सामने एक न्याय-प्रिय राजा के रूप में उपस्थित होता 
है; परन्तु यर्हाँ सी चाणक्य अपनी कऋ्षमाशीलता में चन्द्रगुप्त से बहुत 
आगे बढ़ जाता है । प 
चाणक्थ--'से प्रसन्न हूँ वत्स ! यह सेरे अभिनय का दण्ड था । 
मेंने जो आज तक किया, वह न करना चाहिये था ; 
डसी का सहाशक्ति केन्द्र ने प्रायश्चित्त कराना चाहा। 
में विश्वस्त हूँ. कि तुम अपना कर्तव्य कर लोगे । राजा 
न्याय कर सकता है, परन्तु ब्राह्मण क्षमता कर सकता है 7? 


चाशुदय्‌ 
€्‌ 
अन्तद्ग द्व 
चाणक्य एक दार्शनिक का चित्र है| वह इस सिद्धान्त की रूपरेखा 


है कि मनुष्य के हृदय होता है। मनुष्य कितना सी क्रूर हो जावे, वह 
कितना ही नीतिज्ञ हो जावे, अपनी बुद्धि से सभी आकाक्षाओं को दबाने 


चन्द्रगुप्त | |; [१३६ 


वाला ही क्‍यों न हों जावे, परन्तु समय-समय पर उसके हृदय की 
रागात्मक प्रवृत्ति बाहर निकल ही पड़ती है | चाणक्य का चरित्र 
मस्तिष्क और हृदय का दंदढ्व है जिसमे मस्तिष्क हृदय को अ्भिभूत 
करना चाहता है| परन्तु छुृदय जैसे बार-बार बाहर निकलने का प्रयत्न 
-करता हो और जैसे कद उठता हो--“मैं अभी हारा नहीं--मै यहाँ 
हूँ |! यही दृ६ ही चाणक्य का चित्र हे। 
प्रसाद जी की महानता इस चरित्र के चित्रण में है। पुराने नाटकों 
से चाणक्य केवल मस्तिष्क प्रधान व्यक्ति ही हमारे सामने रखा गया 
था परन्तु इस नाटक में उसे हृदय भी दिया गया है। उसके मस्तिष्क है 
-और हृदय भी है। चाणक्य चाणक्य ही है उसके मस्तिष्क का 
हृदय पर शासन होना स्वाभाविक ही है | लेकिन कुछ भी हो चाणक्य 
मनुष्य भी तो है | वह हृदय को दवाता है परन्तु हृदय बार-बार ऊपर 
निकल ही पड़ता है | मस्तिष्क और छृदय के इसी इंढ में ही चाणक्य 
के चरित्र की मनोहरता है । घटनाश्रों के घात-प्रतिधात भे उसके चरित्र 
का विकास भी होता जाता है जहाँ प्रारंभ में सुवासिनी की कोमल स्क्ति 
ही उसके लिए सब कुछ थी-वहाँ अन्त में पूर्ण ब्राह्मणत्व में ही वह 
अनंत सुख का खुजन करता है| चन्द्रयुप्त नाटक की सभी घटनाओं 
का केन्द्र यदि कोई है तो चाणक्य | सिंहरण, अलका आदि सभी का 
-संवध चाणक्य से अधिक है। वही सभी को सलाह देता है, सबका 
मार्ग बनाता है। नायक तक का वह यज़घार है | अ्रतएव यदि नाठक 
का कोई नायक है तो चाणक्य ही; चन्द्रश॒प्त नहीं ओर यदि नाठक 
- का कोई नाम रखा जा सकता है तो चाणक्य ही । 


हृदय और मस्तिष्क 


तत्नशिला के गुरुकुल में वह एक शान्त प्रकृति का महात्मा है| 
-उससे न तो क्रोध है और न वह उसकी जगत प्रसिद्ध बुद्धि | वह केवल 
“एक ब्राह्मण है | 


१४० ] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक- 


“जो न किसी के राज्य में रहता है ओर 'न॒ किसी के अन्न से पलता 
है। स्व॒राज्प में विचरता है ओर अस्त होकर जीता है । यह तुम्हारा 
मिथ्या गये है) बाह्यण सब कुछ सामथ्य रखने पर भी स्वेच्छा से इन 
साया स्वूर्ों को ठुकरा दता है । मरकृति के कल्याण के लिए श्रपने ज्ञानः 
का दान देता है ।?? 
उस गुरुकुल में इतनी बडी घटना हो गई फिर भी उसे क्रोध न आया । 
केवल राष्ट्र का पतन ही उसे उत्तेजित कर देता है। किर भी वह शान्त 
प्रकृति का पुरुष है। परन्तु अद्ृष्ठ तो कुछ और ही सोचे बैठा था | 
वह अपने घर लोटता है; पिता के अपमान की बात सुनता है, शकदारः 
के साथ अन्यायपूर्ण व्यावहार की कहानी सुनता है और अपने हृदय 
की मूति सवासिनी के पतन का दृश्य ठेखता है | मनुष्य का उत्तेजितः 
होना स्वाभाविक ही है | बह क्रोधित हो उठता है, जल उठता है | फिर 
भी उसके हृदय की कोमल द्वत्तियों का श्रन्त नहीं हुआ । वह अपने: 
भग्त कुटीर के बाँस को सी जिसके चारों ओर उसके शैशव की स्मृतियाँ 
लिपट रही थी, उखाड़ कर फेक देता है। “शेशव की स्निग्ध स्मृति 
विलीन हो जा !” नंद के द्वार पर बह स्वाथ के लिए जाता है, परन्तु राष्ट्र 
की भलाई का प्रश्न छिड़ गया । परमाथ के लिए, राष्ट्र के लिए उसने 
राजा से विनय की लेकिन उसका अपमान हुआ | क्रोधानल ओर भी 
भड़क़ गया | वेकुसूर बदी बनाया गया । अब भी प्रेम | अब भी दया 
उसके ऊपर कोई भी दया नहीं करता--बह क्‍यों किसी पर दया करे | 
वह शपथ लेता है, “दया किसी से न साँगूं गा ओर अधिकार तथा 
अवसर सिलने पर किसी पर न करूँगा ।!? असी सी वह सीधा ब्राह्मण ही 
है | अपने बचाव की सोचता है पर कोई युक्ति नहीं निक्राल पाता ।' 
कारागार मे जलना भ्रु जना लगा है। हृदय के कोमल भावों को दबाया: 
जा रहा है परन्तु सस्तिष्क का कोई भारी कार्य नहीं हो रहा है। 

“खीर की राति भी अवरुद्ध है, शरीर का फिर क्या कहना 
परन्तु सब से इतने संकल्प ओर विकल्प ! एक बार निकलने पाता 


च्वन्द्रगुप्त [ ३४१ 


तो दिखा देता कि इन दुर्बल हाथों में सान्नाज्य उलदने की शक्ति है 
और ब्राह्मण के कोमल हृदय में कतेव्य के लिए प्रलथ की ऑघी 
चला देने की भी कठोरता है । जकडी हुई लोह ःटंखले ! एक बार 
तू फूर्लों की साला बन जा और में सदोन्मत्त विलासी के समान तेरी 
सुन्द्रता को भंग कर दूं | क्या रोने लगू ? इस निष्ठुर चंत्रणा की 
कठोरता से विलबिलाकर दया की भिक्षा साँयू ! मॉगू कि 'सुझे 
भोजन के लिए एक सुथठी चने जो देते हो, न दो, एक बार स्वतंत्र 
कर दो ?? नही, चाणक्य ! ऐसा न करता ! नहीं तो तू सी साधारण- 
सी ठोकर खाकर चूर-चूर हो जानेवाला एक वासी हो जावेगा | तव 
में थ्राज से प्रण करता हैँ कि दया किसी से न माँगूं गा, और 
अधिकार तथा अवसर मिलने पर किसी पर न करूँगा ( ऊपर 
देखकर )--क्या कभी नहीं ? हॉ हाँ, कभी किसी पर नहीं । में अलथ 
के ससान अवाब गति और कर्तव्य में इन्द्र के सम्नान भयानक 
बने गा !?? 
चाणक्य--पमुद्राराक्षस के चाणक्य का जन्म-सा हो रहा है। 
चाणक्य छुटकारा पा लेता है | भव उसके हृदय नहीं, दया न 
चह किसी से माँगेगा और न अधिकार मिलने पर किसी को देगा । 
उसका मस्तिष्क खूब काम कर रहा है | चन्द्रगुत द्वारा वह सिकदर को 
पराजित करता है--मालवा में उसकी विजय होती है। गणतंत्रों को 
एकत्रित कर चन्द्रगुप्त को सम्मिलित सेना का महाबलाधिकझृत बनाने से 
उसकी कुशलता का सुन्दर चित्र मिलता है| उसकी बुद्धि को देखकर 
हम चकित हो रहते हैं | राक्षस को चाज्ञाकी से रोककर वह मालव की 
सेना की सहायता लेता है| कब्याणी को भी उसके प्रेम की याद दिला- 
कर---राजकुमारी तुम्हारे जाने से “/डसका असीम प्रेमपूर्ण हृदय भग्त 
हो जावेगा” रोक लेता है| कुशलता से राक्षस को फोड़ना चाहता है । 
मगध में पड़यंत्र रचाता है, विद्रोह फैलाता है; और अन्त मे मगध का 
राज्य हस्तगत कर चन्द्रयुप्त को सिंहासन पर विठाता है। कहाँ पर क्या 


१४२ ] [ प्रसाद के तीन ऐसिहासिंट नाटक 


ट् के ता | | छापनी सम्दता के लिए थे 
हो रहा दे इसका पूण ध्यान रखता ४ | अपना सम्बना | लिए, बह 
+ | #य 


85% कं, 22६ || सम क अन्न कक कर किकीफ, खिन्‍्मक-कनरमड़ 
भत्ते ओर घुरे का विचार नहीं #रता ओर सफखता अमसे उस्ता झंशु्ा 


| 
रू 
५ + ८ 4, १ 


पर नाचती हो | "चाणक्य सिद्धि देसता शै--साथन चाहे केसे ही शी! 
मस्तिष्क का हृदय पर अधिकार हो गया | 

लेकिन यह परिवर्तत क्यो हुआ ? घद्नाओं के कारण, चन्द्र न्‍ग 
क्ररता से पाडित होकर--विउ्क्तियों के आदल से। "पौधे प्रंधकार में 
बढते हैं शोर मेरी नीतिलता सी उसी भॉति विपत्ति त्म में लहलहीं 
होगी ।? दाण्डायन के सहुपदेश से “चाणक्य ! नुस्कों तो कद द्विनों 
तक इस स्थान पर रहना होगा, क्योंकि सब दिया के छाचार्य होने पर 


भी तुम्हें उसका फल नहीं सिला-डउद्देंग नहीं मिटा | झभी लक 
तुम्द्दारे हृदय में हलचल सची है, यह ध्वस्था सन्‍्तों पजनक नहीं ।?? 

परन्तु छदय मृतग्राय भत्ते ही हो जावे मरता नहीं । उुवासिनी, कुसुमपुर 

का स्वर्गीय कुसुम अभी भी अपनी स्पृति से मानस मे वरंगे उठा ढेता है। 

सामने कुसुमपुर को देखकर उसकी स्मृतियाँ फिर हरी भरी हो जाता हैं । 

“वह सासने कुसुसपुर है, जहो मेरे जीवच का प्रभात हुआ 

था। मेरे उस सरल हृदय से उत्कट इच्छा थ्री कि कोई भी सुन्दर 

मन सेरा साथी हो । अत्यक नवीन परिचय में उत्सुकता थी और 

डसके लिए सन से सर्वेस्व लुटा देने की सन्नद्धता थी । परन्तु संसार-- 

कठोर संसार ने सिखा दिया कि तुम्हे प्रखना होगा। समझदारी 

आने पर योवन चला जाता है--जब तक मसाला गू थी जाती है त्तव 

तक फूल कुम्हला जाते है। जिससे मिलने के सस्सार से इतनी घूस- 

धाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आमने तक मलुप्य हृदय को 

सुन्दर ओर उपयुक्त नहीं बनाये रह सकता। मलुप्य को चंचल 

स्थिति तब तक उस श्याश्षल कोसल हृदय को सरुभुृसि बना देती 

है। यही तो विपम्तता है। सै---अविश्वास, कूट्चक्त और छुल्ननाओं 

का कंकाल; कठोरता का केन्द्र ! आह तो इस विश्व में सेरा कोई 

सुहद नही ? है, मेरा संकल्प; अब मेरा आत्माभिसान ही मेरा 


चन्द्रगुप्त | आह 


सित्र है। और थी एक क्षीण रेखा, वह जीवन-पट से धुल्ल चल्नी है | 
धुल जाने दूं ? सुवासिती ! न न न, वह कोई नहीं। में अपनी 
प्रतिशा पर आसक्त हूँ । भयानक रसणीयता है। आज इस गतिक्ञा 
में जन्सभूमि के प्रति कत्तैब्य का भी थोवन चम्रक रहा है। तृणशैया 
पर आधे पेट खाकर सो रहनेवाले के सिर पर दिव्य यश का स्वर्ण 
मुकुट | और सामने सफलता का स्घृति सोध |?? 
कितना स्पष्ट अन्‍्तद्वद्व है | सुबासिनी का ध्यान विजय-लक्ष्मी से 
भरा जा रहा हे--वही विजय लक्ष्मी जिसके लिए मनुष्य को कठोर 
बनना पड़ता है--अ्रपनी कोमल वृत्तियो का दमन करना पड़ता है | 
चाणक्य भी वही करता है। कब्याणी प्रेम-वेदी पर बलिदान दे देती 
है, परन्तु उस ब्राह्मण के मुख पर एक क्षीण दुश्ख की रेखा भी नहीं-- 
वह प्रसन्न ही है| 
“चाणक्य--चन्द्रमुघ आ्राज तुम निष्कण्टक हुए । 
चन्द्र ०--गुरुदेव इतनी क्र रता ! 
चाणक्य--महत्वाकांच्ा का मोती निष्ठुरता की सीपी में रहता हे ।? 
तो क्‍या सचमुच सुवासिनी विस्मृत हो गई | नहीं। हृदय मरता नहीं, 
मृतप्राय हो सकता है। सुवासिनी से फिर भेंट हुईं। स्मृतिलता फिर 
लहलहा उठीो-- हे 
“चाणक्य--में तुमसे बाल्यकाल से परिचित हूँ, सुवासिनी ! ठुस; 
खेल में भी हारने के समय रोते हुए हँस दिया करतीं 
ओर तब में हार स्वीकार कर लेता । इधर तो तुम्हारा 
असिनय का श्रभ्यास ही बढ गया है ! तब तो...... 
( देखने लगता है ) 


सुवासिनी--यह क्या विष्णगुछ्ठ, ठुम्त संसार की अपने वश से करने 
का संकल्प रखते हो ! फिर अपने को नहीं ? देखो 


ये 
अन्क- 


दर्पण लेकर--तुम्हारी आँखों सें. यह कौन सा 
चित्र है ! 


59४४ ] [ भसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


प्रस्थात 
चाणक्पय--क्या ? सेरी दुबंलता २ नहीं ।?? 
कितना सुन्दर चित्र है | समय ने फिर परिवतन कर दिया। सुवासिनी की 
उपेज्षा ने उसके हृदव को तोड़ दिया-- चब्द्रयुतत के व्यवहार ने उस 
बिरागी ववा दिया | उसने सब कुछ छोड़ देते का संकल्प कर लिया | 

“अन्द्रगुप्त | से ब्राह्मण हैँ । सेरा साम्राज्य करुणा का था. सेरा 

धम्त प्रेस का था। आनंद समुद्र से शांतिद्वीप का अधिवासी त्राह्मण 
सें। चन्द्र, सूथर, नक्तन्न सेरे दीप थे, अनन्त आ्राकाश विताब था, शस्य 
श्यामल्वा कोसला, विश्वस्भरा मेरी शेय्वा थी । बोद्धिक विनोद कर्म्म था, 
सन्तोष धन था | उस अपनी, ब्राह्मण की जन्म्भूमि को छोडकर कहाँ झा 
गया ! सोहाद के स्थान पर कुचक्र, फूर्लों के प्रतिनिधि कॉटे, प्रेस के स्थाद 
में भय ! क्लानास्त के परिवर्तन मे कुम्ंत्रणा । पतन ओर कहाँ तक हो 
सकता है ! ले लो सौय्य चन्द्रगुप्त | अपना अधिकार छीन लो । यह सेरा 
पुनर्जन्म होगा ! यह सेरा जीवन राजनेतिक कुचक्नों से कुत्लित और 
कलंकित हो डठण है । किसी छाया-चित्र, किसी काल्पनिक महत्त्व के पीछे 
अम्न॒पूर्ण अनुसंधान करता दोड़ रहा हूँ. शान्ति खो गई, स्वरूप विस्मृुत 
हो गया ! जान गया में कहाँ और कितने नीचे हूँ !?? 

सुवासिनी जो स्वयं अपने को देने आई थी उसी सुवासिनी को सी 
छोड़ दिया -- 

“सुवाखिनी ! वह स्वप्न टूट राया । इस विजन बालुका सिंछु से एक 
सुधा की लहर दोड़ पड़ी थी, किन्त तम्हारे एक ही अआ-भंग ने डसे लौटा 
दिया ! से कंगाल हूँ ॥? 
फिर सी उस विरागी के आँखों मे आसू थे--सुवासिनी के शब्दों ने 
उसे एक बार फिर विहल कर दिया | परन्तु अपनी प्रतिज्ञा पर आसक्त 
ब्राह्मण के लिए अब कुछ उपाय न था। उसे अपने ब्राह्मणत्व की उप- 
लब्धि से ही अनंत सुख का सूजन करना था | 

सुवासिनी--(दीनता से चाणक्थ का मुंह देखती है)--तो विष्णु- 


« चन्द्रशुघ्त | 


[ १४६ 


गुप्त, तुम इतना बड़ा त्याग करोगे । अपने हाथों बनाया 

हुआ, इतने बड़े साम्राज्य का शासन, हृदय की 
० ३० 

थ्रार्काज्ञा के साथ अपने प्रतिद्दन्द्दी को स्ोप दोगे ! 

ओर सा भी मेरे लिए ! 


] ८ कु 
चाणक्य--(घबड़ाकर)--म बडा बिलस्ब कर रहा हूँ । सुवासिनी, 


आा दाण्शयन के आश्रम में पहुँचने के लिए में पथ 
भूल राया हूँ | मेघ के ससान मुक्त वर्षा सा जीवन-दान; 
सूथ के समान अवाध आलोक विकीर्ण करना; सागर 
के रूमान कामवा-नद्वियों को पचाते हुए सीमा के 
बाहर न जाना; यही तो बाह्मण का आदुश हे ! सुस्े 
चन्द्रगुप को मेधसुक्त चंद्र देखकर इस रंगम्न॑च से 
हट जाना है ! 


सुवासिनी--महापुरुव | में नमस्कार करती हूँ ! विष्णगुप्त, तुम्हारी 


बहिन तुमसे आशीर्वाद की भिखारिन है । ( चरण 
पकडती है ) 


चाणक्य--(सजल नेंत्र से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए) सुखी 


रहो ।?? 


प्रथम अंक का ब्राह्मण अन्तिम अंक के ब्राह्मण में आ गया है-- 
“पूँ आज जैसे निष्काम हो रहा हूँ। विदित होता है कि आज तक 
जो कुडु किया वह सब अम था, खुख्य वस्तु आज सामने आई । आज 


सुझे अन्तगिहित, आह्यणत्व की डपलव्धि हो रही हे 


(22 


यही इस विकट चारत्र का सक्तिप्त इतीहास है, सुन्दर चित्र है, 
अनुपम प्रदर्शन दें । 


१७० 


उपलहार 
प्रसाद की नास्यक्ला ओर उनके मुख्य नाटकों वा हम अध्ययल 
कर चुके हैं| नाटकों के अध्ययन में हम केवल घटना-संगठन ओर 
चरित्र ही देख सके हैं | अतएव यहाँ पर रुक्षेप म उनके आद्शों का 
विवेचन किया जा रहा है | नाटककार राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत 
था ।आधुनिक सारत में कुछ सी स्पृहणीय नहीं श्रतएव संसार में भारत 
की महानता स्थापित करने के लिए अपना कुछ भारतीत्व बताने के 
लिए उसे पाठकों को पूव युगों से ले जाना पड़ा है क्योंकि ये ही युग 
हमारे गौरवपूण इतिहास के चित्र हैं| प्रसाद जी इन चित्रों को उपस्यित 
करने में पूण सफल हुए हैं। साथ ही उनका उद्देश्य आज के पतित 
देश वासियो का अद्श संगठन रहा है और इसीलिये उनका ध्यान 
इतिहास की ओर विशेष रहा है| प्रसाद जी ने स्वयं ही अपने उद्देश्य 
को विशाख की भूमिका में व्यक्त किया है--इतिहास का अनुशीलन 
किसी भी जांति को अपना आदर्श संगठित करने के किये अत्यंत ज्ञाभ- 
दायक होता है... . क्योंकि हमारी गिरी दुशा को उठाने के लिये हमारे 
जलवायु के अनुरूल जो हमारी अतीत सभ्यता है, उससे बढ़कर उपयुक्त 
ओर कोई भी आदर्श हमारे अनुछूल होगा कि नहीं इसमें मुझे 
पूर्ण सन्‍्देह है.... मेरी इच्छा भारतीय इतिहास के अभ्रकाशित अंश में 
से ड्न बेसन लत अं का दिग्दिशंन कराने की हे जिन्होंने कि हमारी 
चतमान स्थिति को बनाने का बहुत कुछ अयल्न किया है ।? सम्भवतः 
इसीलिए. उनका ध्यान इतिहास की ओर विशेष रहा है। प्रसाद के 
“नाटकों को साहित्य की वस्तु समझकर हस उनके इतिहास को भूल 
जाते हैं परन्तु जैसा हम वस्तु-विवेचन करते समय बता आये हैं, उनके 
'लिए इतिहास का स्थान मुख्य है साहित्य का गोण; और यह इतिहास- 


उपसंहार | [ १४७ 


प्रेम देश-प्रेम का ही एक रूप था | उसमें अपनत्व बताने की चेष्टा थी। 
अतएव प्रसाद जी को केवल सादित्यिक समझना अन्याय होगा क्योंकि 
इस रूप मे उनकी रचनाएँ अ्धिक्र सफल नहीं हँ।पर देश-सेवा मे सलग्न 
नेता के रूप मे वे हमारी राष्ट्रीय भावनाओं को जाग्रित करने मे जितने 
सफल हुए हैं उतना हिन्दी का कोई भी लेखक नहीं। प्रेमचंद जी 
आधुनिक भारत की ठयनीय दशा का चित्रण कर हमारे हृदय से 
निराशा ही उत्तन्न करते हैं | मेथिलीशरण गुप्त जी ने अवश्य ही अपने 
काव्यों में प्राचीन मारतीय सस्क्ृति का चित्रण क्रिया है, परन्लु उनमें 
आधुनिकता का प्रभाव इतना अधिक है कि गुप्त जी न तो प्राचीन- 
काल के ही चित्र दे सके हैं और न अ्रांधुनिक काल के | नैराश्यपूण 
वर्तमान और भविष्य में प्रमाद जी के आशावादी नाटक राष्ट्रीय 
आन्दोलन को अग्रतर करने के अनुपम साधन हैं। मातृगुप्त की ये 
पक्तियाँ हमारे उत्साह को आपसे ही आप बढ़ाती हैं-- 

“वहो है रक्त, वही है देश, वही साहस है वैसा ज्ञान । 

चही है शांति वही है शक्ति, वही हम दिव्य आय संतान । 

जियें तो सदा इसी के लिए यही अभिम्नान रहे यह हप॑ । 

निछावर कर दे हम सर्चध्व हमारा प्यारा भारतवर्ष /!? 
आधुनिक साम्प्रदायिकता में ही हमारा अवसान है-- 

“तुम मालव हो ओर यह सगध । यही तुम्हारे मान का अवसान 
है न ? परन्तु आत्मसम्मान इतने ही से सन्‍्तुष्ट नहीं होगा । समालव 
ओर सगघ को भूलकर जब तुम आर्य्यावर्त का नाम लोगे तभी वह 
पमिलेसा 77 

+चन्द्वगुप्त 
राष्ट्रीय नेता की इन नाटकों में देश की स्वतंत्रता के लिए पुकार है, 
वर्तमान के लिए आशा है और भविष्य के लिए सुखढ सन्देश | हम 
पश्चिमीय आदशों की ओर झ्ुके जा रहे हैं, उनमे नवीनता पाते हैं, 
परन्तु ये सब आदर्श हमारे भारतवपष की ही तो देन हैं-- 


डपसंहार ] [ १४६ 


उनके नाटक क्‍या महत्व रखेंगे ! नाटकों का विवेचन करते हुए. हम 
देख आये हैं कि प्रसाद जी घठना-संगठन में सफल नहीं हो सके है। 
उनके कथानक बढ़े जटिल और विस्तृत हैं ओर इस दृष्टि से प्रसाद जी 
उत्तम माव्ककार नहीं कहे जा सकते । चरित्र-चित्रण में भी वे सफल 
नहीं हो सके है| उनमे प्रतिमा थी देवसेना, स्कन्द, चाणक्य आदि 
कुछ चरित्र उन्होंने इतने सुन्दर चित्रित किये हैँ कि इनके कारण 
उनकी कृतियाँ अमर रहेगी, परन्तु घटना विस्तार और पात्र-आधिक्य 
के कारण अन्य चरित्र उत्तम नही हो सके हैं । इस दशा में प्रसाद जी 
की रचनाएँ शायद भविष्य मे उतनी आदरणीय न हो सके जितनी वे 
आज हैं। 

प्रसाद के नाथ्क उनकी भावुकता के कारण भी पठनीय रहेंगे । 
शेक्सपियर के समान उनकी उक्तियाँ सभी के सुंह पर रहेगी। ये उक्तियाँ 
प्रसाद जी की भावुकता, कल्पना, शब्द-सोष्ठव और रसात्मकता से 
पूर्ण है| वे हमारे लिए. नीति का मार्ग भी निर्धारित करती हे । 

“इखती हूँ. कि आयग्रः सलुष्य दूखरों को अपने सा पर चलाने के 

दु कर देता है ।?? 
--चन्द्रगुप्त 

“मनुष्य अपनी दुर्बलता से भली भॉति परिचित रढता है उसे अपने 

बल से भी अवगत होना चाहिए ४? 


ही 


लिए रुक जाता है ओर अपना चलना च॑ 


“चन्‍द्वरंजुद्ध 
“मन्यति सज्ञायों रो भी अदल हे ।?? 

“-+चन्द्रगुछ 
“महच्वाक्ांचा का दोती निष्ठरता की झीपी में रहदा हे 2? 

“+घपनद्युद्ध 


“स्सूति बची निप्दुर है? “यदि भस ही जीवन है दो संसार ज्याला- 


+वबब्दझुघ 


३४० _ [ असाद के तीन एतिहासिक बाट 


भावुकता और रचना-विधि मे ये निम्न पंक्तियाँ कितनी सुन्दर हैं। 

“समझदारी आने पर थयोवन चला जाता है--जब तक साला यूं थी 
जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं जिससे मिलने के सस्मार में 
इतनी धूमधाम, सज्ञावट, बनावट होती है, उसके आने तक सनुष्य हृदय 
को सुन्दर ओर उपयुक्त नहीं बताये रह सकता 7? 

+चन्द्रगुप्त 

अनेको उदाहरण उद्धुत किये जा सकते हैं| रसात्मकता ओर मुख्य 
'चरित्रों के मनोवैज्ञानिक चित्रण के कारण साहित्य से प्रसाद के नाव्कों 
का स्थान सदेव ही ऊँचा रहेगा | 

आधुनिक नाटककारों मे तो संख्या ओर रचना की दृष्टि से 
इनका स्थान सर्वोच्च है। क्योंकि अभी तक उग्र जी का महात्मा ईसा 
छोड़कर ओर कोई अन्य प्रसाद के नाटकों के समान सुन्दर रचना 
देखने मे नहीं आई । सुदर्शन जी का अंजना? साषरा ओर काव्य की 
दृष्टि से बहुत सुन्दर है परन्तु कथा-संगठन ओर चरित्र-चित्रश में वह 
अधिक सफल नहीं | माखनलाल जी का “कृष्णाबु न-युद्ध/ अवश्य ही 
कुछ सफल कृति है, परन्ठु वह प्रसाद के नायकों के समक्ष नहीं रखी 
जा सकती | 

असी कुछ वर्षों से आधुनिक नाटठककारों ने यथाथवाद को ही 
अपना क्षेत्र बनाया है। इन पर इव्सन, गेल्सवर्दी वा वर्नाडंशा का 
पूरा प्रभाव है परन्तु इससे हसे इन पश्चिमी-नाट्ककारों के समान 
जीवन की गहराई का चित्रण नहीं मिलता | प्रसाद जी इस समूह से 
अलग हैं। 

भविष्य से क्या होगा ? यह तो भविष्य के गर्स में ही है। परन्तु 
इतना अवश्य कहा जा सकता है कि प्रसाद के चायक उस समय भी 


साहित्य की देन ही रहेगे, यद्यपि अभी तो नाटकों का भविष्य ही 
सन्देहात्मक है । 





अलुक्रमणिका 


अशिमानंद २१ 
अजातशत्रु (चरित्र ) ३७, ४०, ९४५ 
६६, ६७, ६८; ५६, ७०, ७९; ७२, 
७३. ७४, ७४--७८ व्य्१ 
अजातशत्र॒ (नावठक) ११, १९, 
२०, २१, २४, २६, २७, रे८, २३; 
२७, ४४, ४६. ४५ ६१ 
दार्शनिक पृष्ठभूमि ६३--७१; केथा- 
संगठन ७१--७३; चरित्र-चित्रण 
७३--७५; नायक ७४---७४५ 5४ 
अनन्तदेवी ३८, ८०, ८६, ६.४५ ६६७ 
१०२, ११६, ११६, १२६, 


अलका २३, ४६, १९५५ १९८; 
१३२, १४१६ 
आम्मीक १२५, १२६, ६९८, 


१३१, १३२, १३४ 
उग्र (वेचन शर्मा) १५४० 


उत्तर रामचरित ३,६५६ 

उदयन ४६, ४०, “-५% ६६, 
रे 

उबंशी २० 


एक घूंट २० 


एस्क्विथ ढरे 

ऐलिजावेथ कालीन नाटक ८; १७; 
श्व्य 

कमला १२२ 

कर्णालय २०, २४ 

कपू रमंजरी ३, ४ 

कवे महोंदय २१ 

कल्याणी १२३, ४१३८, ६६३; 
१३२, १३६, १२७; ११८, १४१; 
१४३ 

कासना २० 

कामायनी ६6८ 

कार्नीलिया २५५ ५४६, १३९, ६३४ 
श्श्‌८, 

कारायण 5६७ 

कालिदास र५ ' 

कणीक ७१, ८० 

कुमारगुप्त 5९, ८४७ व 
६६, ११७ 

गिरीशचन्द्र बीप < 

गेल्सवर्दी ८, १५४० 

गोपाल चद्ध * 

गोपालराम गहमरी ६ 


६६९; 


१४२ ] 


' गोविन्द शुत्त १०५, १६७ 
गोतम १२, २४१; २६, ४९, ४४. 
६४, दल, ६६, ७२, ७४, ७६, ७८; 
७६. ८50 
चक्रपालित ५४६, ८५, ६०, छ८, 
६€, १५०१, ५०३, १९१ 
चंद्रशुप्त (चरित्र ) २३, २४, २६, 
२६, १०३, १२४; १२८, १२६, 
१३०, १२१, ११२ 
विकास १३२; आत्म-सम्मान ओर 
वीरता १३४--१३६; प्रेम ११६-- 
श१श८; १३१६, १४१, १४३, १४४ 
चन्द्रगुप्त नाटक ) ११,' १३, १४, 
१७, २०, २१, २४, २५, २६, 
२७, २८, २६, ३०; रे४, २५, २५४, 
५६, ६१, ८२ रचनातिथि १२३--- 
१२४; राय बाबू का १२४--१२६; 
कथा-संगठन १२६--१३० ; 
चरित्र-चित्रण १३०--१४४; 
चाणक्य १३, २३, २६, ३२५, २३७, 
७५, १२९४, १२६, १२६, १३०, 
१३२, १२१२, १३४, १२५७, १२६, 
१३७ अन्‍्तह्वद् ११८---१३२६; हृदय 
ओर मस्तिष्क १३६---१४५ 
चित्राधार १६ 
छुत्रसाल॒ ६ 
डेलना १२, शृ८, ३२६, ४०, ४८५ 


[ असाद के तीन ऐतिहासिक नाटक 


६७, ६६, ७१, ७२, ७६, ७८ 


जनमेजय का नागयज्ञ २०, रेए; 
श्पू 

जयचंद २१ 

जयद्रथवध रश्‌ 

जयमाला ६४, १०४, ६००, 


१०६, ११०, ११४ 
जरत्कारू २०, ३५ 
जीवक छद 
दास्डायल २६, ४१, १२५, १२६, 
श्ड२, १४५ 
द्वापर 
ट्विजेन्द्रलाल राव ६, ६, 
२०७ ३१५ ३७, 
श्र्प्‌ 
द्विवेगी युग ६ 
दुर्गादास ६ 
देवकी १६, २३, रे८, ६१, ८८, 
६२, ६४, १०५, ११८, १२२ 
देवदत्त ३६, ६६, ७२, ७३, ७८, 
छ६्‌ 
देवसेना 


र्२ 
२७; 


४८, १२४; 


२११५, १०, १६; २३, रे४, 
३८, २६, ४६, ५६, ५४७, ६१, 
८६,६४, १०४, १०५, १०६, 
१२०; संगीत और ग्रकृति १०७-- 
१०८; प्रेम १ ०८प---६१०६ ; 

कारुण्य १०६--११०; त्याग ११० 


अनुक्रमणिका ] 


११३; काव्य ११३--११४; वैराग्य 
११४--१ १५४, १२०, १४६ 
धाठुसेन २५, ८५, ६२ 
भ्र्‌ वस्वामिनी ८२ 
नन्‍द २४, ४६, १३१, १३२, १४२ 
नहुप 9४ 
नांगानंद ३, ६ 
नाटक, भारतीय १--८ 
संस्कृत २--श्द 
परणदत्त ८४, ८५, ८६, ८६, ६०, 
- ६४; ६७, €॒८ 
पद्मावती ३६, ४०; ४०, ४४, 
द्६, ७२, ७३, ७६ 
परवतेश्वर ११८; १३१२, १२७ 
पारसीक नाटक कम्पनी ६, ४४ 


ऊर्ेंगुत ८६, ६३, ६७, ६€, १ ०१९, 


१५१८, १२१, १२२ 
सु १२५५०, १२६ 
प्रपंचबुद्धि ८८६, ८७, द८, 
११८, ११६, १२० 
असाद और देश-प्रेम २१--२६, 
१४६--१४७; में पूर्व और पश्चिम 
८--११; और इतिहास प्रेम २७ 


“३०, १४६; काव्य ३०, ६१४७, 
१५०, की नाट्यकला के 
मूल तत्व. २१--४०; और 


< छ 
संस्कृत नाटक १६--२३; दाश- 


[ १४३४ 


निकता ३१--३२७ चरित्र-चित्रण 
३७--४०; नाटक ३६-- रे८; स््री- 
पात्र $८६---३६; अन्य पात्र ३६; 
कथोपकथ्न ४०--४४; पत्र का 
प्रयोग ४४--४८; स्वागत ४८ं-- 
४६; संगीत ५०--६२ आदर्श १४६ 
---१४८; भविष्य १४६---१५० 
प्रसेनजित २७, ६६, ७२ 

प्रेमचंद २२, १४७ 

पोरस श६ 

पृथ्वीसिन ८४५ १०२, ११६, ११७, 
श्श्दर 

बद्रीनारायण ५४. 

बन्घुवर्सा २३, ३०, ६६, १०१; 


*्‌ ०२, १ ०५, * ०६, १ १५४, 
8१५ 

बन्धुल्ल॒ ६६ ः 

बाजिर ४६, ७०; ७२, ७८ 


बालकृष्ण भट्ट ६3 ४४ 
बाल रामायण रे; ४ 

बिंबसार १२; १३ हेरे; ४६५ १९, 
६६, ७२, ७८, ७६ 

बुद्ध ( गौतम के अन्तर्गत देखिये ) 
भठाक १३, पड; ८5, मात प्प्६, 


छे 


६२३. €४, ६६५ ६4 0 २५ # दे 54. 
१०४ अभिमान  # १६--६ ६७; 


महत्वाकांचा १६१७--१ ६४ अस्ध- 


3%४ | 


विश्वास 
१२०--१२ १; कत्तव्यनिष्ठा १२१ 

संस १२१-१२२ 

भट्ट (श्री) ३ 

भवभूति ३ 

भारत भारती २२ 

भारत सोभाग्य प्‌ 

भारतेनुु ५, ४४ 

काल ५, ८, २१ 

भीमससेन ८४ 

मल्लिका १६, ३२८०, ५४, ६६, ६८, 
१०, ७२, ७४, ७८, 

महाभारत ३, ७ 

महाराणा प्रताप ६ 

महावीर चरित ३, ६ 

माउनलाल चतुर्वेदी ४४, १५० 
मागन्धी १२, ३८, ४६ 7४, ६६, 
६७, ६८, ७२, ७३ ७७ 

मातृशत ३१, ३३, 


४२, ए्र८, 
६२, १४७ 
सालती माधव ३ » 
मालविका ३६, ६२ ९२६, १३०, 
९३१, १३ ४ ९२७, श३८ 
सालविकाग्ति ३ 
मुदृगल ३३ ६२ 
उद्वाराज़्स ३, १४, १४१ 


भसाथलीशरण मुप्त टिक हक । १४७ 


[ प्रसाद के तीन ऐतिहांसिक नाटक: 


११६--१२१०; कइंतज्ञता मोंटठेग्यू. ६४ 


मच्छुकाटेंक ३, ६ 

समुद्रगुत ४०, ७छए 

सजन १६, २० 

सत्यनारायण ६ 

साकेत २२ 

सिकन्दर २५, २६, २६, १ २४, 
१२४५, १२६, १२६, १३०, १२५. 


१३७, १४१ 

सिडने श्८ 

सिंहइरण ४६, १२७, श्र, 
९३१, (३२, ९३४, १३५. 
११६ 

सीताराम & 

सुदर्शन १५० 

सखवासिनो ३८, प्रप्‌, ६२, 
श्श२्‌, ९४०, १४३, १४४, 
श्ड्पू 


संस्कृत नाटक---इतिहास २---४$ 
से कारुएय ६--१४; मे प्रकृति 
वर्णन १४--१४; में चरित्र चित्रण 
१९१४--१६; से काव्य १७ 
स्कन्दगुप्त (चरित्र) ११ न्‍ 
२४, ३०, ३३, 
७४, रहे, ८४, ८4, ८६, दूप,. 
€० €२, ६३, ६४, ६६, 
१०९; लालसा और कर्तव्य ६६... 


९४, र्‌ ३. 
२७, ४२, ४६, 


अनुक्रमणिका |] 


०२; देशप्रेम ओर विवेक १ ०२-- 
१०४; प्रेम, १०४--१०६; १०६, 
' ११४, ११५, ११६, ११७, १२०, 
५१२१, १२ ९, १४६ 
स्कन्द्मुत्त (नाटक) *्‌ 
(१७, ११, २४, 
३०; ३२३२, २४, ५५, ५६ 
केथा-संगटन ८२--६२; चरित्र- 
चित्रण ६२--१२२; १२४; १४६ 
शकटार ४२, १३१, १३२, १३३, 
प ३४, १४० 
कुन्तलला ३, ४ 
नाग दल, ८६, ११७, ११८, 
११६, १६० 
शॉ ८, १५० 
शूद्रक (औ) ३ 
राजेश्वर ३ 
राज्य श्री २०, २४ 
शेक्सपियर ८, ११, १२, १७, 
१८, २०, १४८ 
शैलेन्द्र ४४, ७७ 
श्यामा १२, २१६, ४५, ४५; २४; 
दर्द 
श्रीनिवासदास ४ 
यशोघरा २२ 
यूनानी नाठक २ 


२० $ 


[ १६९ 


रण॒धीर प्र ममोहनी ४ 

रलावली ३; १६ 

राधेश्याम कथावाचक ७, ४४ 
राधाकृष्णदास ६ 

रामकृष्णु वर्मा ६ 

रामा ५०, ६१, ६२ 

राक्षस ५६, १२७, ११२, १४१, 
रूपनारायण पाडे ६ 

लक्ष्मणसिंह ४ 

वासवदतता ७३ 

वासवी १६, २३, २३, ३८, २६, 
४०, ४४) 5५, ६६, ९६९, ७१, 
७२, ७५, ८१ 

विक्रमोवंशी ३ 

विजया ३१८, ४९, ५६, ६०, ८६५ 
८६, ६४, १०४, १०४, 
१०६, १०७, १०८, १०६, ११०, 
१११, ११२, ११४, ११५ 
विशाख २० 

विशाखदत्त ३ 

विरुद्क १२, ५४. ५८, ६६, ७२, 
७४, ७६, ७८ ह 
विल्लससनन ६४ 

हरीक्षष्ण जोहर ७ 

हप (श्री) ३, ४, २४ 

होरेस श्थ 


१५००,